भारतीय राजनयिक सतिंदर कुमार लांबा की नज़र में पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और राजनेता - विवेचना

पाकिस्तान में उच्चायुक्त रहे सतिंदर कुमार लांबा की क़िताब प्रकाशित हुई है 'इन परसूट ऑफ़ पीस: इंडिया पाकिस्तान रिलेशंस अंडर सिक्स प्राइम मिनिस्टर्स'.

पाकिस्तान बनने पर लॉर्ड माउंडबेटन ने कहा था- 'जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है, हमारे पास प्रशासनिक रूप से स्थायी भवन, अस्थायी झोपड़ी और तंबू खींचने का विकल्प था. एक तंबू खींचने का फ़ैसला किया, इससे ज़्यादा हम कुछ कर भी नहीं सकते थे.'

इस वक्तव्य पर पाकिस्तानी अमेरिकी इतिहासकार आयशा जलाल ने अपनी क़िताब 'द स्ट्रगल फ़ॉर पाकिस्तान' में टिप्पणी की थी, "इसके बजाए कि इस तंबू को एक स्थायी भवन में बदला जाता, इसको एक विशाल सैनिक बैरक का रूप दे दिया गया."

पाकिस्तान के जन्म से ही वहाँ की सेना ने वहाँ के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

हाल ही में पाकिस्तान पर क़रीब से नज़र रखने वाले और वहाँ उप उच्चायुक्त और उच्चायुक्त के पद पर रहे सतिंदर कुमार लांबा की क़िताब 'इन परसूट ऑफ़ पीस: इंडिया पाकिस्तान रिलेशंस अंडर सिक्स प्राइम मिनिस्टर्स' प्रकाशित हुई है.

इस क़िताब में उन्होंने पाकिस्तान सरकार और सेना के संबंधों का बारीकी से अध्ययन किया है.

लांबा लिखते हैं, "पाकिस्तान में सरकार पर सेना के नियंत्रण का पहला क़दम 1954 में उस वक्त उठाया गया था, जब जनरल अयूब ख़ाँ की मदद से इस्कंदर मिर्ज़ा ने ग़ुलाम मोहम्मद का तख़्ता पलटा था. कुछ दिनों बाद अयूब ख़ाँ, मिर्ज़ा को हटा कर पाकिस्तान के राष्ट्पति बन गए. जिया उल हक़ की मौत के बाद पाकिस्तान में प्रजातंत्र बहाल ज़रूर हुआ, लेकिन बेनज़ीर भुट्टो को सेना के दबाव में साहिबज़ादा याक़ूब ख़ाँ को अपना विदेश मंत्री बनाना पड़ा."

"दो दशक बाद उनके पति आसिफ़ ज़रदारी को भी सेना के कहने पर यूसुफ़ रज़ा जिलानी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलानी पड़ी. परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े के बाद भी बड़े सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों में सेना का दख़ल कम नहीं हुआ है."

इस्लामी संगठनों से सेना की नज़दीकी

राजनीति में दख़ल के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना इस्लामिक संगठनों को भी अपने नज़दीक रखती रही है.

दक्षिण एशिया इस्लाम की विशेषज्ञ पाकिस्तानी लेखिका फ़रज़ाना शेख़ अपनी क़िताब 'मेकिंग सेंस ऑफ़ पाकिस्तान' में लिखती हैं, "ये सिलसिला 1947 में शुरू हुआ था, जब पाकिस्तानी सेना ने पठान क़बायलियों की धार्मिक भावनाओं का फ़ायदा उठाते हुए कश्मीर में हमले में उनका इस्तेमाल किया था."

"अफ़ग़ानिस्तान के गृह युद्ध में वहां के इस्लामी चरमपंथियों संगठनों का पाकिस्तानी सेना के वरिष्ठ नेतृत्व के साथ मेलजोल पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. एक तबलीग़ी जनरल जावेद नासेर 1993 में आएसआई के प्रमुख बन गए थे."

पाकिस्तानी सेना की आर्थिक ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश की एक करोड़ 10 लाख एकड़ भूमि यानी देश की 12 फ़ीसदी भूमि सेना के नियंत्रण में है.

स्टीफ़ेन पी कोहेन अपनी क़िताब 'द पाकिस्तानी आर्मी' में लिखते हैं, "पाकिस्तान की सेना ने न कभी स्वीकार किया है और न ही समझा है कि उसका मुख्य काम देश की रक्षा करना और देश की सरकार के आदेशों का पालन करना है न कि उसे आदेश देना है."

