NCERT की किताब में क्या छपेगा, कौन लिखेगा और कौन हटाएगा? पूरा सिस्टम समझिए-NCERT Book Process Explained
NCERT Book Process Explained in Hindi: आठवीं की एक किताब और उसका एक चैप्टर, लेकिन विवाद ऐसा कि मामला सीधे देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया। 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने नई जारी की गई कक्षा 8 की सोशल साइंस की एनसीईआरटी किताब पर सख्त रुख अपनाते हुए 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' से जुड़े अध्याय पर पूरी तरह रोक लगा दी। कोर्ट ने न सिर्फ किताब की बिक्री पर रोक लगाई, बल्कि उसकी सभी हार्ड और सॉफ्ट कॉपियां सार्वजनिक पहुंच से हटाने का निर्देश भी दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आखिर एनसीईआरटी की किताबों में क्या लिखा जाएगा, यह कौन तय करता है, चैप्टर कौन लिखता है, उसे मंजूरी कौन देता है, और अगर इतने स्तर की जांच होती है, तो फिर छपने के बाद अध्याय वापस क्यों लेना पड़ा। आइए पूरी प्रक्रिया को क्रम से समझते हैं।

एनसीईआरटी की भूमिका क्या है (Role of NCERT)
नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग यानी एनसीईआरटी की स्थापना 1961 में हुई थी। इसका काम स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, पाठ्यक्रम तैयार करना और किताबें विकसित करना है। सीबीएसई के स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती हैं और कई राज्य बोर्ड भी इन्हें अपनाते हैं।
एनसीईआरटी एक स्वायत्त शैक्षणिक संस्था है, लेकिन यह शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करती है। यानी अकादमिक फैसले एनसीईआरटी लेता है, पर नीतिगत निगरानी मंत्रालय की होती है। यही वजह है कि हालिया विवाद में किताब की बिक्री रोकने और चैप्टर दोबारा लिखवाने की बात मंत्रालय की ओर से सामने आई।
किताब की शुरुआत कहां से होती है (National Curriculum Framework)
कोई भी एनसीईआरटी की किताब सीधे लिखना शुरू नहीं कर दी जाती। इसकी शुरुआत नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क यानी एनसीएफ से होती है। यही दस्तावेज तय करता है कि शिक्षा का दर्शन क्या होगा, किन विषयों को कैसे पढ़ाया जाएगा और किस दिशा में बदलाव किए जाएंगे।
एनसीएफ के आधार पर हर कक्षा और हर विषय का विस्तृत सिलेबस तैयार होता है। जब सिलेबस तय हो जाता है, तभी किताब लिखने की प्रक्रिया शुरू होती है। यानी किसी भी चैप्टर की नींव पहले से तय शैक्षणिक ढांचे पर रखी जाती है।
NCERT के चैप्टर कौन लिखता है (Textbook Development Committees)
आम लोगों को लगता है कि एनसीईआरटी की किताबें किसी एक लेखक द्वारा लिखी जाती हैं। हकीकत इससे अलग है। किताबें टेक्स्टबुक डेवलपमेंट कमेटियों यानी टीडीसी के जरिए तैयार होती हैं।
इन समितियों में विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर, विषय विशेषज्ञ, स्कूल शिक्षक, पेडागॉजी के जानकार, मुख्य सलाहकार और एनसीईआरटी के फैकल्टी सदस्य शामिल होते हैं। कई बार बड़े सुधारों के दौरान राष्ट्रीय स्तर की उच्चस्तरीय समितियां भी गठित की जाती हैं।
एनसीईआरटी पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि स्कूल की किताबें किसी एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि सामूहिक अकादमिक समझ का परिणाम होती हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि कंटेंट संतुलित हो, तथ्यों में गलती न हो और किसी एक विचारधारा का प्रभाव न पड़े।
