OPINION: तेलंगाना में फिर तेजी से बदल रहा है समीकरण, जो एकजुट है, जीत उसी की तय है!
तेलंगाना में चुनावी अभियान जोरदार तरीके से चल रहा है। मुख्य मुकाबला सत्ताधारी बीआरएस और कांग्रेस में ही लग रहा है। दोनों को ही अपनी-अपनी जीत को लेकर पक्का यकीन है। सीएम केसीआर तीसरी बार भी सत्ता में बने रहने के लिए मैदान में जोरदार तरीके से डटे हुए हैं। वहीं कांग्रेस अभी नहीं तो कभी नहीं वाली लड़ाई लड़ रही है। बीजेपी भी मैदान में जमी हुई है।
सीएम केसीआर और बीआरएस के नेता सघन प्रचार-अभियान में जुटे हुए हैं। पार्टी ने चुनावों के लिए स्पेशल वॉर रूम बना रखे हैं। यहां से हर विधानसभा क्षेत्रों से सूचनाएं जुटाई जा रही हैं। जो भी जरूरत है, उसके हिसाब से कदम उठाए जा रहे है।

कांग्रेस 55 उम्मीदवारों की अपनी पहली लिस्ट निकाल चुकी है। दूसरी लिस्ट में दूसरी पार्टियों से आए नेताओं के लिए सीट तय करने की माथापच्ची हो रही है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी सबसे बड़ा जिताऊ प्रचारक मानकर चल रही है। बीजेपी के भी शीर्ष नेता मैदान में जोड़ लगा रहे हैं। कुल मिलाकर राज्य में त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। लेकिन, मुख्य मुकाबला अभी भी कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति के बीच ही दिख रहा है।
कांग्रेस पूरी तरह से अपनी 6 गारंटियों से जीत तय मानकर चल रही है। उसे भरोसा है कि उसने वोट बटोरने की जो मशीन बनाई है, उसके दम पर मतदान के दिन वोटों की फसल काटने की गारंटी है। कांग्रेस की काट में सीएम केसीआर को बीआरएस के चुनावी घोषणापत्र में भरोसा है। हर परिवार के लिए बीमा का वादा किया गया है। इसके अलावा सामाजिक पेंशनों में बढ़ोतरी, महिलाओं को वित्तीय सहायता, गैस सिलिंडरों पर सब्सिडी, किसानों के लिए ज्यादा बीमा का वादा पर इसे पूरा यकीन है।
बीआरएस तेलंगाना में लगभग 10 वर्षों से सत्ता में है। उसकी ओर से मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि राज्य की वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं है कि कांग्रेस ने जो गारंटियां दी हैं, उसे पूरा किया जा सके। जबकि, अगर बीआरएस फिर से सत्ता में आती है तो जितने भी वादे किए हैं, वह चरणबद्ध तरीके से लागू किए जाएंगे। बीआरएस कांग्रेस से सवाल पूछ रही है कि उसका सीएम का असली चेहरा है कौन। बीआरएस का अपना अनुमान है कि कांग्रेस की ताकत 4 जिलों को छोड़कर कहीं नहीं बढ़ी है। क्योंकि, कुछ इलाकों में बीजेपी भी मजबूत है, इसलिए भारत राष्ट्र समिति के नेता एंटी-इंकंबेंसी वोट के बंटने का हिसाब लगा रहे हैं।
सर्वे कांग्रेस के ही नहीं बीआरएस के समर्थन में भी आ रहे हैं। इसके आधार पर अनुमान यह लगाया जा रहा है कि अगर कांग्रेस अच्छा करती भी है तो यह बीआरएस के सामने सिर्फ कड़ी लड़ाई खड़ी कर सकती है। तेलंगाना में और खासकर हैदराबाद में बीते 10 वर्षों में जो सामाजिक स्तर में बदलाव हुआ है, वह बीआरएस के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहा है। सरकार का जो ट्रैक रिकॉर्ड रहा है, वह उसके पक्ष में जाता नजर आ रहा है।
कांग्रेस और बीजेपी में ऐसे नेताओं की कमी है, जो केसीआर की चुनावी रणनीतियों को भांप करके उस हिसाब से अपनी तैयारियां कर सकें। कांग्रेस और बीजेपी के अंदर जो परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, उससे बीआरएस के नेताओं का हौसला मिल रहा है। ऊपर से स्टार कैंपेनर के तौर पर सीएम केसीआर की लोकप्रियता और केटीआर-हरीश राव जैसे संकटमोचकों के दम पर बीआरएस हैट्रिक की लड़ाई के लिए आगे बढ़ चुकी है। तेलंगाना में अभी जिस तरह का चुनावी माहौल है, उस आधार पर बीआरएस के नेताओं का आत्मबल मजबूत है और उन्हें भरोसा है कि सीएम केसीआर तीसरी बार सत्ता में लौट रहे हैं।












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