Qutub Shahi Tomb Hyderabad: 400 साल से बिना गुंबद का है यह मकबरा, सरकार ने किया इमारत के लिए बड़ा ऐलान!
Qutub Shahi Tomb Hyderabad: हैदराबाद शहर ऐतिहासिक इमारतों के लिए भी जाना जाता है। मौजूदा दौर का यह आईटी सिटी सदियों पहले से अपनी वास्तुकला और भव्य इमारतों के लिए चर्चा में रहा है। शहर का कुतुब शाही मकबरा परिसर में मौजूद मिर्जा निजामुद्दीन अहमद का मकबरा 400 साल पुराना है। खास बात यह है कि पिछले 400 सालों से यह मकबरा बिना गुंबद के खड़ा है।
यह अधूरा ढांचा सिर्फ एक इमारत भर नहीं है, बल्कि यह सत्ता के ऐतिहासिक जंग का गवाह भी है। सरकार ने अब 400 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत को यूनेस्को का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास शुरू कर दिया है। तेलंगाना सरकार और केंद्र सरकार इस ऐतिहासिक परिसर को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा दिलाने के लिए फिर से प्रयास तेज कर रही है।

UNESCO की शर्तों को पूरा करने के लिए चल रहा काम
- यूनेस्को की शर्तों को पूरा करने के लिए आसपास के अतिक्रमण हटाने का काम 'HYDRAA' (Hyderabad Disaster Response and Asset Protection Agency) किया जा रहा है।
- इसकी मरम्मत और रख-रखाव के लिए भी इंतजाम किए जा रहे हैं। यह ऐतिहासिक इमारत सिर्फ शहरवासियों के लिए नहीं बल्कि आने वाले पर्यटकों और विदेशी सैलानियों के लिए भी खास आकर्षण रहा है।
Qutub Shahi Tomb Hyderabad: 17वीं सदी में बनकर तैयार हुआ था
- शहर की भीड़भाड़ से दूर यह मकबरा परिसर सात भव्य शाही स्मारकों का घर है। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा छठे मकबरे की ही होती है।
- यह मकबरा गोलकुंडा के सातवें सुल्तान अब्दुल्ला कुतुब शाह के दामाद मिर्जा निजामुद्दीन अहमद का है। 17वीं सदी में इसका निर्माण बड़े उत्साह से शुरू हुआ था, पर राजनीतिक संघर्ष के कारण यह अधूरा रह गया।
Qutub Shahi Tomb Hyderabad History: सत्ता के संघर्ष का गवाह
इतिहासकारों के मुताबिक, यह शाही मकबरा सत्ता की जंग का गवाह भी बना है। सुल्तान के कोई पुत्र न होने से उत्तराधिकार की लड़ाई दामादों के बीच छिड़ गई थी। निजामुद्दीन अहमद एक समय सत्ता के प्रबल दावेदार थे, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी अबुल हसन (तानाशाह) ने बाजी मार ली। सत्ता बदलते ही निजामुद्दीन को कैद कर लिया गया और मकबरे का काम हमेशा के लिए रुक गया।
शाही मकबरा बिना गुंबद भी बेमिसाल कारीगरी
गुंबद न होने के बावजूद यह मकबरा कुतुब शाही वास्तुकला का अनूठा नमूना है। पत्थरों पर उकेरी गई महीन नक्काशी आज भी उतनी ही जीवंत है। दो मंजिला इस ढांचे में गुंबद के लिए आधार तो तैयार था, लेकिन उस पर कभी छत नहीं डाली जा सकी। यही अधूरापन इसे बाकी स्मारकों से अलग पहचान देता है।
मुगल दौर में भी सुरक्षित रहा
गोलकुंडा पर औरंगजेब के हमले के बावजूद इस इमारत को कोई नुकसान नहीं पहुँचा। सदियों से यह उसी रूप में खड़ी है, जैसे निर्माण के समय छोड़ दी गई थी। यह मकबरा बताता है कि राजनीति की एक चाल कैसे भव्य सपनों को अधूरा छोड़ देती है।












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