हालिया विवाद में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में आश्वासन दिया कि अध्याय तैयार करने वाले दो व्यक्तियों को भविष्य में मंत्रालय से नहीं जोड़ा जाएगा। लेकिन इससे यह सवाल उठा कि क्या पूरी प्रक्रिया सिर्फ दो लोगों के फैसले पर निर्भर होती है। आधिकारिक ढांचे को देखें तो उत्तर है नहीं। प्रक्रिया संस्थागत और बहुस्तरीय होती है।
किताब छपने से पहले कितनी जांच होती है (NCERT Book Review System)
एनसीईआरटी की किताब छपने से पहले कई स्तर की समीक्षा से गुजरती है। सबसे पहले आंतरिक अकादमिक समीक्षा होती है। इसमें ड्राफ्ट चैप्टर को एनसीईआरटी के विषय विभाग, संपादक और करिकुलम विशेषज्ञ देखते हैं। वे तथ्यात्मक सटीकता, भाषा, उम्र के अनुरूप सामग्री और वैचारिक स्पष्टता की जांच करते हैं।
इसके बाद बाहरी विशेषज्ञों की समीक्षा होती है। विश्वविद्यालयों के विद्वान और विषय विशेषज्ञ कंटेंट की गुणवत्ता और अकादमिक मजबूती का आकलन करते हैं।
तीसरा स्तर पेडागॉजी और संवेदनशीलता जांच का होता है। इसमें देखा जाता है कि सामग्री संवैधानिक मूल्यों, शिक्षा के उद्देश्यों और कक्षा के माहौल के अनुकूल है या नहीं। खासकर सोशल साइंस और सिविक्स जैसे विषयों में यह चरण और अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किताबों पर गंभीर आपत्तियां आईं, एनसीईआरटी ने अलग से समितियां बनाकर दोबारा समीक्षा करवाई है। यानी किताब छपने के बाद भी निगरानी खत्म नहीं होती।
अंतिम मंजूरी कौन देता है (Final Approval Process)
सभी संशोधनों और समीक्षाओं के बाद पांडुलिपि संस्थागत मंजूरी के लिए आगे बढ़ती है। एनसीईआरटी अकादमिक कंटेंट को अंतिम रूप देता है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय नीतिगत स्तर पर निगरानी रखता है। बड़े विवाद या संवेदनशील मामलों में उच्चस्तरीय हस्तक्षेप संभव है।
एक बार किताब प्रिंटिंग फेज में चली जाए तो उसे रोकना प्रशासनिक और वित्तीय रूप से जटिल हो जाता है। एनसीईआरटी देश के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक है और लाखों प्रतियां छपती और वितरित होती हैं।
छपने के बाद चैप्टर कैसे हटता है (Post Publication Review)
हालिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त निर्देश दिए। चीफ जस्टिस ने इसे न्यायपालिका पर गंभीर टिप्पणी बताया और किताब की सभी प्रतियां सार्वजनिक पहुंच से हटाने को कहा।
यह कदम असाधारण जरूर है, लेकिन प्रक्रिया के भीतर इसकी गुंजाइश मौजूद है. अगर छपने के बाद गंभीर आपत्तियां सामने आती हैं, तो समीक्षा समिति बनाई जा सकती है। संशोधन या पुनर्लेखन का निर्णय सामूहिक रूप से लिया जाता है। यह किसी एक संपादक का एकतरफा फैसला नहीं होता।
नई शिक्षा नीति के बाद पाठ्यक्रम तर्कसंगत बनाने की कवायद में पहले भी सैकड़ों बदलाव किए जा चुके हैं। इससे स्पष्ट है कि किताबें स्थायी दस्तावेज नहीं, बल्कि समय के साथ बदलने वाली शैक्षणिक सामग्री हैं।
इस विवाद से क्या समझें?
आठवीं की किताब का यह प्रकरण सिर्फ एक अध्याय का मामला नहीं है। यह उस जटिल व्यवस्था की झलक है जिसके जरिए देश की सबसे प्रभावशाली पाठ्यपुस्तकें तैयार होती हैं।
एनसीईआरटी अकादमिक रूप से स्वायत्त है, लेकिन पूरी तरह स्वतंत्र नहीं। शिक्षा मंत्रालय की नीतिगत भूमिका है। बहुस्तरीय समितियां हैं, आंतरिक और बाहरी समीक्षा है। फिर भी यदि विवाद खड़ा होता है, तो न्यायपालिका तक मामला पहुंच सकता है।
यानी किताब का हर पन्ना कई हाथों से गुजरता है। लेकिन अंतिम कसौटी वही है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था तय करती है। कानून, संवैधानिक मूल्य और सार्वजनिक जवाबदेही, यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक है।
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