कोटा क्यों बन रहा है छात्रों के लिए 'मौत की फ़ैक्टरी'- ग्राउंड रिपोर्ट

एंबुलेंस में रखे डीप फ़्रीज़र को पकड़ कर एक महिला लगातार रोए जा रही है. उनके आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं.

'मेरा भाई, मेरा भाई' कहते हुए वो बिलख रही हैं.

rajasthan Why Kota students death case

यह एंबुलेस राजस्थान में कोटा के एमबीएस अस्पताल की मॉर्चरी के सामने खड़ी है. मॉर्चरी के बाहर पुलिसकर्मी काग़ज़ी कार्रवाई कर रहे हैं. आस-पास कुछ छात्र भी हैं.

एक छात्र से पूछने पर मालूम हुआ कि डीप फ़्रीज़र में 17 साल के अंकुश का शव रखा हुआ है. डीप फ़्रीज़र से लिपट कर रो रही महिला अंकुश की बड़ी बहन हैं.

पुलिस के मुताबिक़, कोटा में एक ही दिन में ख़ुदकुशी करने वाले तीन छात्रों में से एक अंकुश भी था.

अंकुश अपनी दो बड़ी बहनों के बीच छोटा भाई था. बिहार के सुपौल से अंकुश की बहन, जीजा अमरीश और कुछ परिजन अंकुश का शव लेने मॉर्चरी पहुँचे हुए थे.

वो इस स्थिति में नहीं थे कि हमसे बात कर सकें. आँसू बहाते हुए रुंधे गले से उन्होंने बस इतना कहा- पढ़ाई में अच्छा था. कभी नहीं बताया क्या परेशानी थी.

कोटा में तलवंडी इलाक़े के दो मंज़िला पीजी के ऊपर वाले फ़्लोर के अलग-अलग कमरों में बिहार के सुपौल से आए अंकुश और गया के उज्ज्वल ने 'ख़ुदकुशी' की थी.

इस मकान में रहने वालों से बात करने की कई कोशिशों के बाद क़रीब 50 साल की एक महिला बाहर आईं और बोलीं, "हमने सब कुछ पुलिस को बता दिया है. आप पुलिस से पूछो."

कोटा कलेक्टर ओपी बुनकर ने बीबीसी से कहा, "एक स्टूडेंट के अफ़ेयर का मामला सामने आया है. जब उसके घर मालूम हुआ तो संभव है स्टूडेंट को डाँटा गया होगा और जिसके बाद उसने यह क़दम उठाया है. जबकि, दो स्टूडेंट पढ़ाई को लेकर तनाव में थे."

कलेक्टर बुनकर ने कहा, "एक स्टूडेंट लगभग महीने भर से कोचिंग नहीं जा रहा था. किसी अन्य स्टूडेंट के ज़रिए उसका अटेंडेंस कार्ड पंच किया जा रहा था. कार्ड पंच करने वाले स्टूडेंट ने ये स्वीकार किया है."

कोटा शहर के पुलिस अधीक्षक केसर सिंह शेखावत ने बीबीसी से कहा, "तलवंडी में बिहार के अंकुश और उज्ज्वल ने और कुन्हाड़ी में मध्य प्रदेश के प्रणव वर्मा ने ख़ुदकुशी की है."

मौत का कारण पूछने पर एसपी शेखावत ने कहा, "शुरुआती जाँच में पढ़ाई के तनाव का कारण सामने आया है. जाँच कर रहे हैं और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतज़ार है."

तीनों स्टूडेंट्स के शव पोस्टमॉर्टम के बाद परिजनों को सौंप दिए गए हैं.

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कोटा में यूपी-बिहार से सबसे ज़्यादा छात्र

कोटा में राजीव गांधी नगर इलाक़े के तलवंडी, जवाहर नगर, विज्ञान विहार, दादा बाड़ी, वसंत विहार और आसपास के इलाक़ों में क़रीब पौने दो लाख स्टूडेंट रहते हैं.

जबकि, लैंडमार्क इलाक़े में 60 हज़ार तक छात्र रहते हैं. इसी तरह हज़ारों की संख्या में छात्र कोरल पार्क, बोरखेड़ा में भी रहते हैं.

कोटा कलेक्टर ओपी बुनकर और चार दशक से यहाँ पत्रकारिता कर रहे केबीएस हाड़ा कहते हैं कि क़रीब ढाई लाख स्टूडेंट कोटा में रहते हैं. "इनमें सर्वाधिक उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं."

कोटा में सात नामी कोचिंग सेंटर हैं. इनके अलावा कई अन्य कोचिंग सेंटर भी यहाँ हैं.

