पोस्टर में बीजेपी संग राज ठाकरे, जानिए, क्या महाराष्ट्र में मनसे थामेगी हार्ड हिंदुत्व की कमान!
बेंगलुरू। महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव के लिए मतदान हो रहे हैं, लेकिन इस बीच पालघर में प्रस्तावित मतदान से एक दिन पूर्व दिखे एक बैनर ने राजनीतिक पंडितों की नींद खराब कर दी है। पालघर में बीजेपी द्वारा लगाए गए पोस्टर में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे मौजूद हैं। हैरानी की बात यह है कि उक्त पोस्टर में राज ठाकरे प्रधानमंत्री मोदी के साथ नज़र आ रहे हैं, जिनका नाम प्रधानमंत्री मोदी के प्रबल आलोचकों में शुमार है।

गौरतलब है मनसे चीफ राज ठाकरे ने राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बने सीएए के विरोध में भी खड़े हुए थे, लेकिन पालघर में लगे बीजेपी के पोस्टर में राज ठाकरे की तस्वीर से अनुमान लगाया जा रहा है कि मोदी विरोध में जमा बर्फ को सियासी हथौड़े ने तोड़ डाला है। इसका कारण पिछले दो विधानसभा चुनाव में मनसे की हालत को भी माना जा सकता है जब मनसे अकेले लड़कर महज 1 सीट पर सिमट कर रह गई है।

राज ठाकरे और बीजेपी के बीच पक रही खिचड़ी के तस्दीक मनसे के झंडे में होने जा रहे परिवर्तन से किया जा सकता है, जो महाराष्ट्र में शिवसेना के बाद हॉर्ड कोर हिंदुत्व राजनीति का प्रतिनिधुत्व कर सकता है, क्योंकि शिवसेना ने गठबंधन सियासत के लिए अपने मूल विचारधारा को कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की आड़ में संदूक में बंद कर दिया है और वह सेक्युलर राजनीति का हिस्सा बन चुकी है।

बताया जा रहा है कि मनसे का नया झंडा पूरी तरह भगवा रंग में रंगा होगा, जिसके बीच राज मुद्रा होगी। मनसे का यह नया झंडा कट्टर हिंदुत्व की पहचान होगी। हालांकि अभी पार्टी की ओर से अभी तक इसका ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो जल्द ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे इस पर बड़ा ऐलान कर सकते हैं। माना यह भी जा रहा है कि राज ठाकरे हिंदुत्व की राजनीति करने की घोषणा के साथ ही बीजेपी के साथ भविष्य के रिश्तों पर भी खुलासा करेंगे।

मालूम हो, अभी मनसे का झंडा है ब्लू, केसरिया और हरे रंग का है, लेकिन जो नया झंडा बनेगा वो पूरी तरह भगवा होगा और इसके बीच में राज मुद्रा होगी। पालघर में लगे बीजेपी के पोस्टर में नज़र आए राज ठाकरे वैसे भी चाचा और शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के हॉर्ड हिंदुत्व के असली वारिस माने जाते रहे हैं, लेकिन शिवसेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथ में जाने के बाद राज ठाकरे शिवसेना से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बना ली थी।

शिवसेना से अलग होने के बाद राज ठाकरे परोक्ष रूप से भले ही हिंदुत्व की राजनीति करते रहे, लेकिन मुखर होकर कभी हिंदुत्व की राजनीति नहीं कर पाए, क्योकि महाराष्ट्र में शिवसेना ही हॉर्ड कोर हिंदुत्व राजनीति की शलाका उठाए हुए थे। चूंकि अब समय बदल चुका है और शिवसेना सॉफ्ट हिंदुत्व और सेक्युलिरज्म को चोला ओढ़ लिया है, तो राज ठाकरे के लिए यह बढ़िया मौका है कि महाराष्ट्र में हॉर्ड कोर हिंदुत्व राजनीति को अपनाकर शिवसेना की जगह ले सकें।

बीजेपी इसलिए भी राज ठाकरे के लिए पहली च्वाइस होगी, क्योंकि शिवसेना के स्थापना के साथ ही शिवसेना महाराष्ट्र में समान विचारधारा वाली बीजेपी के साथ लगभग 30 वर्षों तक जुड़ी रही थी। पालघर में बीजेपी के पोस्टर में छपी राज ठाकरे की तस्वीर के जरिए स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की गई है कि राज ठाकरे बीएमसी चुनाव में बीजेपी के साथ नजदीकियों को वोट के तराजू में तौलना चाह रही है और अगर बीएससी चुनाव नतीजों में मनसे को महाराष्ट्र के वोटरों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली तो वह बीजेपी के साथ एलायंस में देर नहीं लगाएगी।
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महाराष्ट्र में कट्टर हिंदूवादी राजनीति का झंडा उठाएंगे राज ठाकरे?
पिछले 5 दशक से महाराष्ट्र में कट्टर हिन्दूवादी पार्टी रही शिवसेना किंगमेकर से किंग की भूमिका में आ गई है और महा विकास अघाड़ी मोर्च में बने रहने के लिए शिवसेना चीफ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व और सेक्युलर राजनीति करना मजबूरी बन चुका है। वर्ष 1966 में शिवसेना की स्थापना से लेकर महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के घोषित नतीजे से पहले तक महाराष्ट्र में कट्टर हिंदूवादी राजनीति का झंडा उठाने वाली शिवसेना अब चूंकि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम से बंधी है, ऐसे में राज ठाकरे के लिए एक बड़ा मौका है कि वो महाराष्ट्र में हिंदुत्व राजनीति का चेहरा बने, क्योंकि चाहकर भी शिवसेना अगले पांच वर्ष तक हिंदूवादी राजनीति नहीं कर पाएगी।

