Punjab: आतंकवाद को खत्म करने वाले बेअंत सिंह जब खुद हो गए फिदायीन हमले के शिकार, फिर छीन ली गई फैमिली कोठी
Punjab ex CM Beant Singh story, आजादी के बाद से ही पंजाब अशांत इलाका था। अलगाववाद की वजह से आए दिन यहां हिंसक घटनाएं होती रहती थीं। इसी वजह से सरकार पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा देती थी। जून 1987 में भी सरकार ने पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाया था। 4 साल बाद स्थिति थोड़ी सुधरी तो राष्ट्रपति शासन हटाया गया।
1992 में पंजाब में चुनाव हुए और कांग्रेस को जीत मिली। बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए । नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलगाववादियों से निपटने की थी। माना जाता है कि बेअंत सिंह ने इस मामले में सफलता भी पाई थी।

कांग्रेस के दिग्गज नेता सरदार बेअंत सिंह ने 3 सालों तक मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की सेवा की। साल 1992 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली और फिर बेअंत सिंह की ताजपोशी हुई। उस वक्त उनके समक्ष अशांत प्रदेश में शांति बहाली करने की चुनौती थी। माना जाता है कि उन्होंने अलगाववादियों के खिलाफ सफलता भी हासिल की थी लेकिन 31 अगस्त, 1995 को मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर कार में बम विस्फोट होने से उनकी मौत हो गई।
31 अगस्त 1995 के दिन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह सचिवालय के बाहर अपनी कार में बैठे थे। तभी वहां एक खालिस्तानी चरमपंथी मानव बम बनकर पहुंचा और खुद को उड़ा लिया। धमाका इतना जोरदार हुआ कि लोगों को दूर तक इसकी आवाज सुनाई दी। चारो तरफ धूल और धुएं का गुबार छा गया। आसपास खून और मांस के चीथड़े फैले पड़े थे। मुख्यमंत्री की हत्या हो चुकी थी। उनके साथ 16 और लोग भी मारे गए।
31 जुलाई 2007 को कोर्ट ने इस चर्चित मामले में फैसला सुनाया। मास्टरमाइंड जगतारा सिंह और बलवंत सिंह राजोआना को सजा-ए-मौत दी गई जबकि तीन दोषियों गुरमीत, लखविंदर और शमशेर को उम्रकैद मिली। एक दोषी नसीब सिंह को 10 साल की जेल मिली। फैसले के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में अपील की गई, जहां जगतारा की सजा उम्र कैद में बदल गई, लेकिन बलवंत की सजा बरकरार रखी गई। 2019 में गुरुपर्व के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बलवंत की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का फैसला लिया था।
बेअंत सिंह का जन्म लुधियाना जिले के दोराहा के पास बिलासपुर गांव के झज्ज जाट सिख परिवार में हुआ था। उन्होंने लाहौर के सरकारी कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी। 23 साल की उम्र में वह सेना में शामिल हो गए, लेकिन दो साल बाद उनका मन परिवर्तित हुआ और उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया।
1947 के विभाजन के बाद सरदार बेअंत सिंह ने राजनीति में एंट्री की थी और फिर 1960 में वो बिलासपुर गांव के सरपंच चुने गए। इसके बाद लुधियाना में दोराहा ब्लॉक समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए। उन्होंने कुछ समय के लिए लुधियाना में सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के निदेशक के रूप में भी काम किया।
सरदार बेअंत सिंह ने साल 1969 में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज करते हुए विधानसभा पहुंचे थे। साल 1992 में सरदार बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बने। अपने राजनीतिक जीवन काल में उन्होंने कई प्रमुख मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली है। इसके अतिरिक्त वो साल 1986 से लेकर 1995 तक पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे।
हांलकि बाद में उनके परिवार को काफी दिक्कतें झेलनी पड़ी। बेंअंत की मौत के बाद उनके परिवार को रहने के लिए कोठी दी गई। पूर्व सीएम बेअंत सिंह की सरकारी कोठी को परिजनों को दे दी गई थी। जिसमें उनका बेटा रहता था। चंडीगढ़ एसडीएम सेंट्रल ने सेक्टर-5 की कोठी नंबर-33 को बाद में खाली करने का आदेश जारी कर दिया। कोठी में पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे तेज प्रकाश सिंह रहते हैं।
नोटिस की अवधि खत्म होने के बावजूद कोठी में रहने वालों ने कोठी खाली नहीं की तो सरकार ने इंफोर्समेंट टीम मौके पर भेजी थी। सरकार का तर्क है, कि कोठी का हाउस अलॉटमेंट रद्द किया जा चुका है। ऐसे में परिवार को किसी भी हाल में कोठी खाली करनी होगा। यानी 30 साल बाद बेअंत सिंह, जिन्हें शांति का पैरोकार कहा गया, खलिस्तानियों की एक ना सुनने वालों ने कुर्बानी दी। उसके साथ बेअदबी का आरोम बन गया।












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