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Pushpak: भारत के भविष्य का 'पुष्पक'! अंतरिक्ष में ही तबाह कर देगा दुश्मन देश का सैटेलाइट

Pushpak Viman: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आंध्र प्रदेश के चित्रदुर्ग चल्लाकेरे में शुक्रवार सुबह सुबह सात बजे पुष्पक विमान की लैंडिंग कराई। पुष्पक खास तरह का स्पेस शटल है। इस विमान को भारतीय स्पेस स्टेशन पर कार्गो और सैटेलाइट्स ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है। ये खास विमान अंतरिक्ष में ही दुश्मन की सैटेलाइट को बर्बाद कर सकता है।

इसरो के पुष्पक विमान में जिस तकनीकी का इस्तेमाल किया गया है, उस पर दुनिया के चुनिंदा विकसित देश काम कर रहे हैं। ऐसी ही टेक्नोलॉजी का लाभ अमेरिका, रूस और चीन भी उठाना चाहते है। पुष्पक का इस्तेमाल अंतरिक्ष में सैटेलाइट छोड़ने के अलावा अन्य कई चीजों के लिए किया जा सकता है। इसके जरिए अंतरिक्ष में कचरा साफ करने और सैटेलाइट्स की मरम्मत के लिए भी किया जा सकता है।

Pushpak of ISRO

पुष्पक का परीक्षण सफल
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने आज यानी 22 मार्च 2024 की सुबह अपने रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (Reusable Launch Vehicle) की लैंडिंग परीक्षण किया। विमान की लैंडिंग आंध्र प्रदेश के चित्रदुर्ग चल्लाकेरे में डीआरडीओ की एक फैसिलिटी पर की गई। इसरो के मुताबिक पुष्पक की लैंडिंग सफल रही।

7 साल पहले हुआ था पहला परीक्षण
इसरो ने वर्ष 2016 में पुष्पक विमान में इस्तेमाल की गई तकनीकी का परीक्षण किया था। उस वक्त विमान को रॉकेट के ऊपर लगाकर अंतरिक्ष में छोड़ा गया था। स्पेस में लॉन्च करने के बाद विमान ने करीब 65 km तक हाइपरसोनिक स्पीड से उड़ान भरी और 180 डिग्री पर घूमकर वापस आ गया। 6.5 मीटर लंबे इस स्पेसक्राफ्ट का वजन 1.75 टन है। बाद में इसे बंगाल की खाड़ी में उतारा गया था।

डिफेंस में भारत में बढ़ाएगा ताकत
पुष्पक विमान रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल दो स्टेज का स्पेसक्राफ्ट है। पहला रीयूजेबल पंख वाला क्राफ्ट जो ऑर्बिट में जाएगा, जिसके नीचे एक रॉकेट होगा जो इसे ऑर्बिट तक पहुंचाएगा। एक बार ऑर्बिट में पहुंचने के बाद स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष में सैटेलाइट छोड़कर वापस आ जाएगा। विमान को रक्षा से जुड़े कार्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैसे करेगा दुश्मन पर हमला?
पुष्पक एक ऑटोमेटेड रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल है। जिसके जरिए डायरेक्टेड एनर्जी वेपन (DEW) चलाए जा सकते हैं। पुष्पक के जरिए बिजली ग्रिड या फिर कंप्यूटर सिस्टम को नष्ट करने जैसे काम आसानी से किए जा सकेंगे। इससे बार- बार रॉकेट बनाने का खर्च भी कन हो जाएगा। इसरो वर्ष 2030 तक इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है।

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