लोकसभा चुनाव 2019: कर्नाटक की रूरल बेंगलुरु सीट, जहां का वोटर पारंपरिक और आधुनिक सोच वाला
कर्नाटक। बेंगलुरू रूरल कर्नाटक के 30 जिलों का ही एक हिस्सा है। सन् 1986 में बेंगलुरू रूरल की स्थापना हुई थी और उस समय बेंगलुरु को दो हिस्सों में बांट दिया गया था, ग्रामीण बेंगलुरु यानी रूरल और शहरी बेंगलुरु यानी अर्बन। वर्तमान में बेंगलुरू रूरल में दो डिविजन, 4 तालुका, 35 गांवों का समूह जिसे यहां की भाषा में होबल्जि कहते हैं, उसके अलावा 1,713 आबादी वाले गांव, 177 गैर-आबादी वाले, नौ कस्बे और 229 ग्राम पंचायत हैं।

सिल्क के उत्पादन के लिए मशहूर
बेंगलुरु शहर के करीब होने की वजह से रूरल इलाके में इसका असर साफ नजर आता है। यहां से लोग रोजगार के लिए रोजाना बेंगलुर शहर जाते हैं। बेंगलुरु रूरल की ज्यादातर आबादी खेती के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी यहां के कई ग्रामीण इलाके सर्विस और आईटी इंड्रस्टीज के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। देवनाहल्ली में इस समय 95 बिलियन की लागत से एक बिजनेस पार्क बन रहा है। बेंगलुरु रूरल रागी, चावल, मूंगफली, गन्ना, अरंडी, अंगूर की खेती के लिए तो मशहूर है ही साथ ही साथ यहां पर फूलों की भी खेती होती है। फूलों की खेती के सिलसिले में रूरल बेंगलूरू पूरे कर्नाटक में मशहूर है।यहां की जलवायु की वजह से यहां पर शहतूत की भी अच्छी खेती होती है। इसके अलावा यहां पर ट्रांसपोर्ट और संचार के भी बेहतर माध्यम हैं। कई वर्षों से बुनाई यहां की एक विशाल जनसंख्या का व्यवसाय भी बन गया है।
खेती के अलावा यहां पर सिल्क का अच्छा उत्पादन यहां होता है और इसकी वजह से यहां पर सिल्क की काफी इंडस्ट्रीज हैं। वहीं बेंगलुरू रूरल कई वाइनयार्ड्स के लिए भी मशहूर है और यहां पर अच्छी क्वालिटी की कई प्रकार की वाइन का उत्पादन होता है। सरकार की ओर से एक प्रस्ताव भी पेश किया जिसमें बेंगलुरुर रूरल का नाम बदलकर कैम्पेगौड़ा करने का सुझाव दिया गया है।
दक्षिण भारत की 28वीं सीट
आज हम बात करेंगे कर्नाटक राज्य की लोकसभा सीट बेंगलुरु रूरल के बारे में। रूरल बेंगलुरु दक्षिण भारत में लोकसभा की 28वीं सीट है। साल 2009 के चुनाव यहां पर हुए पहले लोकसभा चुनाव थे और पहली बार यहां से सांसद चुना गया था। वर्तमान राज्य में कर्नाटक के मुख्यमंत्री और जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी इसी संसदीय क्षेत्र से आते हैं। वह यहां के पहले सांसद थे। साल 2013 में कुमारस्वामी ने अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद यहां पर उप-चुनाव हुए और कांग्रेस के डीके सुरेश ने यह सीट जीती। इसके बाद साल 2014 में चुनावों में डीके सुरेश ने अपनी यह सीट सुरक्षित की। डीके सुरेश ने जेडीएस की अनिता कुमारस्वामी को मात दी थी। जहां सुरेश को 578,608 वोट मिले थे। वहीं अनिता को उन चुनावों में 441, 601 वोट ही मिल सके थे।
कैसी परफॉर्मेंस रही सांसद सुरेश की
अब बात करते हैं यहां पर चुनावी समीकरणों की। यहां की कुल मतदाता 21,90,397 है जिसमें से 11,35,845 पुरुष और 10,54,552 महिला मतदाता हैं। यहां की आबादी 27,56,259 है जिसमें 48.56 प्रतिशत गांवों में तो 51.44 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है। वहीं 15.96 प्रतिशत एससी तो 2.15 प्रतिशत आबादी एसटी है। साल 2014 में जब चुनाव हुए तो कुल 14,55,244 मतदाताओं ने वोट डाले थे और वोटर टर्नआउट करीब 66 प्रतिशत रहा। यहां के सांसद डीके सुरेश की अगर बात करें तो अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने लोकसभा में करीब 607 सवाल पूछे जबकि राष्ट्रीय औसत 273 है। उनकी उपस्थिति भी 86 प्रतिशत रही और उन्होंने 88 बहसों में हिस्सा लिया।












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