मोहन राकेश-अनीता की वो प्रेम कहानी

स्वभाव से मोहन राकेश शुरू से ही फक्कड़ थे. जब वो अपनी पहली शादी के लिए इलाहाबाद पहुंचे थे तो उनके साथ कोई बारात नहीं थी.

लगभग यही उन्होंने अपनी दूसरी शादी के वक्त भी किया था. न किसी को ख़बर की और न ही किसी को बुलाया. दोनों ही शादियाँ नहीं चलीं. फिर उनकी मुलाकात अनीता औलख से हुई.

दिलचस्प बात ये थी कि अनीता की माँ चंद्रा मोहन राकेश की मुरीद थीं. वो उनको ख़त लिखा करती थीं. उन्होंने ही उनसे एक बार अनुरोध किया कि वो मुंबई से दिल्ली जाते हुए बीच में ग्वालियर रुकें. मोहन ने वो निमंत्रण स्वीकार कर लिया.

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ग्वालियर में उनके रुकने के दौरान अनीता ने महसूस किया कि मोहन की निगाहें हमेशा उनका पीछा करती थीं.

अनीता बताती हैं, "एक दिन पूरा परिवार 'दिल एक मंदिर' फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल गया. मैं मोहन के बगल में बैठी. फ़िल्म के दौरान कितनी बार एक हत्थे पर दो बांहें टकराईं. तभी मेरा रूमाल ज़मीन पर गिर गया. मैं रुमाल उठाने के लिए झुकी तो अनजाने में ही मेरा हाथ उनके पैरों से छु गया. मैं ख़ामोश रही और उस ख़ामोशी का जवाब भी उसी तरीके की एक ख़ामोशी से दिया गया."

मैंने अनीता से पूछा कि आप दोनों में से किसने पहले अपने इश्क का इज़हार किया ? अनीता का जवाब था, "प्यार का इज़हार उन्होंने कभी नहीं किया. मैंने एक बार उनसे कहा भी था कि तुम मुझसे प्यार का इज़हार क्यों नहीं करते. क्या मन की बात कहने से आदमी छोटा हो जाता है? उन्होंने 'लहरों के राजहंस' को समर्पित करते हुए लिखा- उस एक को जिसे लगता है कि मन की बात कहने से आदमी छोटा हो जाता है."

जब अनीता ने पहली बार अपनी माँ से कहा कि वो मोहन से शादी करना चाहती हैं. उनकी माँ अवाक रह गई. उनकी माँ ने उनको मुंह पर दो थप्पड़ रसीद किए और बोलीं, "तू समझती है वो तुझसे प्यार करता है. वो तेरे ऊपर थूकेगा भी नहीं. तू समझती है वो तुझसे शादी करेगा."

कुछ दिनों बाद अनीता का पूरा परिवार दिल्ली आ गया. उनके प्रति उनके परिवार की हिंसा जारी रही. एक अच्छी बात ये हुई कि उनको चावड़ी बाज़ार के एक कॉलेज से बीए करने की अनुमति मिल गई.

अब वो कम से कम चार घंटे तक अपने घर से बाहर निकल सकती थीं. पहले ही दिन कॉलेज के गेट पर अनीता की राकेश से मुलाकात हुई. वो रोज़ सुबह पौने सात बजे टैक्सी ले कर करोल बाग से चावड़ी बाज़ार आते. पास की हलवाई की दुकान पर जाते और अनीता के साथ बातें करते.

एक दिन राकेश अनीता को अपने घर ले गए. दरवाज़ा बंद कर चिटकनी लगाई. उनका दिल तेज़ी से धड़कने लगा. तभी उन्होंने देखा मेज़ पर फूलों की दो मालाएं रखी हुई थीं. इस तरह अनीता और राकेश की शादी हुई. तारीख थी 22 जुलाई, 1963. इस शादी के बारे में सिर्फ़ दो लोगों को पता था... राकेश की माँ और उनके सबसे करीबी दोस्त कमलेश्वर को.

अनीता बताती हैं, "एक बार मैं राकेश से मिलने गई. मैं उन्हें बताना चाहती थी कि मेरी माँ ने मेरे लिए एक लड़का ढूंढ लिया है. तभी वहाँ कमलेश्वर के साथ घबराए परेशान मोहन पहुंचे. उनके साथ एक हादसा हो गया था. एक गुंडा उनके पीछे पड़ गया था जो उन्हें जान से मार देना चाहता था. कमलेश्वर ने कहा कि उन्हें तुरंत दिल्ली छोड़ देना चाहिए."

बाद में राकेश ने इसी घटना पर एक कहानी लिखी जिसका नाम था 'एक ठहरा हुआ चाकू'. मोहन राकेश अनीता से शादी कर उन्हें बंबई ले जाना चाहते थे. तब शायद अनीता के बालिग होने में कुछ दिनों की देर थी. सवाल था कि कानून और परिवार की साज़िशों से कैसे बचा जाए.

