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One Nation One Election Bill: एक देश एक चुनाव कब से लागू हो सकता है? इससे जुड़ी 10 जरूरी बात समझिए

One Nation One Election Bill: केंद्र सरकार ने 17 दिसंबर,2024 (मंगलवार) को लोकसभा में संविधान (129वां संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित सरकार (संशोधन) विधेयक 2024 पेश किया, ताकि देश में लोकसभा चुनाव,राज्य विधानसभा चुनाव और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) की विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ करवाए जा सकें। मौजूदा विधेयक में निगम और पंचायत चुनावों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।

लोकसभा में प्रस्ताव पेश करने के पक्ष में 269 और विरोध में 198 मत पड़े। इसके लिए नई संसद में पहली बार इलेक्ट्रोनिक वोटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया।

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1) वन नेशनल,वन इलेक्शन बिल क्या है?
देश में चुनाव चक्र को सुधारने के लिए लोकसभा के चुनावों के साथ ही सभी विधानसभा चुनाव भी करवाने के लिए यह व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। अभी लोकसभा चुनाव और विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसकी वजह से देश में हर साल कोई न कोई चुनाव चलता ही रहता है।

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2) कब से लागू होगा वन नेशनल,वन इलेक्शन?
सभी तरह से परिस्थितियां सामान्य रहीं तो देश में एक देश, एक चुनाव को आकार लेते-लेते साल 2034 हो जाने की संभावना है। उसी चुनाव चक्र से फिलहाल यह व्यवस्था शुरू हो पाने की संभावना दिख रही है।

क्योंकि,संविधान संशोधन विधेयक में कहा गया है, 'राष्ट्रपति,आम चुनाव के उपरांत लोकसभा की पहली बैठक की तारीख को जारी की गई सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से इस अनुच्छेद (82ए) के उपबंधों को लागू कर सकेगा और अधिसूचना की वह तिथि नियत तिथि कहलाएगी।'

इस तरह से लगता है कि अगली लोकसभा की पहली बैठक 2029 में होगी और नया चुनाव चक्र 2034 में शुरू होगा,यह मानते हुए कि 18वीं और 19वीं दोनों ही लोकसभा अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करें।

3) दोनों सदनों से विधेयक को पारित कराने के लिए कितने बहुमत की जरूरत है?
संविधान संशोधन को संसद से पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही 'विशेष बहुमत'की जरूरत पड़ेगी। संविधान के अनुच्छेद 368 (संसद को मिली संविधान संशोधन की शक्ति) के तहत संशोधन के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए।

पहली, लोकसभा और राज्यसभा के आधे सदस्य निश्चित रूप से संशोधन के पक्ष में वोट करें। दूसरी, सभी उपस्थित और मतदान में हिस्सा लेने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई को संशोधन के पक्ष में मतदान करना होगा।

4) क्या राज्यों की सहमति आवश्यक है?
अभी सिर्फ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के ही साथ करवाने का प्रस्ताव है। अगर निगम,स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों को भी साथ करवाने का प्रस्ताव होता तो उसके लिए देश के कम से कम आधे राज्यों से संशोधन को 'अनुमोदित' करवाना आवश्यक होगा।
प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए इस चरण में इन स्थानीय चुनावों को बाहर रखा गया है।

5) किसी राज्य में सरकार गिर जाने पर क्या पूरे देश में फिर से चुनाव होंगे?
नहीं, किसी राज्य विधानसभा के पूर्ण कार्यकाल से पहले भंग हो जाने की स्थिति में,उस राज्य की पूर्ववर्ती विधानसभा के बाकी कार्यकाल के लिए ही चुनाव कराए जाएंगे। लोकसभा के लिए भी यही व्यवस्था रखने का प्रस्ताव है।

6) बीच में चुनी गई विधानसभा का कार्यकाल क्या होगा?
मौजूदा विधायेक में एक नया अनुच्छेद 82ए शामिल किया गया है। इसमें 1 से लेकर 6 खंड हैं। 82ए (6) कहता है कि यदि किसी विधानसभा का चुनाव स्थगित कर दिया जाता है (यानी चुनाव चक्र के बीच में वहां के लिए चुनाव करवाना पड़ता है),तो उस विधानसभा का कार्यकाल भी लोकसभा के कार्यकाल पूर्ण के साथ ही समाप्त हो जाएगा।

7) वन नेशनल,वन इलेक्शन के प्रमुख फायदे क्या हैं?
मौजूदा समय में देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। इसकी वजह से पूरे साल चुनावों का सिलसिला चलता ही रहता है। इससे कई बार शासन के कार्य बाधित होते हैं और महत्वपूर्ण संसाधनों की भी हानि होती है। एक साथ चुनाव से चुनाव पर खर्चों में कमी आएगी, सरकारी संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा और मतदान में भी बढ़ोतरी की संभावना रहेगी।

CII, FICCI, और ASSOCHAM जैसे व्यापारिक संगठनों ने भी वन नेशन वन इलेक्शन के प्रस्ताव का समर्थन किया है।

8) एक देश, एक चुनाव की प्रमुख चुनौतियां और जोखिम
नई व्यवस्था को अपनाने में पर्याप्त ईवीएम जुटाने, मतदानकर्मियों की ज्यादा संख्या और सुरक्षाकर्मियों की बढ़ी हुई संख्या चुनौती बन सकती हैं। आलोचकों की शिकायत रही है कि एकसाथ चुनाव करवाने की वजह से राष्ट्रीय मुद्दे सभी मुद्दों पर भारी पड़ेंगे, जिससे स्थानीय मुद्दे पीछे छूट सकते हैं और यह देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

9) वन नेशनल वन इलेक्शन में कितना खर्च आएगा?
एक अनुमान के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनावों में देश का करीब 60,000 करोड़ रुपए खर्च हुआ था। इसमें राजनीतिक दलों का खर्चा भी शामिल था और चुनाव आयोग पर आई लागत भी सम्मिलित थी। वन नेशन वन इलेक्शन के समर्थन में यही तर्क दिया जाता है कि नई व्यवस्था से लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आने वाली कुल लागत में अप्रत्याशित कमी आ सकती है।

10) वन नेशन वन इलेक्शन की अभी क्या स्थिति है?
ये विधेयक अब विस्तार से विचार के लिए संसद की संयुक्त समिति (JPC) में भेजा जाएगा। लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने इसके लिए 31 सदस्यीय समिति का गठन किया है। 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से लिए गए हैं।

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बीजेपी सांसद पीपी चौधरी जेपीसी की अगुवाई करेंगे और इसमें भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर,संबित पात्रा और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा को भी जगह दी गई है। यह समिति 90 दिनों तक इसपर विचार करेगी। हालांकि, वह समय बढ़ाने की भी मांग कर सकती है। फिर ये बिल सदन में लाया जाएगा और यहां पारित होने के बाद इसे अनुमोदन के लिए राज्यसभा में भेजा जाएगा। दोनों सदनों से पर्याप्त बहुमत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ यह अस्तित्व में आ सकता है।

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