• search

त्रिपुरा की जीत पर पीएम मोदी का दो मिनट का मौन किनके लिए था

Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts
    पीएम मोदी
    AFP
    पीएम मोदी

    त्रिपुरा की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत पर बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पार्टी मुख्यालय पर प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन कार्यकर्ताओं को याद किया जिनकी त्रिपुरा में हत्या कर दी गई थी.

    इतना ही नहीं अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने मंच से दो मिनट के मौन रखने का आह्वान भी किया. उनसे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भी त्रिपुरा की जीत को उन कार्यकर्ताओं के लिए श्रद्धांजलि बताया था.

    उधर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने भी जीत के मौके पर अपने उन कार्यकर्ताओं को याद किया. ऐसे इस बात में स्वभाविक दिलचस्पी बनती है कि आख़िर ये कार्यकर्ता कौन थे और किन परिस्थितियों में उनकी हत्या हुई थी.

    कौन थे कार्यकर्ता

    क़रीब दो दशक पहले 6 अगस्त, 1999 को त्रिपुरा के धोलाई जनपद के कंचनछेड़ा से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के चार कार्यकर्ताओं का अपहरण कर लिया गया था. ये चार कार्यकर्ता थे- श्यामल कांति सेनगुप्ता, दीनेंद्र नाथ डे, सुधामय दत्त और शुभंकर चक्रवर्ती. तब 67 साल के श्यामल कांति सेनगुप्ता पूर्वोत्तर भारत के अलावा पश्चिम बंगाल में भी संघ के प्रभारी थे. 51 साल के दीनेंद्र नाथ असम में प्रांत प्रचारक थे, वहीं सुधामय भी 51 साल के ही थे और अगरतला में विभाग प्रचारक की भूमिका निभा रहे थे. जबकि 37 साल के शुभंकर चक्रवर्ती सबसे युवा थे.

    आरएसएस
    Getty Images
    आरएसएस

    इस हादसे के बारे में आरएसएस के चिंतक राकेश सिन्हा बताते हैं, ''ये सब कंचनछेड़ा के वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास में बैठक के लिए एकत्रित हुए थे. सुबह-सुबह किसी स्थानीय शख़्स ने एक विवाद सुलाझाने के लिए चलने का अनुरोध किया और हमारे वरिष्ठ साथी उनके साथ निकल पड़े. फिर उनके अपहरण और बाद में हत्या की ख़बर आई.''

    पांच दिनों के बाद 11 अगस्त, 1999 को इन कार्यकर्ताओं के अपहरण की ज़िम्मेदारी त्रिपुरा के अलगाववादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा ने लेते हुए मांग किया था कि राज्य सरकार त्रिपुरा स्टेट रायफ़ल्स को भंग कर दे. तब राज्य में माणिक सरकार को मुख्यमंत्री बने हुए एक साल से ज्यादा वक्त बीत चुका था.

    संघ का आरोप है कि उनके कार्यकर्ताओं के अपहरण के बाद राज्य सरकार उस तरह से सक्रिय नहीं हुई थी, जिस तरह की सक्रियता से उन कार्यकर्ताओं को बचाया जा सकता था. राकेश सिन्हा कहते हैं, ''उस दौर में संघ को तीन तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था, एक रैडिकल ईसाई ग्रुप था, दूसरा रैडिकल मुस्लिम गुट था और तीसरा बांग्लादेशी घुसपैठियों वाला अलगाववादी गुट. इनके ख़तरों के बीच वामपंथी सरकार का रुख़ भी संघ और उसके कार्यकर्ताओं के प्रति अच्छा नहीं था.''

    पीएम मोदी
    Reuters/Jayanta Dey
    पीएम मोदी

    बचाव अभियान

    इलाके में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार किसलय भट्टाचार्य कहते हैं, ''वामपंथी सरकारों के दौर में संघ या किसी दूसरी विचारधारा की राजनीति करने वालों को हिंसा का सामना करना पड़ता रहा है, ये त्रिपुरा भी था, पश्चिम बंगाल में रहा है और केरल में भी देखने को मिल रहा है.''

    हालांकि इस मामले की रिपोर्टिंग में रेडिफ़ डॉट कॉम की एक रिपोर्ट बताती है कि राज्य की पुलिस ने संघ के कार्यकर्ताओं के लिए बचाव अभियान चलाया था, लेकिन त्रिपुरा और बांग्लादेश का सीमावर्ती इलाका होने के चलते चरमपंथी सुरक्षाबल को चकमा देने में कामयाब होते रहे और संघ के कार्यकर्ताओं को वे लोग बांग्लादेशी सीमा में ले जाने में कामयाब रहे.

