Mollywood Scandal: कौन हैं वे मुट्ठीभर पुरुष जिनका है केरल फिल्म उद्योग पर कब्जा?
Mollywood Controversy: जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक मलयालम फिल्म उद्योग पर मात्र 10 से 15 पुरुषों का ही कब्जा है और उन्हीं की मर्जी चलती है। ये इतने ताकतवर लोग हैं जो अभिनेता और अभिनेत्रियों पर रोक लगा देते हैं। लेकिन जब कोई महिला उत्पीड़न की शिकायत लेकर इनके पास पहुंचती है तो उसे नजरअंदाज कर देते हैं।
जस्टिस हेमा कमेटी की यह रिपोर्ट 19 अगस्त को ही जारी हुई थी, जिसके कई खुलासे धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने ऐसी 'शक्ति' और 'शक्ति समूहों' का कम से कम 70 बार जिक्र किया है।

केरल फिल्मों में है माफियाराज!
रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह महिलाएं और पुरुष 'उद्योग पर कंट्रोल करने वाली शक्तिशाली लॉबी के क्रोध' का शिकार हो रहे हैं। एक प्रमुख अभिनेता जिसने इस शक्तिशाली लॉबी को 'माफिया' कहकर बुलाया है, उसने बताया है कि ये कैसे अपनी मनमर्जी चलाते हैं, कैसे बिना वजह बताए किसी पर बैन लगाने या इंडस्ट्री से हमेशा के लिए बाहर करने का फरमान सुनाते हैं।
चंद पुरुषों के कब्जे में है मलयालम सिनेमा उद्योग- हेमा कमेटी
जस्टिस हेमा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'जांच के दौरान हमें समझ में आया कि मलयालम फिल्म उद्योग कुछ पुरुष प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और अभिनेताओं के कब्जे में है। इनका पूरे मलयालम फिल्म उद्योग पर नियंत्रण है और सिनेमा में काम करने वाले अन्य वाले लोगों पर इनका दबदबा है...'
कुछ लोगों का निरंतर लाभकारी प्रभुत्व बना रहता है-रिपोर्ट
इसके मुताबिक यह लॉबी इतनी ताकतवर है कि इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों का इंडस्ट्री से हमेशा से दाना-पानी उठ सकता है। कमेटी की एक और सदस्य के बी वल्सलाकुमारी लिखती हैं,'यह एक प्रकार का सांस्कृतिक आधिपत्य थोपने जैसा है, जिसके द्वारा उच्च पदों पर बैठे लोग एक ऐसी संस्कृति तैयार करते हैं, जिसमें उनका निरंतर लाभकारी प्रभुत्व बना रहता है।'
एक और सदस्य और अभिनेत्री टी शारदा लिखती हैं कि 'फिल्मी दुनिया में लैंगिक भेदभाव है।'
माफिया के हर सदस्य में रहता है गजब का तालमेल-रिपोर्ट
कमेटी के अनुसार किसी पर प्रतिबंध लगाने का फरमान 'गैरकानूनी और असंवैधानिक' तरीके से जारी किया जाता है, जो कि लोगों को नियंत्रण में रखने के एक टूल की तरह इस्तेमाल होता है।
रिपोर्ट में यहां तक कहा गया है कि 'अगर शक्तिशाली ग्रुप के सदस्य निजी पूर्वाग्रह की वजह से भी किसी के सिनेमा में काम से खुश नहीं है तो ग्रुप के सभी सदस्य हाथ मिला लेते हैं और उस शख्स को सिनेमा में काम करने से रोक दिया जाता है।'
किसी को बैन का औपचारिक फरमान नहीं जारी होता, लेकिन अगर ग्रुप का कोई सदस्य कह दे कि यह अभिनेता 'परेशानी' पैदा करता है, तो यह बात धीरे-धीरे सब तक पहुंच जाती है और यह एक तौर पर औपचारिक फरमान बन जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'बैन साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं मिलेगा, लेकिन जिसे प्रतिबंधित किया गया है, उसे इसके बारे में पता चल जाता है।'
अभिनेत्रियों के लिए कह देते हैं- 'यह 'मी टू' है'
अगर मामला किसी अभिनेत्री से जुड़ा होता है तो उनके लिए आमतौर पर बैन लगाने के लिए यह कह दिया जाता है, 'यह 'मी टू' है'। यह वो वैश्विक अभियान है, जिसमें महिलाएं पुरुषों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की आवाज उठाते हुए सामने आ चुकी हैं।
शक्तिशाली लॉबी की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं हिलता!
केरल फिल्मों की यह लॉबी इतनी ताकतवर है कि फिल्म संस्थाओं को भी अपने इशारों पर नचाती है। रिपोर्ट के अनुसार, '(केरल) फिल्म चैंबर ऑफ कॉमर्स नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट जारी करता है और उनके लिए बहुत आसान है कि वह फिल्म की रिलीज रुकवा दें। इसलिए जिस भी प्रोड्यूसर को ये लोग चेतावनी दे देते हैं, वे उस खास अभिनेता या अभिनेत्री को काम देने की जगह किसी दूसरे को मौका देते हैं और कोई जोखिम नहीं लेते।'
यहां तक कि यह लॉबी कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने वाले कानून के तहत बनी इंटरनल कंप्लेंस कमेटी (ICC) पर भी कंट्रोल रखते हैं। हालांकि, एसोसिएशन ऑफ मलयालम मुवी आर्टिस्ट (AMMA) ने मलयालम सिनेमा में किसी भी पावरफुल लॉबी की मौजूदगी का सिरे से खंडन किया है।
क्यों नहीं सामने आना चाहिए केरल सिनेमा के गिद्धों के नाम?
लेकिन, केरल फिल्म के इस 'माफिया' गिरोह में शामिल 'शक्तिशाली' लोग कौन हैं, इसका कोई संकेत अभी नहीं मिल पाया है। क्योंकि, हाई कोर्ट ने रिपोर्ट के केवल संपादित हिस्से को ही जारी करने की इजाजत दे रखी है, जिसमें आरोपियों या शिकायत करने वालों का नाम नहीं है।












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