राजस्थान उपचुनाव: सत्ता के विरोध की लहर ने दिलाई कांग्रेस को जीत
नई दिल्ली। विजयी रथ पर सवार भाजपा को राजस्थान में ब्रेक लगा दिए गए। सत्तारूढ़ दल के लिए आसान माने जाने वाले उपचुनाव में पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। भाजपा को अजमेर और अलवर लोकसभा और भीलवाड़ा की मांडलगढ़ विधानसभा सीट बड़े अंतर से गंवानी पड़ी। राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार के लिए यह नतीजे आंख खोलने वाले हैं। महज 10 माह बाद राज्य में विधानसभा चुनाव हैं, वहीं केंद्र की मोदी सरकार को भी चुनाव परिणाम चेतावनी सरीखे हैं। केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत सरकार बनाने में प्रदेश की भूमिका अहम रही थी। प्रदेश की जनता ने लोकसभा की सभी 25 सीटें भाजपा की झोली में डाली थी लेकिन गुरुवार को आए उपचुनाव के नतीजे अगले चुनाव में जनमानस के बदलते रुख की ओर इशारा कर रहे हैं। प्रदेश की जनता ने लोकसभा की सभी 25 सीटें भाजपा की झोली में डाली थी लेकिन गुरुवार को आए उपचुनाव के नतीजे अगले चुनाव में जनमानस के बदलते रुख की ओर इशारा कर रहे हैं।

उपचुनाव में बीजेपी को मिली करारी शिकस्त
विश्लेषकों की मानें तो उपचुनाव में सत्ता विरोधी लहर ने सर्वाधिक असर दिखाया। वर्ष 2013 में 160 से अधिक सीटें देकर जिस तरह जनता ने वसुंधरा राजे को गद्दी सौंपी थी, वह उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाई। बड़ी उम्मीद के साथ लाई गई राजे सरकार ने एक साल आते-आते ही रंग खोना शुरू कर दिया। राजे ने अपनी दूसरी पारी में जनता से दूरी बनाए रखी। साथ ही मंत्रियों को भी कमजोर बनाए रखा। मंत्रालयों में प्रमुख शासन सचिव लगाने हो या जिला कलक्टर या एसपी की तैनाती, सब कुछ सीएम कार्यालय से किया गया। इसमें मंत्री और संबंधित विधायकों की अनुशंसा भी नजरअंदाज की गई। कुछ खास किस्म के नौकरशाह हावी हो गए और निर्वाचित जनप्रतिनिधि दरकिनार कर दिए गए। लिहाजा जनता में संदेश गया कि मंत्री-विधायकों की सरकार में नहीं चलती। इससे लोग और सरकार के बीच फासला बढ़ता गया। राजे सरकार जातिगत आंदोलनों से भी ठीक ढंग से नहीं निपट पाई। फिर चाहे गुर्जर-जाट आरक्षण मामला हो या गैंगस्टर आनंदपाल एनकाउंटर को लेकर राजपूत समाज का आंदोलन हो।

नतीजों पर क्या कह रहे हैं विश्लेषक...
आनंदपाल के एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए राजपूत समाज सीबीआई जांच की मांग लेकर सड़कों पर उतर आया लेकिन सरकार ने दो तीन दिन इसे हलके से लिया। फिर आंदोलन उग्र हुआ तो चेती पर लोकसभा चुनाव में दिग्गज नेता जसवंत सिंह का टिकट काटने को लेकर पहले से खफा राजपूत समाज सरकार की ढिलाई को लेकर और नाराज हो गया। राजपूत समाज राजस्थान में भाजपा का परंपरागत वोट बैंक रहा है, जो खुले तौर पर राजे सरकार के विरोध में आ गया। इसी तरह फिल्म पद्मावत को लेकर राजपूत समाज की सरकार से नाराजगी रही। वहीं विशेष पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की गुर्जर समाज की मांग से राजे सरकार ढंग से नहीं निपट सकी। उसने दो तीन प्रयास भी किए लेकिन 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं देने की शीर्ष कोर्ट का नियम आड़े आ गया। सरकार ने कोर्ट में गुर्जर समाज की लड़ाई लड़ी लेकिन कोर्ट के आदेश को सही ढंग से समाज तक नहीं पहुंचा पाई, लिहाजा हालिया वर्षों में भाजपा के नजदीक आया गुर्जर समाज कांग्रेस के पाले में चला गया। वैसे भी सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने के बाद गुर्जर समाज कांग्रेस के प्रति नरम हो चला था।

अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीट कांग्रेस के पास
सरकार न शेखावाटी के किसान आंदोलन से सही ढंग से निपट पाई और न ही डॉक्टर हड़ताल से। इसी तरह युवा वर्ग रोजगार के अवसरों को लेकर परेशान रहा। पिछले चार साल में पहले से जारी सरकारी भर्ती प्रक्रिया भी कोर्ट-कचहरियों में फंसी रही। सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर समता आंदोलन समिति नामक संगठन ने भी सरकार का विरोध किया। इस संगठन ने नोटा का प्रचार करते हुए अजमेर में चुनाव कार्यालय तक खोला। सरकारी कर्मचारियों की सरकार से दूरी बनी रही। कांग्रेस की एकजुटता भी भाजपा पर भारी पड़ी। भले ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट, पूर्व सीएम अशोक गहलोत, पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. सीपी जोशी और भंवर जितेंद्र सिंह अलग-अलग खेमों में थे लेकिन उपचुनाव में सब एक मंच पर आए। जितेंद्र सिंह ने अलवर से खुद ही टिकट की दावेदारी से हटते हुए डा. करण सिंह यादव की पैरवी की।

विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का बढ़ा उत्साह
इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और पार्टी एकजुट हुई। सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रति जनता में बढ़ती नाराजगी को भुनाने में भी कांग्रेस सफल रही। यह चुनाव नतीजे भाजपा के लिए संकेत है कि अगर संभली नहीं तो उसकी विधानसभा और लोकसभा की राह बहुत कठिन है। इन नतीजों को भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया तो नवंबर 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ सकती है। यह एक तरह का सैंपल आ चुका है क्योंकि राज्य में 200 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 17 (अजमेर व अलवर में आठ-आठ विधानसभा क्षेत्र व एक मांडलगढ़) में से अधिकतर में भाजपा पिछड़ गई है। भाजपा ने आत्ममंथन करने की बात कही है लेकिन देखना होगा कि या वाकई अपनी कमजोरियां दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करेगी या फिर सिर्फ मीडिया के सामने जुमला फेंककर आगे बढ़ जाएगी।












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