सिंध और बंगाल का कोई जनरल पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष नहीं बना

पाकिस्तानी सेना प्रमुखों में चार जनरल अयूब ख़ाँ, जनरल याह्या ख़ाँ, जनरल अब्दुल वहीद काकड़ और लेफ़्टिनेंट जनरल ग़ुल हसन ख़ाँ पश्तून रहे हैं.

तीन जनरल जनरल ज़िया उल हक़, जनरल मिर्ज़ा अफ़ज़ल बेग और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ 1947 में भारत से पाकिस्तान गए थे. जनरल मोहम्मद मूसा ख़ाँ बलोचिस्तान से थे.

इनमें से चार जनरलों अयूब ख़ाँ, याहया ख़ाँ, ज़ियाउल हक़ और परवेज़ मुशर्ऱफ़ ने अपने आप को पाकिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया.

इन जनरलों में जहांगीर करामत को ज़बरदस्ती रिटायर किया गया और आसिफ़ नवाज़ जनजुआ की अपने कार्यकाल के दौरान मौत हो गई.

सतिंदर लांबा लिखते हैं, "सिंध से एक भी व्यक्ति पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष नहीं हुआ, न ही पूर्वी पाकिस्तान से किसी को इस पद के लायक समझा गया. इसका कारण ये बताया गया कि बंगालियों की लड़ने की पृष्ठभूमि नहीं रही है. लेकिन भारत में 1962 से 1966 के दौरान एक बंगाली जनरल जयंतनाथ चौधरी सफलतापूर्वक सेनाध्यक्ष का दायित्व निभा रहे थे."

"वर्ष 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय वो ही भारत के सेनाध्यक्ष थे. दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तानी जनरलों में सिर्फ़ दो याहया ख़ाँ और मूसा ख़ाँ ही शिया थे."

वरिष्ठ जनरलों की अनदेखी

पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का प्रभुत्व रहा है. सेना के 75 फ़ीसदी जवान पंजाब के तीन ज़िलों रावलपिंडी, कैंबेलपुर और झेलम से लिए जाते थे.

बाद में अयूब ख़ाँ की वजह से उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत के दो ज़िलों कोहाट और मर्दान को भी सेना के कैचमेंट क्षेत्र में शामिल कर लिया गया.

जब अयूब ख़ाँ को पाकिस्तान का पहला कमांडर इन चीफ़ बनाया गया, तो उसे उनके साथियों ने पसंद नहीं किया.

शालिनी चावला अपनी क़िताब 'पाकिस्तान्स मिलिट्री एंड इट्स स्ट्रेटजी' में लिखती हैं, "अयूब न तो सबसे अधिक लोकप्रिय थे और न ही सबसे वरिष्ठ."

ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने अपने दो पसंदीदा लोगों जनरल टिक्का ख़ाँ और जनरल ज़िया उल हक़ की सेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की. दोनों ही सबसे वरिष्ठ नहीं थे, लेकिन उन्होंने ये आभास दिया कि वो भुट्टो का कहना मानेंगे.

जब आसिफ़ नवाज़ जनजुआ का देहावसान हुआ, तो उनकी जगह लगभग गुमनाम जनरल अब्दुल वहीद काकड़ को सेनाध्यक्ष चुना गया.

नवाज़ शरीफ़ ने सबसे सीनियर अली कुली खटक के ऊपर परवेज़ मुशर्रफ़ को तरजीह दी.

जनरल ज़िया उल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ दोनों ने उन्हीं लोगों का तख़्ता पलटा, जिन्होंने उन्हें नियुक्त किया था.

जनरल कयानी को उनके निर्धारित तीन साल के कार्यकाल से तीन साल और अधिक का सेवा विस्तार मिला.

जनरल राहिल शरीफ़ को भी जब 29 नवंबर, 2013 को सेनाध्यक्ष बनाया गया, तो वो सबसे वरिष्ठ जनरल नहीं थे.

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कई आईएसआई प्रमुखों को बर्ख़ास्त या ज़बरदस्ती रिटायर किया गया

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई दुनिया की सबसे बड़ी ख़ुफ़िया एजेंसी होने का दावा करती है.

अभी तक ये सार्वजनिक नहीं हुआ है कि कितने लोग आईएसआई के लिए काम करते हैं. लेकिन आकलन है कि क़रीब 10,000 लोग आईएसआई के पेरोल पर हैं, जिनमें मुखबिर शामिल नहीं हैं.

