PM Modi on Language Diversity: देश में भाषा विवाद के बीच पीएम का संदेश, कहा-संसद में दिखी भारत की असली ताकत
PM Modi Language Statemen: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 दिसंबर को देश की भाषाई विविधता को भारत की सबसे बड़ी शक्ति बताया। पीएम ने कि अब भारत औपनिवेशिक यानी गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलकर अपनी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना रहा है।
पीएम मोदी ने कहा कि हाल ही में संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान इस बदलाव की झलक साफ तौर पर देखने को मिली। प्रधानमंत्री की तरफ से ये बयान तब सामने आया है जब देश में भाषा विवाद चल रहा है और दक्षिण के राज्य केंद्र सरकार पर हिंदी थोपने का आरोप लगा रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के मुताबिक, शीतकालीन सत्र में संसद के भीतर करीब 160 भाषण ऐसे हुए, जो हिंदी और अंग्रेज़ी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में दिए गए। इनमें लगभग 50 भाषण तमिल, 40 से अधिक मराठी और करीब 25 भाषण बंगाली भाषा में थे। उन्होंने कहा कि दुनिया की किसी भी संसद में ऐसा दृश्य बहुत कम देखने को मिलता है और यह पूरे देश के लिए गर्व की बात है।
औपनिवेशिक दौर में दबाई गई भाषाई पहचान
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ब्रिटिश काल की शिक्षा नीति का ज़िक्र करते हुए कहा कि मैकाले जैसे लोगों ने भारत की बहुभाषी संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को दबाने की कोशिश की थी। उस दौर में भारतीय भाषाओं को कमतर आंका गया, जिससे देश में गुलामी की मानसिकता गहराती चली गई।
अब ताकत बन रही है भाषाई विविधता
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का भारत उस सोच से खुद को मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जैसे-जैसे देश गुलामी की मानसिकता से बाहर निकल रहा है, वैसे-वैसे भाषाई विविधता कमजोरी नहीं बल्कि भारत की ताकत बनती जा रही है। संसद में अलग-अलग भाषाओं में हो रही बहस इसी बदलाव का प्रतीक है।
मातृभाषा से मजबूत होता है लोकतंत्र
पीएम मोदी ने कहा कि जब जनप्रतिनिधि अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में अपनी बात रखते हैं, तो लोकतंत्र और अधिक मजबूत होता है। इससे आम लोगों को भी यह एहसास होता है कि उनकी भाषा और संस्कृति को सम्मान मिल रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि भारत की सोच और सभ्यता की आत्मा हैं।
प्रधानमंत्री ने बताया कि सरकार भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रही है। नई शिक्षा नीति के तहत मातृभाषा में पढ़ाई को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और सरकारी कामकाज व तकनीक में भी भारतीय भाषाओं का दायरा बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले समय में भारत की भाषाई विविधता वैश्विक मंच पर भी देश की पहचान और शक्ति बनेगी। प्रधानमंत्री के इस बयान को देश में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और भाषाई समावेशन की दिशा में एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है।












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