बैन हो चुका कट्टरपंथी संगठन PFI, SDPI के नाम पर हो रहा खड़ा, चुनाव लड़ने की फिराक में नेता
PFI and SDPI: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने हाल ही में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एमके फैजी को वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों के सिलसिले में हिरासत में लिया है। यह मामला पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ा है, जिसे 2022 में बैन किया जा चुका है। जिसके साथ SDPI के करीबी संबंध हैं। फैजी, जो 2009 तक PFI का हिस्सा था, उसी साल SDPI का महासचिव बना और 2018 से इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व कर रहा है। इससे आप इन तीनों गुटों में संबंध समझ सकते हैं।
PFI और आतंकवाद को फंडिंग
जांच से पता चलता है कि फैजी का SDPI के संचालन पर पूरा कंट्रोल था। ED का दावा है कि फैजी ने आपराधिक साजिशों के लिए PFI द्वारा जुटाए गए पैसों का दुरुपयोग किया, इन पैसों से व्यक्तिगत रूप से लाभ उठाया। कथित तौर पर यह पैसा भारत में हिंसा और आतंकवाद को भड़काने सहित तमाम अवैध गतिविधियों को फंड करने के लिए था। ED का अनुमान है कि आतंकवाद और दंगे भड़काने के लिए 4.04 करोड़ रुपये की फंडिंग मिली थी। SDPI को PFI का सिर्फ राजनीतिक मोर्चा ही नहीं माना जाता, बल्कि वो उसका संगठनात्मक माध्यम के रूप में भी काम करता है। ये काम है कट्टरपंथी इस्लामिक गतिविधियों का प्रसार करना। PFI पर प्रतिबंध लगने से पहले उसके कार्यकर्ता ये काम करते थे।

SDPI की रणनीतिक चाल
फैजी की गिरफ्तारी के बाद ED ने PFI मामले से जुड़े 10 राज्यों में 12 ठिकानों पर छापेमारी की। मई 2009 से मई 2022 के बीच PFI संगठन से जुड़े 29 खातों में 62 करोड़ रुपये से अधिक जमा किए गए, जिनमें से आधे से ज्यादा पैसा कैश में था । खाड़ी देशों में कई अलग-अलग तरह के संगठनों ने PFI को ये पैसा दान में दिया था।
नाम बदला, काम और चेहरे वही
अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि पूर्व PFI सदस्य वर्तमान में SDPI के बैनर तले फिर से एकजुट हो रहे हैं। संगठन अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहा है, खासकर दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र में। पूर्व PFI सदस्यों को इकठ्ठा करने और उनकी गतिविधियों को जारी रखने के लिए एक नई युवा शाखा की स्थापना की गई है। ये बताता है कि संगठन का केवल नाम बदला है जबकि रणनीति, विचारधारा, काम और चेहरे सभी पुराने वाले ही हैं। सरकार इस मामले को लेकर सजग है और जांच एजेंसियां भी अपना काम तेजी से कर रही हैं।
कानूनी लूप-होल्स का फायदा उठा रही PFI
PFI ने अपने प्रतिबंध को कानूनी रूप से चुनौती दी है, लेकिन इस संगठन के कई नेताओं को जमानत मिल गई है। उदाहरण के लिए, 28 मार्च को शेख सादिक इशाक कुरैशी को इस बैन हो चुके गुट में सदस्यता के लिए ATS(Anti Terrorism Squad) द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। इसी तरह, केरल हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को दस आरोपी सदस्यों को जमानत दे दी। और अब ये SDPI के बैनर तले देखने को मिल सकते हैं।
फिर इकठ्ठे हो रहे PFI के सदस्य
कानूनी कार्रवाईयों के बावजूद, पूर्व PFI कार्यकर्ता SDPI या अन्य सहयोगी संगठनों जैसे विभिन्न बैनरों के तहत फिर से इकठ्ठे हो रहे हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में अनुकूल स्थानीय परिस्थितियों के कारण गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। पूर्व कैडर भर्ती और वैचारिक प्रचार के लिए मस्जिदों और सामाजिक समारोहों का उपयोग करते हैं। जहां पर उन्मादी भाषा का इस्तेमाल खुले तौर पर होता रहा है।
राजनीति में आना चाहती है SDPI
SDPI का लक्ष्य राज्यों में सदस्यता बढ़ाकर अपने राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करना है। इसकी योजना अगले दशक में देश भर के हर जिले में उम्मीदवार उतारने की है। केरल में, जहां इसका खासा प्रभाव है, 2031 के विधानसभा चुनावों के लिए हर जिले में तीन निर्वाचन क्षेत्रों को लक्षित किया जाएगा। जो बताता है कि चुनावी राजनीति के जरिए एक ऐसा संगठन जो कि कानूनी तौर पर खतरा मानते हुए बैन किया जा चुका है, अब राजनीति में घुसपैठ की कोशिश में लगा है। हालांकि हाल ही में हुए चुनावों में SDPI का प्रदर्शन खराब रहा, लेकिन भविष्य के चुनावों के लिए SDPI अपना समर्थन आधार बढ़ाने में जुटी है। वर्तमान में देश भर में स्थानीय निकायों में 103 निर्वाचित पदों पर काबिज, यह चुनावी सफलता के ज़रिए वैधता चाहता है। अगर ऐसा होता है तो यह देश की सुरक्षा के लिए आने वाले दिनों में एक बड़ा खतरा हो सकता है।
चुनाव लड़ने की फिराक में PFI?
PFI पर प्रतिबंध से इसके वित्तपोषण पर काफी असर पड़ा है; हालांकि, खाड़ी देशों में इसके संगठनों के माध्यम से पैसा पहुंचाने के प्रयास जारी हैं। पूर्व सदस्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम प्रोफ़ाइल बनाए रखते हुए विचारधारा के प्रचार के लिए वैकल्पिक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग करते हैं। खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय मुस्लिम प्रवासी मौजूदा प्रतिबंध के बीच भी पैसा भेजकर PFI गतिविधियों को दोबारा जिंदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चूंकि PFI-SDPI दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल में अवसर तलाश रहा है, इसलिए केंद्र सरकार की एजेंसी कार्रवाई के जरिए इनके मंसूबों पर पानी फेर सकती हैं। बावजूद इन सबके सरकार को इन पर सतत निगरानी और इसके सदस्यों पर नजर रखने की आवश्यकता है।
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