क्वाड या ब्रिक्स? किसके ज़रिए चीन को साध सकता है भारत
अमेरिका शुक्रवार को क्वाड देशों का पहला वर्चुअल सम्मेलन आयोजित कर रहा है. इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्चुअल मुलाक़ात होगी.
व्हाइट हाउस में नया राष्ट्रपति आने के बाद उनके साथ यह भारतीय प्रधानमंत्री की पहली मुलाक़ात होगी.
क्वाड की स्थापना चीन के ख़िलाफ़ सदस्य देशों के बीच नौसैनिक क्षमता और सहयोग को बढ़ाने के लिए हुई थी लेकिन इस सम्मेलन में इससे जुड़े अजेंडे का विस्तार हुआ है.
भारत के विदेश मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़, "नेता साझा हित के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे और एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी भारत-प्रशांत क्षेत्र को बनाए रखने की दिशा में सहयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे."
विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा, "लीडर्स कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए चल रहे प्रयासों पर चर्चा करेंगे और भारत-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, सामान और सस्ते टीकों को सुनिश्चित करने में सहयोग के अवसर तलाशेंगे."
इस वर्चुअल सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन, जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा और अमेरिका के राष्ट्रपति जोसेफ़ आर. बाइडन शामिल होंगे
चीन के साथ कैसे संतुलन बनाता है भारत?
क्वाड सिक्योरिटी डायलॉग के चार सदस्य देश, यानी भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान क्षेत्र में बढ़ते चीन के असर को रोकने के लिए एक मंच पर साथ आये हैं. भारत इस मंच का एक अहम सदस्य है
दूसरी तरफ़ भारत एक ऐसे मंच में काफ़ी सक्रिय है जिसमें भारत और चीन अहम भूमिका निभाते हैं. ये मंच है ब्रिक्स का जिसमें भारत और चीन के अलावा रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका भी सदस्य हैं.
दिलचस्प बात ये है कि इस साल भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता मिली हुई है. और भारत साल के मध्य में या इसके तुरंत बाद ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला है जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शामिल होने की पूरी संभावना है.
अगर ऐसा हुआ तो ये साल की एक बड़ी घटना होगी क्योंकि पिछले साल भारत और चीन के बीच सीमा पर हुई झड़प के बाद दोनों देशों के आपसी रिश्ते खटाई में हैं.
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सवाल ये है कि भारत एक तरफ़ चीन विरोधी मंच में शामिल है और दूसरी तरफ़ चीन के साथ मिलकर एक दूसरे मंच में भी साथ है. आख़िर भारत चीन के साथ रिश्ते में संतुलन कैसे बनाने में कामयाब होता है?
मुंबई में विदेश मामलों के थिंकटैंक गेटवे हाउस के साथ जुड़े पूर्व राजदूत राजीव भाटिया कहते हैं कि भारत दो तरह से संतुलन रखता है.
वो कहते हैं, "पहली बात तो ये है कि ब्रिक्स 15 साल पुरानी संस्था है और इसमें काफ़ी सहयोग हुआ है. मगर ये संस्था उस समय बनी थी जब चीन की दुनिया में भूमिका अच्छी थी और चीन और भारत के संबंध भी अच्छे थे. मगर पिछले तीन-चार बरसों में, और ख़ासतौर से 2020 में चीन की भूमिका भी नकारात्मक हो गयी और चीन के भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ रिश्ते भी ख़राब हो गए इसलिए क्वाड को आगे किया गया."
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"क्वाड पहले भी बना था लेकिन ये चल नहीं पाया था. इसका दूसरा अवतार 2017 में सामने आया. भारत क्वाड में इसलिए शामिल है क्योंकि वो चीन को संतुलित करना चाहता है और ये तभी हो सकता है जब भारत-प्रशांत क्षेत्र की चार महाशक्तियों (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) आपस में सहयोग करें और चीन को बता दें कि क्षेत्र में जो भी काम करना है वो क़ानून के अंतर्गत करना होगा और अगर आप सहयोग नहीं देंगे तो फिर हमसे जो बन पड़ेगा हम करेंगे."