महाराष्ट्र में शिवसेना का विकल्प बनने में सफल होगी मनसे?
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के सॉफ्ट हिंदुत्व और सेक्युलर राजनीति की ओर कदम बढ़ाने से महाराष्ट्र में हॉर्ड कोर हिंदुत्व राजनीति की जमीन खाली पड़ी है, लेकिन बडा सवाल यह है कि क्या मनसे महाराष्ट्र में खाली पड़ी हिंदूवादी राजनीति की उर्वर जमीन पर खड़ी वोटों की फसल काट पाएंगे। यह कुछ हद तक संभव कहा जा सकता है, क्योंकि शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की परछाई कहे जाने वाले राज ठाकरे के लिए यही मुफीद भी है, क्योंकि नई पार्टी की स्थापना के 14 वर्ष बाद भी मनसे अभी भी राजनीतिक वनवास ही झेल रही है।

हॉर्ड कोर हिंदुत्व का झंडा उठाने पर मिलेगा नाराज शिवसैनिकों का साथ
माना जा रहा है कि हॉर्ड कोर हिंदुत्व को दामन थान, जिसमें उन्हें उन शिवसैनिकों का सहयोग भी मिलेगा, जो शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे के निर्णयों ने आज भी नाराज हैं और फिर उन्हें बीजेपी जैसे बड़े दल का भी सहयोग हासिल होगा, जिससे सहयोग से बीएमसी चुनाव तक सीमित रहने वाली शिवसेना और वर्तमान में केंद्रीय राजनीति में पहुंच चुकी है। बीजेपी के सहयोग से महाराष्ट्र में पिछले दो लोकसभा चुनाव में शिवसेना 18-18 लोकसभा सीट जीतने में कामयाब रही है जबकि महाराष्ट्र से इतर जहां भी शिवसेना ने चुनाव में उतरी है वहां जमानत बचाने लायक भी उसे वोट नहीं मिले हैं।

राज ठाकरे में दिखती शिवसेना संस्थापक बालासाहिब ठाकरे की छवि
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे अपनी कट्टर छवि वाले नेता के रूप में मशहूर हैं। अधिकांश लोगों को MNS चीफ राज ठाकरे में बालासाहेब ठाकरे की छवि दिखती है। यही कारण है कि जब बालासाहेब ठाकरे ने वर्ष 2004 में पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो एक वर्ष के भीतर ही राज ठाकरे ने शिवसेना को छोड़ दिया था। हैरत वाली बात यह है कि जब राज ठाकरे ने शिवसेना का अलविदा कहा था उस समय शिवसेना और राजठाकरे समर्थकों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था और उद्धव ठाकरे को पार्टी की कमान सौंपने की नाराजगी में हजारों की संख्या में शिवसैनिकों ने अपना पाला बदल लिया था।

हॉर्ड कोर हिंदुत्व से अलग चलकर महाराष्ट्र में मनसे को नहीं लाभ
वर्ष 2006 में शिवसेना से इतर नई पार्टी के गठन करने पर राज ठाकरे को भले ही शुरूआती फायदा मिला और पहले ही विधानसभा चुनाव में पार्टी 13 विधानसभा सीट जीतकर राजनीतिक कैरियर का आगाज किया, लेकिन राज ठाकरे के कुछ आत्मघाती कदमों ने उनके साथ-साथ मनसे का भी डब्बा गोल कर दिया। इनमें यूपी और बिहार से पलायित होकर महाराष्ट्र में जीविकोपार्जन कर रहे लोगों के खिलाफ मनसे की राजनीति बुरी तरह से बैकफायर कर गई और राज ठाकरे की पार्टी चुनाव -दर-चुनाव सिकुड़ती चली गई।

पिछले दो विधानसभा चुनावों में महज 1-1 सीट जीत सकी है मनसे
महाराष्ट्र में हुए 2009 में विधानसभा चुनाव में मनसे पहली बार चुनाव में उतरी थी। शिवसेना से अलग होकर पहली बार चुनाव उतरकर राज ठाकरे 13 विधानसभा सीट जीतकर बेहतरीन आगाज किया था, लेकिन अपनी छवि से इतर पार्टी के एजेंडों और मुद्दों पर चलने वाली मनसे ज्यादा दूरी नहीं तय कर पाई। हॉर्ड कोर हिंदुत्व से इतर राज ठाकरे को वोटरों को प्यार और वोट दोनों मिलना बंद कर दिया और प्रवासित यूपी-बिहार के मुद्दों ने मनसे की छवि और खराब कर दी, क्योंकि अराजक छवि गढ़ चुकी मनसे को स्थानीय मराठी मानुषों ने भी भाव देना बंद कर दिया। यही कारण था कि उसके बाद हुए 2014 से 2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में क्रमशः पार्टी 1-1 सीट पर सिमटी गई।