सतिंदर लांबा लिखते हैं, "90 के दशक में चार आईएसआई प्रमुखों को या तो बर्ख़ास्त किया गया है या ज़बरदस्ती रिटायर किया गया है. वर्ष 1993 के राजनीतिक संकट के दौरान बेनज़ीर को बिना मांगी सलाह देने के आरोप में सेनाध्यक्ष अब्दुल वहीद ने लेफ़्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी को आईएसआई के प्रमुख के पद से बर्ख़ास्त कर दिया था. ये अलग बात है कि बाद में बेनज़ीर भुट्टो ने ही उन्हें जर्मनी में पाकिस्तान का राजदूत नियुक्त किया था."

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उनके बाद इस पद पर आए जावेद नासेर को भी मई 1993 में ज़बरदस्ती रिटायर कर दिया गया था.

दिलचस्प बात ये है कि वो तबलीग़ी जमात के सदस्य थे. बोस्निया में सर्बियाई सेना के ख़िलाफ़ उनकी कथित भूमिका के बावजूद पाकिस्तान ने 2013 में उन्हें अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण को सौंपने से इनकार कर दिया था.

पाकिस्तान की तरफ़ से ये तर्क दिया गया था कि हाल की सड़क दुर्घटना में नासेर की याददाश्त चली गई है.

मुशर्रफ़ के सैनिक विद्रोह के बाद आईएसआई के प्रमुख जनरल ज़ियाउद्दीन बट्ट को नौकरी से निकाल दिया गया था.

उनके बाद मुशर्रफ़ ने जनरल महमूद अहमद को इस पद के लिए चुना था, लेकिन 9/11 के तुरंत बाद उन्हें भी इस पद से हटा दिया गया था.

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आईएसआई पर देश की अंदरूनी राजनीति में दख़ल देने का आरोप

पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में आईएसआई के दख़ल के कारण उस पर चुनाव में धांधली करने, बलूचिस्तान में विद्रोह को दबाने और कश्मीर में घुसपैठ करने के आरोप लगे.

अहमद रशीद अपनी क़िताब 'पाकिस्तान ऑन द ब्रिंक' में लिखते हैं, "आईएसआई ख़ुफ़िया जानकारी जमा करती है. वो ये भी तय करती है कि कौन सा ऑपरेशन किया जाना है और फिर वो उसे बिना किसी नियंत्रण के अंजाम देती है."

"50 के दशक के बाद अयूब ख़ाँ के सत्ता में आने के बाद आईएसआई और एमआई को विरोधी राजनेताओं की ख़ुफ़िया जानकारी लेने के लिए इस्तेमाल किया गया है ताकि सैनिक शासन को मज़बूत बनाया जा सके."

आईएसआई ने ख़ुफ़िया जानकारी जमा करने तक ही अपनी भूमिका को सीमित नहीं रखा है.

मीडिया को प्रभावित करने, राजनीतिक प्रचार को बढ़ावा देने, राजनेताओं, पत्रकारों और राजनयिकों पर नज़र रखने और सबसे महत्वपूर्ण भारत और अफ़ग़ानिस्तान में गुप्त गतिविधियों के लिए आईएसआई का इस्तेमाल होता रहा है.

अहमद रशीद लिखते हैं, "नेहरू के देहावसान के बाद पैदा हुए शून्य का आईएसआई फ़ायदा उठाना चाहती थी, जिसकी वजह से 1965 में पाकिस्तान ने भारत से लड़ाई लड़ी. ब्रिगेडियर रियाज़ हुसैन के नेतृत्व में आईएसआई ने मानना शुरू कर दिया था कि भारत में हस्तक्षेप करने का निर्णायक समय आ पहुँचा है."

सेना के कहने पर सरकारी फ़ैसले बदले गए

पाकिस्तान में सेना असैनिक सरकार से मार्गदर्शन लेने में हिचकिचा रही है.

स्टीफ़ेन कोहेन लिखते हैं, "वास्तव में पाकिस्तान की विदेश नीति सेना की विदेश नीति बन गई है. कम से कम दो ऐसे मौक़े आए हैं, जब प्रधानमंत्री गिलानी के फ़ैसले को सेना के कहने पर बदल दिया गया."

सतिंदर लांबा लिखते हैं, "26/11 के बाद 2011, जब गिलानी ने जाँच के लिए आईएसआई के प्रमुख के भारत जाने का प्रस्ताव किया, तो सेना ने उसे स्वीकार नहीं किया. इससे पहले 26 जुलाई, 2008 को जब प्रेस सूचना ब्यूरो ने आईएसआई के गृह मंत्रालय के नियंत्रण में जाने की अधिसूचना छापी, तो उसे 24 घंटे के अंदर वापस ले लिया गया."

