Caste Census: हिंदू एकता के लिए BJP ने चला जाति जनगणना दांव! कैसे विपक्ष के सबसे बड़े मुद्दे को किया हाईजैक?

Caste Census: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 30 अप्रैल राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक में जाति जनगणना कराने का बड़ा फैसला लिया गया। अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अगली जनगणना में जातियों की भी गिनती करेगी। जाति जनगणना पर सरकार का रुख अचानक क्यों बदला? ये सवाल कईयों को परेशान कर रहा है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि अब तक जातिगत जनगणना से कतराने वाली मोदी सरकार अचानक इसके लिए राजी क्यों और कैसे हो गई?

माना जा रहा है कि इसके पीछे हिंदू एकता को कमजोर करने वाले किसी भी प्रयास को रोकने की मंशा है। भाजपा और RSS (संघ) लंबे समय से हिंदुओं को एकजुट रखने की कोशिश करते आए हैं और यह कदम उसी दिशा में उठाया गया है। भाजपा ने जातिगत जनगणना कराने का फैसाल कर विपक्ष के सबसे बड़े मुद्दे को ही हाईजैक कर लिया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले कई समय ये जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे और इसको लेकर मोदी सरकार पर निशाना साध रहे थे।

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कांग्रेस पार्टी कुछ समय से जाति जनगणना की मांग कर रही थी और कर्नाटक और तेलंगाना सहित कांग्रेस शासित राज्यों में इस तरह की कवायद की घोषणा की गई थी, जहां कथित तौर पर सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। लेकिन अब इसी सबसे बड़े मुद्दे को सरकार ने खत्म ही कर दिया है।

हिंदू एकता को बढ़ावा देने के लिए सरकार कराएगी जाति जनगणना!

जाति जनगणना को भले ही कुछ लोग बिहार विधानसभा चुनाव से जोड़ रहे हों, लेकिन बिहार में पहले ही जातीय सर्वे हो चुका है और राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। इसके अलावा बिहार के मुख्यमंत्री और भाजपा सहयोगी नीतीश कुमार की इस कदम में प्रमुख भूमिका मानी जा रही है, जिससे आरजेडी के तेजस्वी यादव को इससे राजनीतिक लाभ लेने की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है।

इस फैसले का एक बड़ा कारण हिंदुओं को जाति के आधार पर विभाजित करने के किसी भी कोशिश को रोकने के लिए की गई है। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और RSS प्रमुख मोहन भागवत की बैठक के कुछ ही घंटों बाद आया। पिछले दस सालों में भाजपा ने ओबीसी और सवर्ण समुदायों को जोड़कर जो चुनावी सफलता पाई है, उसे बनाए रखने के लिए यह कदम अहम माना जा रहा है।

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद ओबीसी, दलित और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से मंडल राजनीति की ओर लाने की कोशिशें हुई थीं। भाजपा इस जातीय ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अब जातिगत गणना को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहती है। नया कदम भाजपा को इस बदलाव को रोकने और संबंधों को फिर से बनाने में मदद कर सकता है।

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भाजपा नेतृत्व को भरोसा- नाराज नहीं होंगे सवर्ण!

हालांकि भाजपा नेतृत्व को भरोसा है कि राष्ट्रीयता की भावना और मोदी के ओबीसी होने के कारण ऊपरी जातियों (सवर्ण) में नाराजगी नहीं होगी। साथ ही पार्टी को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए दिए गए 10% आरक्षण से ऊपरी जातियों का समर्थन भी मिलने की उम्मीद है।

हालांकि अभी ये साफ नहीं है कि अगर भाजपा के इस फैसले से सवर्ण में नाराजगी बढ़ती है तो फिर क्या किया जाएगा। लेकिन भाजपा नेताओं का कहना है कि पार्टी अच्छी स्थिति में है, क्योंकि उसने उस मुद्दे पर नेतृत्व किया है जिस पर कांग्रेस वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद कार्रवाई करने में विफल रही।

भाजपा नेताओं का कहना है कि अब भाजपा दावा कर सकती है कि उसने काम किया जबकि कांग्रेस केवल बोलती रही। भले ही जाति गणना को लेकर शुरुआती चिंताएं थीं, लेकिन कुल मिलाकर यह महसूस होता है कि कुछ राज्यों में जाति सर्वेक्षणों से बड़ी समस्याएं नहीं हुई हैं। भाजपा ने इसे समय लेकर और अन्य राज्यों से मिले फीडबैक को ध्यान लेते हुए ये फैसला लिया है।

सूत्रों के मुताबिक भाजपा नेताओं का यह भी कहना है कि पार्टी के भीतर कोई असहजता नहीं है, क्योंकि पीएम मोदी खुद ओबीसी हैं। समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसी अन्य पार्टियां प्रमुख ओबीसी समूहों से जुड़ी हुई हैं, जो छोटे ओबीसी को उनके खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। भाजपा को उच्च जातियों के समर्थन का भी भरोसा है, क्योंकि उसने पहले ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10% कोटा दे दिया है।

इस फैसले पर जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने स्वागत जताते हुए कहा कि नीतीश कुमार मानते हैं कि जातिगत आंकड़े होना जरूरी है ताकि असमानता दूर की जा सके और योजनाएं बेहतर तरीके से बनाई जा सकें।

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