यूपी -बिहार प्रवासियों के खिलाफ मनसे का जब उल्टा पड़ा दांव
मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे को महाराष्ट्र में बसे बाहरी लोगों के खिलाफ राजनीति भारी पड़ गई थी, जिससे पार्टी का जनाधार तेजी छिटक गया। इससे मनसे के हाथ से न केवल यूपी-बिहार के लोगों के वोट छिटक गया, बल्कि मराठा वोट बैंक भी पार्टी के हाथों से खिसक गया जबकि राज ठाकरे अलग होने के बाद भी शिवसेना फल-फूल रही थी, क्योंकि बीजेपी जैसा बड़ा राजनीतिक दल उसके साथ खड़ा था। ऐसा समझा जा रहा है कि मनसे यह बात समझ गई है और हिंदुत्व का झंडा उठाने के साथ-साथ बीजेपी को भी गले लगाने से अब वह नहीं चूकेगी।

6 माह में हिंदू वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं राज ठाकरे
महाराष्ट्र में शिवसेना की हॉर्ड कोर हिंदुत्व राजनीति की जगह लेना राज ठाकरे के लिए मुश्किल नहीं होने वाला है, क्योंकि अगर कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना गठबंधन की सरकार 6 महीने भी सत्ता में रह गई तो शिवसेना हिंदूवादी राजनीति से उतनी ही दूर हो जाएगी, जैसे अयोध्या में भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाकर कांग्रेस हिंदु बहुसंख्यकों से दूर हो चुकी है। इसका फायदा मनसे को भविष्य में होने वाले विधानसभा चुनाव मे तो मिलेगा ही, इसके साथ-साथ महाराष्ट्र में संभावित सरकार में भी मिल सकता है।

बीएमसी चुनाव मनसे के लिए हिंदू हार्डकोर राजनीति का सही वक्त
महाराष्ट्र में हिंदूवादी राजनीति का झंडा उठाने के लिए बीएमसी चुनाव मनसे के लिए एक सही वक्त कहा जा सकता है, क्योंकि महज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने के लिए शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे ने जिन परस्पर विरोधी पार्टियों के साथ गलबहियां की है, उससे पिछले कई दशकों से हिंदूवादी राजनीति को झंडा लेकर चलने वाले हजारों शिवसैनिक बेहद नाराज हैं। अगर यह सरकार 6 माह में गिर गई और अगर महाराष्ट्र में मध्यावधि चुनाव की नौबत आई तो शिवसेना के लिए हिंदुओं का वोट हासिल करना मुश्किल हो जाएगा, तब इसका सीधा फायदा मध्यावधि चुनाव में मनसे उठा पाएगी।

जनता शिवसेना से ले सकती है जनादेश के अपमान का बदला
एनडीए के साथ चुनाव लड़कर महाराष्ट्र विधानसभा में उतरी शिवसेना और बीजेपी को महाराष्ट्र की जनता के स्पष्ट जनादेश देकर सरकार बनाने के लिए चुना था, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना चीफ ने उन दलों के साथ सरकार बना लिया, जिन्हें जनता ने विपक्ष में बैठने लायक मत दिया था। स्पष्ट है कि जनादेश का अपमान करके परस्पर विरोधी दलों के साथ सरकार में शामिल हुई शिवसेना जनता से संवाद नहीं कर पाएगी, क्योंकि जनता अच्छी तरह समझ चुकी है कि शिवसेना ने निजी स्वार्थ के चलते उनके जनादेश का मजाक बनाया और कांग्रेस और एनसीपी के साथ लेकर मुख्यमंत्री बन गई।

मनसे के हिंदुत्व राजनीति में प्रवेश से बिन आत्मा के शरीर हो जाएगी शिवसेना
शिवसेना के नेतृत्व में महाराष्ट्र में बनने वाली नई सरकार की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है, लेकिन इतिहास बताता है कि परस्पर विरोधी दलों के मेल वाले गठबंधन सरकारों की उम्र अक्सर छोटी होती हैं। बिहार में महागठबंधन इसका बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा में कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीस की गठबंधन सरकार को भी इसी खांचे में रखा जा सकता है। अगर महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना सरकार जल्दी गिरती है, तो सबसे अधिक किसी दल का नुकसान होगा तो वो दल होगी शिवसेना। इस अंतराल में अगर राज ठाकरे ने प्रदेश में हिंदूवादी राजनीति में अपनी जड़ें जमा लीं तो शिवसेना बिना आत्मा वाली एक शरीर भर रह जाएगी।
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