Nitish Kumar:'शेर-ए-बिहार' को हराने वाला 'बच्चा', जो 8वीं बार CM बना है, ऐसी रही है नीतीश की राजनीति
नीतीश कुमार ने 10 अगस्त, 2022 को जब आरजेडी के साथ फिर से गठबंधन सरकार बनाकर बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो यहां से उनका आठवां कार्यकाल शुरू हुआ था। इससे एक दिन पहले ही उन्होंने 8 साल में दूसरी बार बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ा था। लेकिन, नीतीश की राजनीति में गठबंधन तोड़ने और बनाने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। पिछले करीब तीन दशकों से यह उनकी सियासत की पहचान बन चुकी है। नीतीश कुमार पिछले लगभग पांच दशकों से राजनीति में सक्रिय हैं और पिछले डेढ़ दशकों से ज्यादा समय से तो बिहार की राजनीति के पर्याय बने हुए हैं।

नीतीश कुमार 17 साल से बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता हैं
नीतीश कुमार मोटे तौर पर नवंबर 2005 से ही बिहार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। वैसे पहली बार उन्होंने सीएम पद की शपथ साल 2000 में ही ली थी, लेकिन उनका 3ह कार्यकाल सिर्फ हफ्ते भर का रहा था। 2014 से 2015 के बीच लगभग 9 महीनों के लिए उन्होंने जीतन राम मांझी को अपनी कुर्सी जरूर दे दी थी, लेकिन फिर वापस ऐसे जमे कि सहयोगी दल बदलते रहे, लेकिन सीएम के तौर पर उनकी सत्ता बरकरार रही। 1 मार्च, 1951 को पटना जिले के बख्तियारपुर में जन्मे नीतीश राजनीति में जेपी आंदोलन की पैदाइश हैं। 1974 से 1977 तक उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भाग लिया और मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी ऐक्ट (MISA) के तहत हिरासत में भी लिए गए। 1975 में आपातकाल के दौरान भी उनपर तत्कालीन कांग्रेस की सरकार का डंडा चला और जेल भेज दिए गए। इस समय वे जिस महागठबंधन सरकार की अगुवाई कर रहे हैं, उसमें लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल तो है ही, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों का भी समर्थन हासिल है।

'शेर-ए-बिहार' को हराने वाला 'बच्चा', जिसने 8वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
बिहार की राजनीति में आज नीतीश कुमार अपने मित्र और वरिष्ठ सहयोगी लालू यादव की सियासत पर भी भारी पड़ रहे हैं। क्योंकि, उनका कार्यकाल लालू-राबड़ी के संयुक्त कार्यकाल से भी आगे निकल चुका है। साथ ही जितनी बार उन्होंने राजनीति में बखूबी दोस्ती और दुश्मनी निभाई है, उससे वे सियासत में राजद सुप्रीमो से भी धुरंधर साबित हुए हैं। चुनावी राजनीति में नीतीश को पहली सफलता 1985 में मिली थी, जब वह अपने नालंदा जिले के पुश्तैनी इलाके की हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव जीता था। इससे पहले 1977 में भी उन्होंने जनता पार्टी से चुनावी किस्मत आजमाया था, लेकिन असफल हो गए थे। इसके बाद वे बिहार में युवा लोकदल के अध्यक्ष बने। बाद में जब कांग्रेस सरकार के खिलाफ चौधरी देवीलाल और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में जनता दल बना, तो नीतीश कुमार बिहार में उसके महासचिव बनाए गए। नीतीश का सियासी ग्राफ सबसे पहले यहीं पर परवान चढ़ा था। 1989 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिहार की बाढ़ लोकसभा सीट पर कांग्रेस के दिग्गज रामलखन सिंह यादव को पटखनी दी थी, जिन्हें कि 'शेर-ए-बिहार' कहा जाता था। लालू यादव से पहले बिहार में इन्हें ही यादवों का सबसे बड़ा नेता माना जाता था। उस दौर में नीतीश जैसे युवा नेता के हाथों रामलखन सिंह यादव जैसे जनाधार वाले नेता का हारना बहुत बड़ी बात थी। उस चुनाव के बाद एक नारा चर्चित हुआ था- 'शेर-ए-बिहार कहलाते हो, बच्चे से हार जाते हो।' बिहार की सियासत का वही 'बच्चा' पिछले 17 वर्षों से राज्य की राजनीति की दिशा तय कर रहा है।

एनडीए के साथ रहकर केंद्र की राजनीति में लगातार बढ़ता गया कद
नीतीश डेढ़ दशक से भी ज्यादा से बिहार की राजनीति में सीधे तौर पर सक्रिय हैं, लेकिन उससे पहले वे केंद्रीय राजनीति में भी अपनी प्रभावी भूमिका निभा चुके हैं। अपना पहला ही लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें वीपी सिंह सरकार में कृषि राज्यमंत्री बनने का मौका मिला था। 1991 के लोकसभा चुनाव में उन्हें दूसरी बार भी जीत मिली। फिर वे जनता दल के राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए। 1991 से 93 के बीच वह लोकसभा में जनता दल के उपनेता भी रहे। इस बीच उनकी पार्टी जनता दल से समता पार्टी बन गई और जॉर्ज फर्नांडीस के साथ वे उसके संस्थापक बने और लालू यादव से राजनीतिक नाता तोड़ लिया। बाद में समता पार्टी को जनता दल (यूनाइटेड) बना दिया गया। वे 1996, 1998 और 1999 में भी लगातार लोकसभा के लिए चुने जाते रहे। राष्ट्रीय स्तर पर उनका कद तब और बढ़ गया, जब पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 में उन्हें रेल मंत्री बनाया और भूतल परिवहन मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया। फिर वे केंद्रीय कृषि मंत्री बने रेलवे का अतिरिक्त प्रभार भी उनके पास रहा। 2004 में 6ठी बार उन्हें लोकसभा चुनाव में सफलता मिली, लेकिन एनडीए सरकार गिर जाने की वजह से वे जनता दल (यू) के संसदीय दल के नेता बनकर रह गए।