शहर में क़रीब साढ़े तीन हज़ार हॉस्टल और पीजी हैं. इनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के छात्र बड़ी संख्या में हैं.

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सड़कों पर बड़ी संख्या में छात्र

लैंडमार्क इलाक़े में आप जिस भी सड़क से गुज़रें, वहाँ बड़ी संख्या में 16 से 20 साल के स्टूडेंट्स कंधे पर बैग लटकाए कोचिंग और हॉस्टल की ओर तेज़ी से जाते दिख जाते हैं.

नाम न छापने की शर्त पर एक कोचिंग संस्थान से जुड़े शख़्स ने बताया, "बच्चों को स्कूल में दाख़िला भी कोचिंग संस्थान अपने स्तर पर कराते हैं. स्कूल में डमी स्टूडेंट की तरह दाख़िला होता है और कोचिंग में नीट, जेईई की तैयारी कराई जाती है. इससे भी बच्चों में तनाव और पढ़ाई का दबाव बनता है."

यहीं एक हॉस्टल में हमारी मुलाक़ात हुई हॉस्टल संचालक कुंज बिहारी नागर से. वे नौ हॉस्टल चलाते हैं जिनमें 500 छात्र रहते हैं.

कुंज बिहारी कहते हैं, "स्टूडेंट्स को हॉस्टल छोड़ने के बाद छह महीने से एक साल तक अभिभावक बच्चे से मिलने नहीं आते. हम बच्चों का ध्यान रखते हैं. किसी बच्चे की शिकायत उनके घर करें, तो माता-पिता बच्चे की ग़लती तक स्वीकार नहीं करते."

राजीव गांधी नगर के आसपास इलाक़े में कोचिंग के बाहर हज़ारों की संख्या में छात्रों की साइकिल खड़ी नज़र आती है. शाम के समय सड़क पर छात्रों का हुजूम दिखता है.

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ख़ुदकुशी का ज़िम्मेदार कौन?

छात्रों की ख़ुदकुशी की ख़बरें लगातार सामने आती रही हैं. अधिकतर मामलों में पढ़ाई के तनाव को कारण बताया जाता रहा है.

लेकिन, क्या छात्र ही इसके ज़िम्मेदार हैं. इस पर वरिष्ठ पत्रकार केबीएस हाड़ा कोचिंग संस्थानों में आपसी प्रतिस्पर्धा, हॉस्टल-पीजी का वातावरण और विज्ञापनों के लोभ में कमियाँ उजागर नहीं करने वाली मीडिया को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

उनका मानना है कि पुलिस-प्रशासन अपनी ज़िम्मेदारी बख़ूबी नहीं निभाता है. यह भी बड़ा कारण है कि कोचिंग संस्थान मन मुताबिक़ नियमों से छात्रों को तनाव देते हैं.

कोटा के सिटी एसपी केसर सिंह शेखावत के मुताबिक़ कोटा में साल 2011 से अब तक 135 कोचिंग छात्रों ने आत्महत्या की है. इस साल 14 स्टूडेंट्स ने सुसाइड किया है.

स्थानीय प्रशासन के मुताबिक़ 2017 में एक महीने में 24 छात्रों ने ख़ुदकुशी की थी. उस दौरान दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार नीलम गुप्ता ने कोटा से रिपोर्ट की थी.

उन्होंने अपनी रिपोर्ट में मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंसेज़ की रिसर्च का हवाला दिया था जिसमें स्टूडेंट की ख़ुदकुशी के कारणों को बताया गया.

नीलम गुप्ता बीबीसी हिंदी को बताती हैं, "छात्रों के बीच स्टडी ग्रुप का प्रेशर रहता है. सब कुछ दाँव पर लगा कर अपने बच्चों को कोटा में पढ़ा रहे परिजनों का दबाव रहता है. नीट और जेईई की पढ़ाई का ज़्यादा प्रेशर रहता है."

वो कहती हैं, "कोचिंग संस्थान अपना परिणाम बेहतर साबित करने के लिए पढ़ाई में तेज़ बच्चों पर ज़्यादा फ़ोकस करते हैं. अन्य बच्चे या कमज़ोर बच्चे उनकी वरीयता में नहीं होते. इन बच्चों के बीच ये भी एक तनाव का कारण होता है."

कोचिंग संस्थानों की क्लास टाइमिंग और शेड्यूल भी एक बड़ा फ़ैक्टर है.

सप्ताह में सातों दिन क्लास और त्योहारों पर भी छुट्टियाँ नहीं मिलना बच्चों में मानसिक तनाव पैदा करता है.

