केजरी हों या राहुल या फिर मोदी हर जगह चंदे का काला खेल

चुनाव प्रचार के लिए जो अहम चीज आवश्यक होती है वह है चंदा। चंदे के बिना किसी भी राजनीतिक दल का वोट अभियान पूरा नहीं हो सकता। इसी चंदे को बढ़ाने के लिए कभी भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी अद्योगिक घराने के लोगों के साथ फाइव स्टार होटल में खाना खाते हैं, तो कभी रैलियों में इंट्री के 5 रुपए लेते हैं, लेकिन इन राजनीतिक दलों के फंड का सबसे बड़ा स्त्रोत हैं बड़े-बड़े बिजनेस क्लास से चंदा हासिल करना।
सवाल ये भी है कि क्या चुनावों में उपयोग होने वाला यह फंड या चंदा पूरी तरह से पारदर्शी होता है? क्या चंदा लेने और देने वालों पर कुछ टैक्स संबंधित नियम लागू होते हैं? इसका जबाव हैं नहीं। जी हां देश की अधिकरतर राजनीतिक पार्टियां चंदे के धन का ब्योरा नहीं देती। इतना ही नहीं कई राजनीतिक दल तो ऐसे भी है जो बिना चुनाव लड़े भी चंदा ले लेते हैं और उसका हिसाब भी नहीं देते।
चंदे पर क्या कहता है कानून
भारतीय कानून के मुताबिक चुनावी चंदा देने और लेने वाले सेक्शन 80जीजीसी के अधीन आते है। इस कानून के तहत जहां चंदा देने वाले की टैक्सेबल इन्कम पर छूट मिल सकती है। वो अपनी आय में करीब 33.99 फीसदी तक की बचत कर सकता है।
राजनीतिक दल देती हैं धोखा
चुनावी रण में चंदे के चल रहे गोरखधंधे को रेकने के लिए चुनाव आयोग पिछले 15 सालों से कोशिश कर रहा है, लेकिन राजनैतिक दल अपनी आमदनी और खर्च का ब्योरा देने से हमेशा बचती रही हैं। आयोग ने पिछले साल भी रानीतिक दलों को काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए 10 सुझाव दिए थे, लेकिन पार्टियों ने इनपर अमल नहीं किया।
तय की गई खर्च सीमा
चुनाव में धन के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव में 5000 करोड़ रूपये तक खर्च करने को कहा है। औसतन हर चुनाव क्षेत्र पर लगभग 10 करोड़ रुपये का खर्च होगा।
चुनाव आयोग का निर्देश
चुनाव आयोग के निर्देशों के मुताबिक इस बार एक लोकसभा प्रत्याशी को अपने चुनाव प्रचार में केवल 70 लाख रुपये तक खर्च करने की अनुमति दी गई है। अगर कोई प्रत्याशी इस आदेशका पालन नहीं करता और खर्च सीमा से अध्क खर्च करता है तो इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा।
जानकारी छुपाती हैं पार्टियां
चुनावी प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां अपने खर्च का हिसाब आयकर विभाग को सही-सही नहीं बताती है। दरअसल मौजूदा नियम के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों के लिए 20 हजार रुपये से कम के राजनीतिक चंदे का हिसाब देना जरुरी नहीं है। कई सियासी दल इसी का फायदा उठाकर ज्यादतर राशि को छोटे-छोटे हिस्सों में दर्ज करते हैं।
बिजनेस क्लास से मिलता है चंदा
एडीआर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश के अधिकतर औद्योगिक घरानों सियासी दलों को चंदा देती है। इस साल अद्योगिक घरानों से राजनीतिक पार्टियों को 379 करोड़ रुपये चंदा मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा को 1,334 कंपनियों से 192.47 करोड़ और कांग्रेस को 418 कंपनियों से 172.25 करोड़ रुपये चंदे में मिले है।












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