Rajasthan Chunav: वसुंधरा राजे को किनारे रखकर बीजेपी कहीं बड़ी गलती तो नहीं कर रही? इनसाइड स्टोरी
राजस्थान में बीजेपी ने दो बार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को इस बार पार्टी का सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। वह पार्टी के लिए चुनाव अभियान में जुटी हुई हैं और सीएम की रेस से बाहर भी नहीं हैं। लेकिन दो दशकों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि भाजपा अकेले उनके चेहरे पर मैदान में नहीं है। मुख्य चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है और फिर सामूहिक नेतृत्व की छाप दिखाई जा रही है।
हालांकि, बीजेपी की ओर से दलील दी जा रही है कि वह कभी भी चुनावों में सीएम का चेहरा नहीं पेश करती। लेकिन, जानकारी के मुताबिक अंदरखाने पार्टी में यह बात भी उठ रही है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने किसी स्थानीय चेहरा को सामने नहीं रखना, पार्टी को भारी भी पड़ सकता है।

'कमल ही हमारा प्रत्याशी है'
राज्य में बीजेपी का चुनाव अभियान इस बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी खुद संभाल रहे हैं। इन सबके ऊपर पीएम मोदी का नेतृत्व और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सीधी निगरानी है। पिछले महीने जब प्रधानमंत्री राजस्थान के दौरे पर पहुंचे थे तो लोगों से कहा था कि 'कमल ही हमारा प्रत्याशी है'। इस तरह से किसी को अब सीएम के चेहरे के तौर पर पेश करने की संभावना भी खारिज हो चुकी है।
खास बात ये है कि वसुंधरा को किनारे किए जाने को लेकर कांग्रेस भी भाजपा पर निशाना साध रही है। लालकृष्ण आडवाणी को संरक्षक मंडल में भेजे जाने जैसी चर्चा कर रही है।
'वसुंधरा को किनारे रखना पार्टी की मजबूरी थी'
वनइंडिया ने पूर्व सीएम वसुंधरा राजे को सामने रखे बिना चुनाव अभियान चलाने के कारणों को लेकर आरएसएस से जुड़े एक वरिष्ठ व्यक्ति से खास बात की है, जिन्हें राजस्थान में बीजेपी की गतिविधियों की अच्छी समझ है। उन्होंने साफ कहा कि वसुंधरा को किनारे रखना पार्टी की मजबूरी बन गई थी।
'उनके चलते पार्टी को काफी नुकसान हो रहा था'
उन्होंने बताया कि पूर्व सीएम के काम करने के तरीके को लेकर संगठन और समर्थकों में भी भारी नाराजगी रही है। पांच साल तक सीएम रहने के दौरान और उसके बाद भी पांच साल यानी 10 वर्षों तक उन्होंने किसी का कुछ भी चलने ही नहीं दिया। पूरे संगठन को ठप कर दिया। यहां तक कि प्रदेश के संगठन महामंत्री (संघ का पदाधिकारी जो बीजेपी में नियुक्त किया जाता है) जैसा पद खाली पड़ा रहा। कितने वर्षों तक तो पार्टी प्रदेश अध्यक्ष नहीं बना पाई। सिर्फ इस वजह से कि बीजेपी संगठन में केवल उनकी ही चलती रहे। इससे पार्टी को काफी नुकसान हो रहा था।
जातीय और क्षेत्रीय संतुलन पर फोकस, युवाओं को किया आगे
उनके मुताबिक इसलिए पार्टी ने गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुन राम मेघवाल जैसे केंद्रीय मंत्रियों को टिकट दिया है। वहीं दीया कुमारी, किरोड़ी लाल मीणा, प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी, महंत बालक नाथ और राजेंद्र राठौड़ जैसे बड़े नेताओं को चुनाव मैदान में उतारकर जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाया है।
इनमें शेखावत और राठौड़ की राजपूतों में अच्छी पकड़ है तो दीया कुमारी भी वसुंधरा की तरह राज घराने से ताल्लुक रखती हैं। मेघवाल दलित समाज से आते हैं तो मीणा का गुर्जर समाज में बढ़िया पकड़ है और जोशी बड़े ब्राह्मण चेहरा हैं। वहीं अलवर के फायरब्रांड सांसद महंत बाबा बालक नाथ ओबीसी यादव समाज से आते हैं।
क्यों नहीं बनाया सीएम पद का उम्मीदवार?
संघ से जुड़े शख्स ने हमें बताया कि राजे को चेहरा नहीं बनाने का फैसला काफी सोच-समझकर लिया गया है। इसके लिए संगठन ने आंतरिक सर्वे भी कराया है और उससे पता चला है कि वसुंधरा राजे को सीएम के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं करने से बीजेपी को जितना नुकसान हो सकता है, उससे कहीं ज्यादा दिक्कत उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने की वजह से झेलनी पड़ सकती है। ऐसे में कांग्रेस को जो भी लग रहा हो, यह बात जरूर सामने आ रही है कि भाजपा ने एक तय रणनीति के मुताबिक राजस्थान में चुनावी दांव खेला है।
बीजेपी ने इस तरह से राजस्थान में इस बार एक चेहरे की जगह कई चेहरों को सामने कर दिया है। यह पार्टी के लिए बहुत बड़ी चुनावी बाजी साबित होने वाली है। क्योंकि, प्रदेश में करीब 30 वर्षों का ट्रेंड सरकार बदलने का रहा है। ऐसे में पार्टी के नए प्रयोग को सफल बनाना उसके लिए बड़ी चुनौती है, जब कांग्रेस पार्टी की गहलोत सरकार को एंटी-इंकंबेंसी, भ्रष्टाचार और खराब कानून व्यवस्था के आरोपों का सामना करना है।
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