सर्वे रिपोर्ट में पता चला किस चीज पर पैसे उड़ा रहे हैं भारतीय, खाने-पीने से ज्यादा इन चीजों पर करते हैं खर्च

भारतीयों के रहन-सहन और खर्च को लेकर सांख्यिकी मंत्रालय ने एक सर्वे रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट को आधार मानकर नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने बड़ा बयान दिया है।

खपत और खर्च पर जारी की गई सर्वे रिपोर्ट का सारांश शेयर करते हुए उन्होंने दावा किया कि अब भारत में गरीबों की आबादी 5 प्रतिशत से कम हो सकती है। रिपोर्ट में भारतीयों के कुल घरेलू खर्च को लेकर भी बड़ा खुलासा हुआ है।

Indian Expenditure

रिपोर्ट के अनुसार बीते 10 साल के दौरान भारतीयों के कुल घरेलू खर्च में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार, देश के निचले 5 प्रतिशत लोगों का मासिक प्रति व्यक्ति उपभोक्ता व्यय ग्रामीण भारत में 1,441 रुपये और शहरी भारत में 2,087 रुपये है।

सर्वे के मुताबिक घरेलू खर्च का आंकड़ा दोगुना हुआ है, जबकि लोगों ने खाने-पीने पर खर्च कम कर दिया है। रिपोर्ट की माने तो लोग अब खाने-पीने के ऊपर कम और दूसरी चीजों पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं।

नीति आयोग के सीईओ ने कहा कि नवीनतम सर्वेक्षण से पता चला है कि ग्रामीण क्षेत्रों में खपत बढ़ गई है, जिससे शहरी क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रों के खपत का अंतर कम हो रहा है। इन आंकड़ों का मतलब देश में गरीबी के स्तर में तेजी से कमी आना भी हो सकता है। बीवीआर सुब्रमण्यम ने कहा, "इस डेटा के आधार पर, देश में गरीबी का स्तर 5% या उससे कम के करीब हो सकता है।"

सुब्रमण्यम का कहना है कि आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण और शहरी खपत का अंतर लगभग खत्म हो गया है। उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों का आरबीआई द्वारा ब्याज दर निर्धारण पर असर पड़ सकता है। खुदरा मुद्रास्फीति सूचकांक (Retail Inflation Index) में खाद्य और अनाज की हिस्सेदारी कम है। उन्होंने कहा कि आंकड़ों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति के बारे में संदेह को दूर कर दिया है।

कपड़े-मनोरंजन पर लोग उड़ा रहे ज्यादा पैसे
सांख्यिकी मंत्रालय ने भारतीय परिवारों के घरेलू खर्च को लेकर जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार, लोगों का घरेलू खर्च पिछले दस सालों में दोगुना से अधिक हो गया है। जबकि रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय घरों में खाने के सामान पर अब कम खर्च हो रहा है, जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं जैसे फ्रिज, टेलीविजन, पेय पदार्थ, प्रोसेस्ड फूड, चिकित्सा देखभाल, परिवहन और एंटरटेनमेंट से जुड़ी चीजों पर खर्च बढ़ गया है।

गरीबी स्तर की गणना उपभोग-व्यय के आंकड़ों के आधार पर की जाती है। गरीबों की संख्या को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। 2017-18 का डेटा जारी नहीं किया गया था, इसलिए यह 2011-12 के बाद का सबसे नया डेटा है।

'ग्रामीण भारत में भोजन पर खर्च 2011-12 में 53% से बढ़कर 2022-23 में 46.4% हो गया'
सर्वेक्षण से पता चला है कि मौजूदा कीमतों पर, ग्रामीण मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च 2011-12 में 1,430 रुपये से 164% बढ़कर 2022-23 में 3,773 रुपये हो गया, जबकि शहरी केंद्रों में यह 146% बढ़ गया, जो 2011-12 में 2,630 रुपये था और 2022-23 में बढ़कर 6,459 रुपये हो गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में, मासिक खपत में खाने की हिस्सेदारी 2011-12 में 53% से घटकर 2022-23 में 46.4% हो गई है, जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च 47.15 से बढ़कर 54% हो गया है। शहरी क्षेत्रों में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। सर्वे के अनुसार शहरों में भोजन पर खर्च 2011-22 में 43% से घटकर 2022-23 में 39.2% हो गया, जबकि गैर-खाद्य वस्तुओं पर खर्च 2011-12 में 57.4% से बढ़कर 2022-23 में 60.8% हो गया।

2014 में, पूर्व आरबीआई गवर्नर सी रंगराजन की अध्यक्षता वाले एक पैनल ने शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति मासिक व्यय 1,407 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 972 रुपये के रूप में गरीबी रेखा का अनुमान लगाया था। नए आंकड़ों से पता चला है कि निचली 5 से 10% आबादी का औसत मासिक उपभोग व्यय ग्रामीण क्षेत्रों में 1,864 रुपये और शहरी केंद्रों में 2,695 रुपये है।

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