नीतीश ने मुख्यमंत्री बनकर खुद को किया चुनावी राजनीति से दूर
2005 में जब उनके नेतृत्व में बिहार में एनडीए की सरकार बनी और उन्हें लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी तो उन्होंने 2006 से विधान परिषद के माध्यम से विधानमंडल की सदस्यता लेनी शुरू की। बिहार विधान परिषद सदस्य के रूप में उनका यह तीसरा कार्यकाल चल रहा है, जो 7 मई, 2018 से लेकर 6 मई, 2024 तक के लिए है। यानि, जिस नीतीश ने लगातार 6 बार लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्रीय राजनीति में अपनी एक विशेष पहचान कायम की थी, उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहने के लिए कभी भी बिहार विधानसभा चुनाव में मतदाताओं के द्वारा सीधे चुने जाने का रास्ता नहीं अपनाया। यानि 45 साल के चुनावी राजनीति के इतिहास में नीतीश सिर्फ एक टर्म एमएलए रहे हैं और मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने खुद को चुनावी राजनीति से सुरक्षित कर लिया है।

नीतीश कुमार की शिक्षा
नीतीश कुमार के पास इंजीनियरिंग (मैकेनिकल) में बैचलर ऑफ साइंस की डिग्री है, जो उन्होंने 1972 में ली थी। उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से शिक्षा प्राप्त की है। इससे पहले उनकी स्कूली शिक्षा पटना जिले के ही बख्तियारपुर के श्री गणेश हाई स्कूल से हुई थी। जब नीतीश ने ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की थी तो उन्होंने अनिच्छा से बिहार स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड भी ज्वाइन किया था, लेकिन वहां पर उन्होंने सिर्फ एक दिन ही काम किया। क्योंकि, उनका दिल तो राजनीति में लग रहा था। उन्होंने एक इंटरव्यू में इसका खुद ही खुलासा भी किया है। वैसे नीतीश कुमार अपने पेश के तौर पर राजनीति और सोशल वर्क तो बताते ही हैं, साथ ही खुद को कृषक और इंजीनियर भी कहते हैं।

नीतीश कुमार का परिवार
नीतीश कुमार जाति से कुर्मी हैं और उनका पैतृक गांव नालंदा जिले के हरनौत ब्लॉक में कल्याण बिगहा है। वे कविराज राम लखन सिंह और परमेश्वर देवी के बेटे हैं। उनके पिता इलाके के अच्छे वैद्य माने जाते थे। 22 फरवरी, 1973 को उनकी शादी मंजू कुमारी सिन्हा से हुई थी, जिनका लंबी बीमारी के बाद 2007 में 53 साल की अवस्था में निधन हो गया था। वह सरकारी हाई स्कूल में टीचर थीं। दोनों की सिर्फ एक संतान है। नीतीश कुमार के बेटे का नाम निशांत कुमार है।

नीतीश कुमार की संपत्ति
2020 के आखिर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी संपत्ति का जो ब्योरा सार्वजनिक किया था, उसके मुताबिक संपत्ति के मामले में उनके बेटे निशांत उनपर भारी पड़ते हैं। तब नीतीश कुमार के तीन बैंक खातों में 34,500 रुपए जमा थे। जबकि, उनके बेटे के बैंक और पोस्ट ऑफिस अकाउंट में 26 हजार से ज्यादा रुपए जमा थे। निशांत के पास सेविंग स्कीम में कुल 1.29 करोड़ से ज्यादा का निवेश था। नीतीश ने तब अपने पास 20 ग्राम की दो सोने की अंगूठियां और बाकी जेवरात का डिटेल दिया था, जिनकी कीमत सिर्फ 98,000 रुपए बताई थी। लेकिन, बेटे के पास करीब 21 लाख रुपए के जेवरात होने की बात स्वीकार की थी। नीतीश ने लालू की तरह ही कुछ जानवर भी पाल रखे थे, जिनकी कीमत तब करीब 1.5 लाख रुपए आंकी गई थी। इसी तरह नीतीश के पास खेती लायक कोई जमीन नहीं थी, लेकिन कल्याण बिगहा में बेटे के पास 6 एकड़ से अधिक की खेती वाली जमीन थी, जिसकी अनुमानित कीमत तब 1.18 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई गई थी। अलबत्ता नीतीश के पास दिल्ली के द्वारका में 1,000 वर्ग फीट का एक अपार्टमेंट जरूर है, जिसकी तब अनुमानित कीमत 40 लाख रुपए बताई गई थी। जबकि, उनके बेटे के पास करल्याण बिगहा और बख्तियारपुर में भी घर है, जिनकी कीमत करीब 26 लाख रुपए थी। तब नीतीश ने अपने पास 2015 मॉडल की एक फॉर्ड इकोस्पोर्डट टाइटेनियम कार होने की जानकारी दी गई थी, जिसकी कीमत 11 लाख रुपए से अधिक थी। वहीं निशांत के बाद हुंडई ग्रैंड आई10 एस्टा कार होने की बात बताई गई थी, जो कि 2016 की मॉडल की है और उसकी कीमत तब 6,40,789 रुपए अनुमानित थी।












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