    इन चारों कार्यकर्ताओं के अपहरण की शिकायत को स्थानीय पुलिस के पास सबसे पहले ले जाने वाले त्रिपुरा में संघ के संगठन सचिव संजीत पाल बताते हैं, ''हम पहले मामले की गंभीरता को समझ नहीं पाए थे, हमें लगा कि हमारे साथी बातचीत करके लौट आएंगे, बाद में जब हम पुलिस के पास गए थे तो स्थानीय पुलिस ने मामला दर्ज किया और खोजबीन भी की, लेकिन कुछ पता नहीं चला. हमें लगता रहा कि पुलिस थोड़ी सक्रियता दिखाती तो क्या पता हमारे साथियों का पता चल जाता.''

    मोदी के ख़िलाफ़ नाकाम होता राजनीतिक जिहाद

    पीएम मोदी
    Getty Images
    पीएम मोदी

    वैसे संघ की ओर से ये भी कहा गया है कि बैपटिस्ट चर्च समर्थित नेशनल लिबरेशन फ़्रंट ऑफ़ त्रिपुरा के अलगाववादियों ने दो करोड़ रुपये की फ़िरौती की मांग की थी, जिसे संघ ने देने से इनकार कर दिया था. इस बारे में रेडिफ़ डॉट काम की रिपोर्ट के मुताबिक ये फ़िरौती रकम पहले एक करोड़ थी और बाद में अलगाववादी 50 लाख रुपये की मांग करने लगे थे.

    तब के संघ प्रमुख के.एस. सुदर्शन ने दिसंबर, 1999 में त्रिपुरा में संघ कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए फ़िरौती की रकम को देने से इनकार करते हुए कहा था कि अगर हमें उनकी रिहाई के लिए पैसा देते हैं, तो संघ के लिए यहां काम करना मुश्किल हो जाएगा. इस बैठक में शामिल रहे संजीत पाल का कहना है कि संघ एक सामाजिक कार्यों को करने वाला संगठन है, उसके लिए इस तरह से फ़िरौती देना संभव नहीं है क्योंकि फिर हर जगह से इस तरह के मामले देखने को मिल सकते थे.

    राकेश सिन्हा कहते हैं कि 'संघ ही नहीं संघ के अपहृत कार्याकर्ताओं का भी मानना था कि फ़िरौती की रकम देना उन लोगों के मनोबल को बढ़ाने जैसा होता. बहरहाल, लिबरेशन फ़्रंट के अलगाववादियों को लगा कि जब राज्य सरकार उनकी नहीं सुन रही है और ना ही संघ से पैसा मिलने वाला है, तो उन लोगों ने संघ के चारों कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी.

    आरएसएस
    Getty Images
    आरएसएस

    संघ के तमाम विरोध प्रदर्शन के बाद इन कार्यकर्ताओं की हत्या की जानकारी केंद्र और राज्य सरकार की ओर से लिखित संदेश के माध्यम से 28 जुलाई, 2001 को दी गई और कहा गया कि ये हत्या लगभग छह महीने पहले कर दी गई थी. जिन चारों कार्यकर्ताओं की हत्या हुई वो पूर्वोत्तर भारत में संघ की जड़ों को मज़बूत करने के लिए मोटे तौर पर दो दशक से ज्यादा समय से सक्रिय थे, लेकिन जिन परिस्थितियों में उनकी हत्या हुई उसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं हैं.

    हालांकि हत्या से महीनों पहले संभवत मार्च, 2000 के आसपास चारों प्रचारकों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र ज़रूर संघ के गुवाहटी स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को मिला था जिसमें उन चारों ने कहा था कि अभी तक हम लोग जीवित हैं, लेकिन शारीरिक और मानसिक यातना के दौर से गुज़र रहे हैं.

    अब जबकि त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन रही है तो संघ के कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि इस पूरे मामले का सच भी सामने लाने की कोशिश होगी. त्रिपुरा में संघ के संगठन सचिव संजीत पाल कहते हैं, ''हम लोगों के पास उन चारों कार्यकर्ताओं की हत्या किए जाने की महज़ सूचना है, कोई साक्ष्य नहीं मिला है अब तक. बहरहाल, इन चारों स्वयंसेवकों से जुड़े साक्ष्यों और अवशेष को जुटाने के लिए त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय ने पहल भी कर दी है. उन्होंने ट्वीट करके कहा है कि वे नई सरकार से इन स्वयंसेवकों के अवशेष जुटाने के लिए कहेंगे.

    त्रिपुरा में वामपंथ का किला फ़तह कर पाएंगे मोदी?

    त्रिपुरा में 'मोदी सरकार’ बनाम मानिक सरकार

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    PM Modis two minute silence was for Tripuras victory

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X