"2 मई, 2011 को ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका के तब के ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ माइक मलेन ने इसकी पहली सूचना राष्ट्रपति ज़रदारी को न देकर सेना प्रमुख कयानी को दी थी."

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जनरल ज़िया उल हक़ की तहज़ीब और शिष्टाचार

पाकिस्तान के जिस सेनाध्यक्ष के साथ सतिंदर लांबा ने सबसे अधिक समय बिताया, वो थे जनरल ज़िया उल हक.

इस दौरान उन्हें जनरल ज़िया को बहुत नज़दीक से देखने का मौक़ा मिला.

लांबा लिखते हैं, "एक बार मैंने नोट किया कि राष्ट्रपति ज़िया और उनके विदेश मंत्री साहबज़ादा याक़ूब ख़ाँ एक दूसरे को 'सर' कह कर संबोधित कर रहे हैं. इसकी वजह ये थी कि जनरल ज़िया सेना में याक़ूब ख़ाँ के अंडर काम कर चुके थे. लेकिन एक समय ऐसा आया कि ज़िया उनके अफ़सर बन गए. जनरल ज़िया चाहे जितने बड़े तानाशाह रहे हों लेकिन वो अपने शिष्टाचार के लिए पूरी दुनिया में मशहूर थे."

लांबा लिखते हैं, "जब मैं उनसे मिलने ऐवान-ए-सद्र गया, तो गेट में घुसने से पहले ही मैंने अपने ड्राइवर से कहा कि वो मेरी सरकारी मर्सिडीज़ कार का इंजन चालू रखे, क्योंकि उस कार को स्टार्ट होने में थोड़ा समय लगता था. मुझे पता था कि जनरल ज़िया अपने हर मेहमान को उसकी कार तक छोड़ने आते हैं और मैं उन्हें इंतज़ार नहीं करवाना चाहता था. मेरा अनुमान सही निकला. राष्ट्रपति ज़िया बातचीत के बाद मुझे मेरी कार तक छोड़ने आए."

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जैल सिंह ने ली ज़िया का चुटकी

ज़िया की एक और आदत थी वो अपने हर मेहमान कोई न कोई तोहफ़ा ज़रूर देते थे.

जॉर्ज फ़र्नांडिस पहले से तय करके पाकिस्तान गए थे कि वो ज़िया के सामने बेनज़ीर का मुद्दा उठाएँगे. लेकिन जब वो वापस लौटे तो वो ज़िया की तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे.

उस बैठक में जनरल ज़िया ने ये कहकर जॉर्ज का दिल जीत लिया कि वो उनसे सीखना चाहते हैं कि मज़दूरों का हित किस तरह से किया जाए.

जब ज़िया गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली आए, तो राष्ट्रपति जैल सिंह से मिलने राष्ट्रपति भवन गए.

सतिंदर लांबा लिखते हैं, "वहाँ उन्होंने भारत के साथ शांति की इच्छा प्रकट की. उस समय पाकिस्तान पंजाब में चरमपंथियों की मदद कर रहा था. जैल सिंह ने पंजाबी में ज़िया की चुटकी लेते हुए कहा एक महिला एक समय में दो काम नहीं कर सकती, 'अक्ख भी मारे, ते गूँगट भी काडे.' वहाँ मौजूद सभी लोगों ने जैल सिंह के मुँह से ये जुमला सुन कर ठहाका लगाया, लेकिन उन्होंने अपनी बात हँस कर ज़िया तक पहुँचा दी थी."

लांबा की नवाज़ शरीफ़ से नज़दीकी

जनरल ज़िया के शासन के दौरान लांबा का बेनज़ीर भुट्टो से मिलना नामुमकिन था, क्योंकि वो या तो जेल में रहती थीं या अपने घर में नज़रबंद रहती थीं.

लेकिन जब वो प्रधानमंत्री बन गईं, तो सतिंदर लांबा उनसे मिलने गए.

लांबा लिखते हैं, "मैं ये देख कर थोड़ा हैरान हुआ कि जहाँ हम बैठे हुए थे, पर्दे के पीछे से उनके बच्चे हमें झाँक कर देख रहे थे. उन्होंने उनको हाथ दिखा कर वहाँ से चले जाने के लिए कहा और फिर हँसते हुए मुझसे बोलीं, दरअसल ये लोग उस केक की फ़िराक में हैं, जो मैंने आपको सर्व किया है. उन्हें मालूम है कि बातचीत में मश्ग़ूल होने के कारण आप वो केक नहीं खाएँगे. उस पर ये लोग अपना हाथ साफ़ करेंगे."

