स्टार्स के मामले में मेहरबान हैं भाजपा की किस्मत के सितारे

नई दिल्ली- बीजेपी ने अपना एक पुराना ट्रेंड इस चुनाव में भी बरकरार रखा है। पार्टी ने इस दफे भी फिल्म स्टार्स और क्रिकेटरों को भारी तादाद में चुनाव मैदान में उतारा है। बीजेपी को लगता है, कि जिन सीटों पर उसे सही उम्मीदवारों की तलाश में दिक्कत हो रही है, वहां ये सेलिब्रिटी काम कर जाते हैं। इस मामले में पार्टी को रिकॉर्ड अच्छा रहा है और उसे अक्सर कामयाबी मिली है। मगर इसबार क्या होगा? पार्टी के अधिकतर पुराने स्टार कैंडिडेट इस बार भी चुनाव मैदान में हैं। लेकिन, उसके बावजूद नए सेलिब्रिटीज को चुनाव लड़ाना पार्टी को कितना फायदा दिला सकता है?

इस बार कितने स्टार्स पर लगाया है दांव?

इस बार कितने स्टार्स पर लगाया है दांव?

बीजेपी के इस बार के लोकसभा के प्रत्याशियों की लिस्ट में भी सेलिब्रिटियों की भरमार है। पार्टी ने जिन नए स्टार्स को इस बार टिकट दिया है उसमें गुरदासपुर से सनी देओल, गोरखपुर से भोजपुरी एक्टर रवि किशन, आजमगढ़ से भी भोजपुरी एक्टर दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ, रामपुर से जयाप्रदा, केरल के त्रिशूर से सुरेश गोपी और पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट से मशहूर क्रिकेटर गौतम गंभीर का नाम शामिल है। इसमें सनी देओल के परिवार का तो भाजपा से पुराना नाता है। उनके पिता धर्मेंद्र भी भाजपा के सांसद रह चुके हैं और उनकी मां (सौतेली ) हेमा मालिनी इस बार भी यूपी के मथुरा से चुनाव लड़ रही हैं। इसी तरह पार्टी ने पश्चिम बंगाल की हुगली सीट से एक्टर लॉकेट चटर्जी को टिकट दिया है। बंगाल से छोटे पर्दे की एक और स्टार रूपा गांगुली अभी बीजेपी की राज्यसभा सांसद हैं।

पार्टी का क्यों है सेलिब्रिटी कैंडिडेट पर भरोसा?

पार्टी का क्यों है सेलिब्रिटी कैंडिडेट पर भरोसा?

पार्टी ने जिन सेलिब्रिटी पर इस चुनाव में दोबारा भरोसा जताते हुए टिकट दिया है, उनमें हेमा मालिनी, किरण खेर, मनोज तिवारी, बाबुल सुप्रियो, स्मृति ईरानी और राज्यवर्धन सिंह राठौर जैसे स्टार्स शामिल हैं। हेमा मालिनी के खिलाफ मथुरा में एंटी इंकंबेंसी की भी चर्चा है, लेकिन फिर भी पार्टी ने उनका टिकट नहीं काटा। ऐसे ही चंडीगढ़ से किरण खेर को भी दोबारा चुनाव मैदान में उतारा है। इसी तरह दिल्ली बीजेपी के चीफ मनोज तिवारी को फिर से उत्तर-पूर्वी दिल्ली से टिकट मिला है, तो बाबुल सुप्रियो पश्चिम बंगाल के आसनसोल से दोबारा लोकसभा में दाखिल होने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, टीवी स्टार रहीं केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पिछला चुनाव राहुल गांधी से अमेठी में हार गई थीं, लेकिन पार्टी ने उन्हें फिर से वहीं पर मैदान में उतारा है। पिछली बार वो राहुल से हारीं जरूर थीं, लेकिन उन्होंने टक्कर तगड़ा दिया था। शायद इसलिए इस बार वहां राहुल गांधी को ईरानी की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह निशानेबाजी में ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर इस बार भी जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट से अपनी सियासी किस्मत आजमा रहे हैं। राठौर ने केंद्रीय मंत्री के रूप में भी पिछले पांच साल में अपनी एक खास पहचान बना ली है।

पहले किनका चला है जलवा?

पहले किनका चला है जलवा?

पंजाब की जिस गुरदासपुर सीट पर इस बार बीजेपी ने धर्मेंद्र के एक्टर बेटे सनी देओल को टिकट दिया है, वह सीट बॉलीवुड के एक और अभिनेता विनोद खन्ना के नाम के साथ जुड़ा हुआ है। वे वहां से 4 बार भाजपा की टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे मंत्री भी बने थे। 2017 में उनका सांसद रहते ही निधन हो गया था। 2004 में पार्टी ने अभिनेता धर्मेंद्र पर भी चुनावी दांव खेला था और वे भी राजस्थान की बीकानेर सीट से चुनाव जीतने में सफल रहे थे। हालांकि, उनपर आरोप लगे कि वो कभी अपने संसदीय क्षेत्र में नहीं जाते थे। इसको लेकर वहां के लोगों में उनके खिलाफ बहुत नाराजगी थी। 2008 में एक बार जब वे इंडो-यूएस न्यूक्लियर डील पर चर्चा के दौरान संसद पहुंचे, तो उसकी खूब चर्चा हुई। तब उन्होंने घुटने में सर्जरी कराई थी, फिर भी मनमोहन सिंह के विश्वास मत के दौरान संसद में उपस्थित थे। इसी तरह 2014 में पार्टी ने अहमदाबाद पूर्व सीट से परेश रावल पर दांव लगाया था और वे भी जीतकर संसद पहुंचे थे। हालांकि, इस बार पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया है।

पार्टी किससे खा गई मात?

पार्टी किससे खा गई मात?

हालांकि कुछ सेलिब्रिटी ऐसे भी हैं, जो काफी समय तक पार्टी में रहने के बाद इस बार पार्टी से दूर हो चुके हैं। इसमें पटना साहिब और दरभंगा के मौजूदा सांसद क्रमश: शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद शामिल हैं। दोनों कई बार बीजेपी के टिकट पर जीत कर लोकसभा पहुंच चुके हैं। शत्रुघ्न सिन्हा को तो पार्टी ने राज्यसभा का सांसद भी बनाया है और वे अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। लेकिन, पिछले पांच साल में उन्होंने पार्टी में रहकर जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया, उसके बाद पार्टी को उनका टिकट काटना पड़ गया। बीजेपी से टिकट नहीं मिलने के बाद वे कांग्रेस में शामिल होकर पटना साहिब से ही इस बार भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। जबकि, कीर्ति आजाद को वित्त मंत्री अरुण जेटली पर आरोप लगाने के चलते पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इस बार कांग्रेस ने उन्हें बिहार के दरभंगा की जगह, झारखंड की धनबाद लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। यानी सिन्हा और कीर्ति इन दोनों की हार या जीत से अस बार एक अंदाजा ये लग सकता है कि चुनावों में जीत दिलाने में इन स्टार्स ज्यादा असर होता है या उसमें पार्टी का रोल भी काम करता है?

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