राकेश के सबसे करीबी दोस्त कमलेश्वर आपनी आत्मकथा 'आधारशिलाएं' में लिखते हैं, "राकेश चाहता तो सब कुछ था पर वो घबराता बहुत था. आख़िर ओमप्रकाश ने एक तरकीब निकाली. अनीता राकेश के साथ खुलेआम सफ़र कर सके, इसके लिए उसने अख़बार में विज्ञापन दिया-एक प्रख्यात लेखक के लिए ज़रूरत है एक ऐसा महिला सेक्रेट्री की जो युवती हो, हिंदी और अंग्रेज़ी की अच्छी ज्ञाता हो, जो डिक्टेशन ले सके, और भारत और भारत से बाहर लेखक के साथ सफ़र कर सके. पोस्टबाक्स नंबर इतने पर आवेदन आमंत्रित हैं. इस विज्ञापन को राकेश ने अख़बार से काट कर अपने पर्स में रख लिया. अब सारी तैयारियाँ पूरी थीं. आठ दस दिन बाद अनीता को राकेश के साथ दिल्ली छोड़ देनी थी."

अनीता के मन में कहीं ये शंका थी कि राकेश दो शादियाँ कर चुके थे. उनके साथ उनकी निभ भी पाएगी या नहीं. मोहन राकेश ने अनीता का मन मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी मशहूर उपन्यासकार मन्नू भंडारी पर छोड़ी.

मन्नू भंडारी बताती हैं, "राकेश मुझसे बोले मैं तुम्हें अनीता के पास ले कर जाऊंगा. ये ध्यान रखना की बात बिगड़े नहीं. मैं जब वहाँ गई तो दंग रह गई, क्योंकि अनीता तो बिल्कुल बच्ची जैसी थी. अनीता मुझे पकड़ कर बैठ गई और उसने सवालों की झड़ी लगा दी. बताइए, उन्होंने दो-दो शादियाँ कीं. क्यों छोड़ा उन्होंने अपनी पत्नियों को?"

मन्नू आगे बताती हैं, "मैंने उसे बताया कि इन दोनों के व्यक्तित्व बिल्कुल अलग थे. इसलिए उनका साथ अधिक समय तक नहीं रह पाया. अनीता ने पूछा कि अगर मैं राकेश से शादी कर लूँ तो कोई ग़लत बात तो नहीं करूँगी. मैंने कहा शादी का फ़ैसला बहुत निजी होता है. अगर तुहारा दिल कहता है तो उनसे शादी कर सकती हो."

जिस दिन मोहन राकेश और अनीता को दिल्ली जाना था. उस दिन बारिश हो रही थी. माँ के मना करने के बावजूद अनीता अपने घर से बाहर निकलीं. उनके पास उनकी किताबें और सर्टिफ़िकेट थे.

कमलेश्वर लिखते हैं, "तय यह हुआ कि अनीता को हौज़काज़ी से मैं लाऊंगा. राकेश मुझे गोल डाकखाने पर इंतज़ार करता हुआ मिलेगा.. अनीता पूड़ी वाली दुकान पर अपनी किताबें पकड़े इंतज़ार कर रही थी...सलवार कमीज़ और चप्पलें पहने, जैसे वो कॉलेज जा रही हो. गोल डाकखाने पर दूसरी टैक्सी में बैठा राकेश हमारा इंतज़ार कर रहा था. उस के पर्स में वो विज्ञापन वाला कागज़ मौजूद था और जेब में एयर टिकट."

"अनीता शांत थी जबकि राकेश पसीना-पसीना था और बार-बार सिगरेट सुलगा रहा था. जब हम एयरपोर्ट पर पहुंचे तो राकेश ने कहा, अभी फ़्लाइट में समय है...रेस्तराँ में बैठना ठीक रहेगा. मुझे तब और भी मज़ा आया और अनीता भी हंसी, जब हमने देखा कि राकेश हम दोनों से अलग हो कर आगे आगे चलने लगा जैसे हमें पहचानता ही न हो. मुझे भी हंसी आई जब अनीता ने कहा, यही आपका जिगरी दोस्त है, जिसका जिगर इतना कमज़ोर है."

उस समय अनीता की उम्र 21 साल की भी नहीं थी. अनीता याद करती हैं, "बंबई उतरते ही राकेश मुझे सन एंड सैंड होटल ले गए. मैं पहली बार हवाई जहाज़ पर बैठी थी. मुझे उलटियों पर उलटियाँ हो रही थीं. मेरे सारे कपड़े ख़राब हो गए थे. जब हम होटल पहुंचे तो मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था कि ये लोग कहेंगे कि इसके साथ कौन आई है."