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छात्र क्या मानते हैं

लैंडमार्क इलाक़े के एक हॉस्टल में रहने वाले 19 साल के चेतन सिंह तंवर नीट की तैयारी कर रहे हैं, इस बार उनका दूसरा प्रयास है.

वो कहते हैं, "परिवार का प्रेशर तो निश्चित रूप से रहता ही है. स्टूडेंट आपस में भी प्रतियोगिता का घेरा बना कर रखते हैं. त्योहारों पर भी घर जाने को नहीं मिलता और कोचिंग में सप्ताह के सातों दिन क्लास फिर हॉस्टल में भी पढ़ाई."

ताज़ा मामले पर वे कहते हैं, "मैं सोचता हूँ कि नीट नहीं तो बहुत ऑप्शन हैं. परिवार वाले ऐसे समय में फ़ोन कर कहते हैं सब ठीक है, ख़ुश रहो, परेशान होने की ज़रूरत नहीं है."

तलवंडी में हरियाणा से आकर नीट की तैयारी कर रहे 19 साल के शाक़िब ख़ान कहते हैं, "मेरे पिता अध्यापक हैं और बहुत फ्रेंडली हैं. कोई भी समस्या हो तो वे मुझे गाइड करते हैं."

यूपी के गोरखपुर से 2012 में कोचिंग करने आए कलाम कहते हैं, "मैंने यहाँ नीट की कोचिंग की, लेकिन सेलेक्शन नहीं हुआ. अब मैं यहाँ होस्टल चलाता हूँ."

कोटा में कई स्टूडेंट्स और स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ राज्यों के अनुसार कई छात्रों ने मिलकर गैंग बनाए हुए हैं. गैंग के नाम रखे हुए हैं और ख़ूब उत्पात मचाते हैं.

कलेक्टर ओपी बुनकर कहते हैं, "छात्रों ने ग्रुप बनाए हुए हैं. लेकिन टकराव जैसी सूचना कभी नहीं आई है."

13 दिसंबर को कोटा पुलिस प्रशासन ने कोचिंग संस्थानों के साथ बैठक की है. मीटिंग में कोटा रेंज आईजी, कोटा कलेक्टर और एसपी ने कोचिंग संस्थानों के लिए 11 नवंबर को जारी सरकारी निर्देशों का पालन करने के निर्देश दिए हैं.

कलेक्टर ओपी बुनकर ने बीबीसी से कहा- हमने कोचिंग संस्थानों को योगा क्लास, मोटिवेशनल स्पीच, सप्ताह में एक अवकाश समेत सरकारी गाइडलाइंस का पालन करने को कहा है.

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छात्रों से कोटा को रोज़गार

मध्य प्रदेश के मंदसौर से आने वाली चंबल नदी कोटा शहर के बीच से होकर गुज़रती है. इसलिए ग्रामीण कोटा समेत आसपास के ज़िलों में खेती से पैदावार अच्छी होती है.

कोटा को औद्योगिक नगरी भी कहा जाता है. हालाँकि, 1980 के दशक के बाद से उद्योग धंधों में गिरावट और शिक्षण संस्थानों की संख्या ने तेज़ी पकड़ी.

यही कारण है कि औद्योगिक नगरी कोटा अब शिक्षा नगरी से पहचानी जाती है.

कोटा शहर के बाशिंदे इन छात्रों के बिना कोटा की कल्पना नहीं कर सकते हैं.

हॉस्टल संचालक रोहित कुमार कहते हैं, "शहर में लोग अपने घरों को पीजी बना कर कमाई कर रहे हैं. क़रीब साढ़े तीन हज़ार हॉस्टल-पीजी हैं, सैकड़ों मेस, रेस्टोरेंट समेत शहर की आबादी को रोज़गार मिला हुआ है."

"कोचिंग संस्थानों में काम करने वाले हज़ारों लोगों को भी स्टूडेंट के ज़रिए ही रोज़गार मिला है."

कोविड के दो सालों के दरम्यान जब स्टूडेंट्स कोटा छोड़ रहे थे, तब शहरवासियों के पास आमदनी का कोई विकल्प नहीं मिल रहा था.

हॉस्टल संचालक कुंज बिहारी कहते हैं, "एक बच्चे पर औसतन सालाना चार लाख रुपए ख़र्च होते हैं. कोटा में क़रीब ढाई लाख स्टूडेंट्स रहते हैं. कुछ स्टूडेंट्स के साथ उनके परिजन भी यहाँ रहते हैं. ऐसे में अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कोटा के लिए स्टूडेंट्स आर्थिक रीढ़ से कम नहीं."

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