राजीव भाटिया कहते हैं, "ब्रिक्स में काफ़ी काम हो चुका है और ये एक स्थापित संस्था है, ये क्वाड की तुलना में एक अधिक विकसित संस्था है. अब भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी करने जा रहा है तो ब्रिक्स को आगे बढ़ाना इसके भी हित में है."
ब्रिक्स अधिक मज़बूत संस्था?
भारत और चीन के बीच जब रिश्ते ख़राब हुए तब ब्रिक्स को आगे ले जाने में थोड़ी रुकावट ज़रूर आयी. लेकिन जब रूस ने इसके वर्चुअल सम्मेलन की मेज़बानी की तो भारत के प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति भी इसमें शामिल हुए.
पिछले महीने चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि चीन चाहता है कि भारत ब्रिक्स सम्मेलन की मेज़बानी करे, चीन इसमें शामिल होगा, लेकिन उस समय ये नहीं कहा गया कि चीन की ओर से इसका नेतृत्व चीन के राष्ट्रपति करेंगे या कोई और करेगा.
अब तक ब्रिक्स सम्मेलन में जिनपिंग की शिरकत पर नज़र डालें तो वो पिछले पांच सालों से लगातार इसमें शामिल हो रहे हैं और भारत में विदेश नीतियों पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि उनके इस बार भी शामिल होने की पूरी संभावना है.
यूँ तो क्वाड की स्थापना 2007 में हुई थी लेकिन इसने अभी तक कोई बड़ी कामयाबी हासिल नहीं की. साल 2017 में इसे फिर से पुनर्गठित किया गया और इस साल पहला शिखर सम्मेलन होने जा रहा है.
भारत चीन का पड़ोसी है और दोनों देश 4,500 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं. भारत की चीन के प्रति नीति में इन बातों का ख़याल भी रखा जाता है इसलिए ब्रिक्स और क्वाड दोनों खेमों में भारत का होना हैरानी वाली बात नहीं है
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में सलाह दी थी कि भारत का झुकाव ब्रिक्स की तरफ़ होना चाहिए लेकिन ये सलाह भारत की विदेश नीतियों से मेल नहीं खाती.
विदेश मंत्री की चीन के प्रति नीति
भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस. जयशंकर ने हाल में एक किताब लिखी थी जिसका नाम है 'The Indian way: Strategies for an Uncertain World'. इस किताब में उन्होंने चीन पर एक पूरा चैप्टर लिखा है जिसका सारांश ये है कि चीन को मैनेज करना है.
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मैनेज करना और रिश्ते में गहराई पैदा करना दो अलग-अलग चीज़ें हैं. उनकी ये किताब भारत-चीन सीमा झड़प से पहले आयी थी. इस झड़प से पहले दोनों देशों के बीच दोस्ती मज़बूत दिख रही थी. लेकिन इसके बावजूद विदेश मंत्री ने चीन के बारे में रिश्ते को मैनेज करने की बात की.
विदेश मंत्री की किताब में ही उनकी विदेश नीतियों की झलक मिलती है. वो संयुक्त राष्ट्र जैसी कई देशों वाली संस्थाओं के बजाय कम देशों वाले छोटे ग्रुप को तरजीह देते हैं.
विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि क्वाड और ब्रिक्स दोनों में भारत के शामिल रहने में संतुलन बिगड़ने की बात है ही नहीं. सूत्रों ने कहा कि भारत हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर 'ऊंचे टेबल पर' बैठना चाहता है.
"संयुक्त राष्ट्र में कई देश हैं जहाँ आपकी लीडरशिप हमेशा निखर कर नहीं आ सकती. छोटे ग्रुप्स में भारत एक उभरते वैश्विक ताक़त की तरह पेश आता है जिससे देश का प्रोफ़ाइल बढ़ता है."
हाल के महीनों में प्रधानमंत्री मोदी ने भी वैश्विक मामलों में भारत को अहम भूमिका निभाने पर ज़ोर दिया है.
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