"राकेश ने अपने मिस अनीता औलक के नाम से कमरा बुक कराया था. कमरे में पहुंच कर जब मैंने खिड़की का पर्दा हटाने की कोशिश की तो राकेश ने पर्दा खींच कर कहा कि यहाँ पर्दा खोलने के जुर्म में क़ैद कर लिया जाता है. जब उन्होंने कमरे की चिटखनी लगाई तो मुझे लगा कि अब क्या होगा? उन्होंने कहा कि कुछ नहीं होगा. मैंने कहा मुझे घर छोड़ आओ. मुझे बहुत डर लग रहा है. उन्होंने मुझसे पूछा, तुम्हारा दिल करता है यहाँ से जाने का. मैंने कहा, नहीं."

मुंबई में मोहन राकेश अपने दोस्तों में इतना खो गए कि उनके पास अनीता के लिए बहुत कम वक्त रहता था. अनीता बताती हैं, "हम न अकेले मिल सकते थे और न ही बातें कर सकते थे.. मुझे लगता ही नहीं था कि मेरी शादी हुई थी. उन्होंने मुझे छुआ तक नहीं. हमारे शारिरिक संबंध बहुत दिनों बाद बने. वो मुझे कभी आन तो कभी मिन या टिन कह कर पुकारते थे. उन्होंने मुझसे साफ़ कह दिया था कि देखो टिन मेरे जीवन में पहले नंबर पर मेरा लेखन है, दूसरे नंबर पर मेरे दोस्त और तीसरे नंबर पर तुम. मैंने कहा ठीक है मैं तीसरे नंबर पर ही ठीक हूँ."

अनीता राकेश
BBC
अनीता राकेश

अनीता राकेश इस समय 75 साल की हैं और दिल्ली में रहती हैं. आजकल वो अपनी किताब 'अंतिम सतरें' लिख रही हैं. मोहन राकेश के साथ बिताए गए एक एक क्षण को वो बहुत शिद्दत से याद करती हैं, "मोहन को सिगरेट पीने की बहुत आदत थी. लेकिन वो धुएं को इनहेल नहीं करते थे. उन्होंने ही मुझे सिगरेट और शराब की आदत डलवाई. हम लोग दोस्तों के साथ छत पर बैठ कर शराब पिया करते थे. वो किसी की बदज़ुबानी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते थे. अपना इस्तीफ़ा अपनी जेब में ले कर चलते थे."

"सारिका में उन्होंने सिर्फ़ 11 महीने काम किया. जब शाँति प्रसाद जैन ने उनसे पूछा कि तुम इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ रहे हो तो उनका जवाब था, मैं एक एयरकंडीशनर ख़रीदना चाहता था. अब मेरे पास इतना पैसा हो गया है कि मैं एयर कंडीशनर ख़रीद सकता हूँ. इसलिए ये नौकरी छोड़ रहा हूँ."

इस एयरकंडीशनर का भी एक दिलचस्प किस्सा है. कमलेश्वर अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "राकेश सारिका छोड़ कर दिल्ली वापस आ गया. हम दोनों ने मिल कर बहुत मकान खोजे. पर दिल्ली में पंजाबियों को मकान देने के लिए पंजाबी ही तैयार नहीं थे. आखिर हमें यूपी वाला कह कर आगे किया गया. वैसे जो मकान मालिक मकान देने के लिए तैयार हो जाता, उसके सामने एक समस्या रखी जाती कि आपके यहाँ पावर लाइन है या नहीं?"

"दरअसल राकेश ने सारिका के ज़माने में एक एयरकंडीशनर ख़रीदा था और वो अपने एयरकंडीशनर के बिना रह नहीं सकता था. उसे गर्मी बहुत लगती थी. मैं जानबूझ कर उस एयरकंडीशनर को कूलर कह कर पुकारता था, जिससे राकेश को बहुत चोट पहुंचती थी."

अनीता के साथ रहते हुए राकेश को छह साल ही हुए थे कि उन्होंने उनसे कहा, "अब तू मेरा घर छोड़ कर जाएगी या नहीं? दो साल से ज़्यादा मैं किसी औरत के साथ नहीं रहा. पहले मैंने सोचा था कि दो तीन साल बाद तुम चली जाओगी. पर अब तो छह-सात साल हो रहे हैं और तुम्हारे जाने के कोई आसार नहीं नज़र आ रहे हैं…यार तूने मेरा रिकॉर्ड ख़राब कर दिया."

अनीता ने कभी मोहन राकेश को नहीं छोड़ा. लेकिन यह कहने के तीन साल बाद ही राकेश उन्हें छोड़ कर चले गए. हमेशा के लिए, सिर्फ़ 46 साल की उम्र में. सिर्फ़ 9 साल का साथ रहा इन दोनों का.

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