जिस प्रधानमंत्री से सतिंदर लांबा की सबसे अधिक बनी, वो थे नवाज़ शरीफ़.

राष्ट्रपति को अपना परिचय पत्र पेश करने के तुरंत बाद नवाज़ शरीफ़ ने सतिंदर लांबा को अपने घर पर दिन के खाने पर बुला लिया.

लांबा लिखते हैं, "खाने के बाद नवाज़ शरीफ़ ने मुझसे पूछा मैं इस्लामाबाद में आपके लिए क्या कर सकता हूँ? मैंने कहा मेरा सिर्फ़ यही अनुरोध है कि जब भी ज़रूरी हो, मैं आपसे मिल सकूँ. उन्होंने तुरंत इस काम के लिए अपने दफ़्तर के एक अधिकारी की ड्यूटी लगा दी और उसका नंबर मुझे दे दिया. इसकी वजह से मेरी नवाज़ शरीफ़ से कई मुलाक़ातें हुईं. सिर्फ़ एक बार जिस दिन बाबरी मस्जिद टूटी थी, उन्होंने अपना वादा नहीं निभाया और मुझसे नहीं मिले."

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गुजराल और नवाज़ शरीफ़ की न्यूयॉर्क में मुलाक़ात

एक बार नवाज़ शरीफ़ निजी यात्रा पर दिल्ली आए.

सतिंदर लांबा लिखते हैं, "उस समय मैं विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान अफ़गानिस्तान ईरान डेस्क का प्रमुख था. मैं उनको रात के खाने पर ताजमहल होटल के रेस्तरां 'हाउज़ ऑफ़ मिंग' ले गया. वहाँ एक वेटर ने ग़लती से नवाज़ शरीफ़ के सफ़ेद सूट पर सूप गिरा दिया. होटल के प्रबंधक ने आकर उनसे माफ़ी मांगी और उनका सूट ड्राइक्लीन करवाने की पेशकश की. लेकिन नवाज़ शरीफ़ ने मुस्कुरा कर उस पेशकश को अस्वीकार कर दिया."

जब नवाज़ शरीफ़ भारत के प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल से न्यूयॉर्क में उनके होटल में मिले, तो गुजराल ने उनसे गर्मजोशी से हाथ तो मिलाया लेकिन नवाज़ शरीफ़ की उनको गले लगाने की कोशिश को बढ़ावा नहीं दिया. शायद उनके दिमाग़ में था कि जब उन्होंने सद्दाम हुसैन को गले लगाया था, तो उन्हें भारत में काफ़ी आलोचना का शिकार होना पड़ा था.

इंदर कुमार गुजराल अपनी आत्मकथा 'मैटर्स ऑफ़ डिसक्रेशन' में लिखते हैं, "मैंने उन्हें अपने आप को गले नहीं लगाने दिया क्योंकि मुझे इस बात का डर था कि कहीं इसे भारत में ग़लत न समझा जाए. शरीफ़ ने बातचीत की शुरुआत इस पेशकश से की कि पाकिस्तान अपनी अतिरिक्त बिजली भारत को बेचना चाहता है. लेकिन उनके ही एक साथी ने ये कह कर इस पेशकश को आगे नहीं बढ़ने दिया कि हमारे पास बातचीत करने के लिए इससे बड़े विषय हैं. मुझे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के दल का सदस्य हमारी उपस्थिति में उनकी उपेक्षा कर रहा है."

सिर्फ़ पाँच भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए

भारत के कुल 14 प्रधानमंत्रियों में से 9 ने अपने कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान का दौरा नहीं किया.

इंदिरा गांधी एक बार भी पाकिस्तान नहीं गई. मनमोहन सिंह भी अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान एक बार भी पाकिस्तान नहीं गए, जबकि उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ था.

अटल बिहारी वाजपेयी
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अटल बिहारी वाजपेयी

लाल बहादुर शास्त्री, राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी ने सिर्फ़ एक बार पाकिस्तान का दौरा किया.

अटल बिहारी वाजपेयी को दो बार पाकिस्तान जाने का मौक़ा मिला. उन्होंने लाहौर में मीनार ए पाकिस्तान पर फूल चढ़ाए, जहाँ से 1940 में पृथक देश पाकिस्तान बनाने का आह्वान किया गया था.

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