आखिर क्यों भाजपा को दिल्ली के चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर से दिल्ली में जीत का प्रचंड परचम फहराया है। पार्टी प्रदेश में तकरीबन 90 फीसदी सीटों पर जीत नजर करती नजर आ रही है, हालांकि अंतिम आंकड़े अभी चुनाव आयोग की ओर से जारी नहीं किए गए हैं, लेकिन तमाम सीटों पर आप उम्मीदवारों की बढ़त को देखें तो आप को 63 सीटों पर जीत मिल रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई है। वहीं प्रदेश में कांग्रेस एक बार फिर से अपना खाता तक नहीं खोल पाई है। दिल्ली की कमान मनोज तिवारी को 2017 में दी गई थी और उनकी कमान में भाजपा तीनों ही कॉर्पोरेशन को अपने पास रखने में सफल रही थी। जिस तरह से मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा की कमान सौंपी गई थी, उसके बाद माना जा रहा था कि वह पूर्वांचल के वोटों को भाजपा की ओर मोड़ सकते हैं, लेकिन फिलहाल यह चुनाव नतीजों में तब्दील होता नजर नहीं आ रहा है।
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पूर्वांचल के वोटर
दिल्ली में पूर्वांचल के वोटरों की बात करें तो यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग हैं, जिनका वोट बैंक दिल्ली में काफी बढ़ा है और इसे दिल्ली के चुनाव में काफी अहम माना जा रहा था। दिल्ली में पूर्वांचल वोटरों की बात करें तो यह तकरीबन 35 फीसदी है। पिछले दो दशक में दिल्ली में पूर्वांचल वोटरों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है। साउथ दिल्ली और आउटर दिल्ली को पूर्वांचली के तौर पर ही जाना जाता है। आम आदमी पार्टी ने इन इलाकों में अपनी पकड़ को मजबूत किया है। पार्टी ने नरेला, बुराड़ी, बदली, रिठाला, सुल्तानपुर माजरा, देओली, अंबेडकर नगर, संगम विहार में अपनी पैठ को मजबूत किया है।

पार्टी के भीतर अंतर्कलह
दिल्ली चुनाव में एक बार फिर से जिस तरह से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा उसकी एक बड़ी वजह यह है पार्टी के भीतर अंतर्कलह। कई दिल्ली के नेताओं को पार्टी के चेहरे के तौर पर सामने रखने की कोशिश की गई, लेकिन इन चेहरों को हर बार खारिज कर दिया गया। लगातार दूसरी बार आप सरकार दिल्ली पांच वर्ष पूरे करेगी, ऐसे में 2025 तक भाजपा दिल्ली की कुर्सी से 27 साल तक दूर रहेगी। भाजपा के लिए दिल्ली की जीत इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि पार्टी केंद्र की सरकार यहीं से चला रही है, पिछले 12 साल से भाजपा के हाथ में निकाय हैं। यही वजह है कि दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए भाजपा के 200 सांसद, 11 मुख्यमंत्री, कई वरिष्ठ नेता, पीएम मोदी और केंद्रीय मंत्री शामिल हुए।

चुनाव प्रचार में विवादित शब्दावली
भाजपा के तमाम पोस्टर्स पर सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही चेहरा देखने को मिला। चुनाव प्रचार की कमान खुद अमित शाह ने संभाली और उन्होंने शहर में 52 रोड शो किए। चुनाव में शाहीन बाग, सीएए के विरोध में रैली सबसे अहम मुद्दा रहा। भाजपा लगातार इस मुद्दे को लेकर आप और तमाम विपक्षी दलों पर निशाना साधती रही। यहां तक की चुनाव प्रचार में ऐसी शब्दावलियों का इस्तेमाल किया गया, जिसका लोगों ने विरोध किया और उसपर काफी विवाद हुआ। भाजपा का चुनाव प्रचार मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा किए गए कामों को सिरे से खारिज करना रहा।

राष्ट्रवाद बनाम गुड गवर्नेंस
वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी लगातार वोटरों से यह अपील करती रही कि हमने दिल्ली में काम किया और दिल्ली के बेहतर भविष्य और विकास के काम के लिए आप हमे वोट दीजिए। एक तरफ जहां भाजपा इस चुनाव को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ के इर्द गिर्द लड़ रही थी तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी प्रदेश में बेहतर काम के दम पर वोटरों को लुभाने की कोशिश में जुटी थी, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों में देखने को मिला है।












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