गांधी परिवार की बड़ी आलोचक रही हैं मारग्रेट अल्वा, इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी से रह चुकी है तनातनी
नई दिल्ली, 19 जुलाई। देश के अगले उपराष्ट्रपति का चुनाव अगले महीने होना है। एक तरफ जहां एनडीए ने जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो दूसरी तरफ विपक्ष ने मार्ग्रेट अल्वा को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन जिस तरह से विपक्ष ने मारग्रेट अल्वा को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है उसको लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए यशवंत सिन्हा और उपराष्ट्रपति पद के लिए मारग्रेट अल्वा दोनों के ही चयन को लेकर कांग्रेस पर सवाल खड़ा रहा है।
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कांग्रेस की चूक
हालांकि कांग्रेस के पास राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए कांग्रेस के पास काफी लंबा समय था, लेकिन जिस तरह की सक्रियता शरद पवार, सीताराम येचुरी और ममता बनर्जी ने उम्मीदवारों के चयन को लेकर सक्रियता दिखाई, उस तरह की सक्रियता सोनिया गांधी और राहुल गांधी नहीं दिखा सके। कांग्रेस की ओर से इसकी जिम्मेदारी मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश को दी गई थी, लेकिन दोनों ही नेता शरद पवार और सीताराम येचुरी के विकल्प के साथ गए।

गांधी परिवार की आलोचक
मारग्रेट अल्वा की बात करें तो वह दिग्गज कांग्रेस नेता हैं, वो गांधी परिवार की आलोचक रही हैं। जुलाई 2016 में करेज और कमिटमेंट नाम के अपने लेख में मारग्रेट अल्वा ने खुलकर गांधी परिवार की आलोचना की थी। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर अपने लेख में तीखा हमला बोला था। यशवंत सिन्हा गैर कांग्रेसी नेता हैं, यही नहीं वह कांग्रेस विरोधी दलों भाजपा, जनता दल, टीएमसी में रहे हैं। यशवंत सिन्हा इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी के भी आलोचक रहे हैं। मारग्रेट अल्वा ने खुलकर अगस्ता वेस्टलैंड केस में कांग्रेस के कनेक्शन की बात कही थी।

राज्यसभा की डिप्टी चेयरमैन रहीं
मारग्रेट अल्वा की सास वॉयलेट एक स्वतंत्रता सेनानी थीं और वह राज्यसभा की डिप्टी चेयरमैन रह चुकी हैं। जब राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु हुई थी तो उप राष्ट्रपति वीवी गिरी को राष्ट्रपति चुना गया था, जिसके बाद उपराष्ट्रपति का चुनाव कराना पड़ा। उस वक्त रिपोर्ट के अनुसार इंदिरा गांधी ने वॉयलेट को इस पद के लिए आगे नहीं बढ़ाया बल्कि जीपी पाठक को इस पद के लिए आगे बढ़ाया। इसके चार महीने बाद ही वॉयलेट ने डिप्टी चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे दिया और इसके 5 दिन बाद नवंबर 1969 में उनकी मृत्यु हो गई।

कांग्रेस की आलोचक रही हैं
मारग्रेट अल्वा का इतिहास कांग्रेस के आलोचक के तौर पर रहा है। 1977 में चुनाव में हार के बाद 1978 में कांग्रेस का जब विघटन हुआ। अल्वा ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ दिया और देवराज व शरद पवार के खेमे में शामिल हो गईं। हालांकि बाद में वह एक बार फिर से कांग्रेस में वापस आईं और राजीव गांधी सरकार में मंत्री बनीं। आने वाले सालों में वह कई बड़े पदों पर रहीं। 2008 में यूपीए सरकार के कार्यकाल में अल्वा ने आरोप लगाया कि कर्नाटक में पार्टी टिकटों को बेच रही है।

महंगा पड़ा था यह बयान
दरअसल अपने एक लेख में मारग्रेट अल्वा ने कहा था कि अल्वा परिवार एकमात्र परिवार है जो तकरीबन 50 साल तक बिना किसी ब्रेक के संसद में रही है। अल्वा ने कहा था कि मेरा यह बयान सही नहीं रहा, उन्होंने इस बयान को अपनी गलती बताया था। अल्वा के इस बयान को कांग्रेस ने चुनौती के तौर पर लिया और इसके बाद से ही अल्वा की सियासी गणित बदल गई। 1992 में पीवी नरसिम्हा राव ने सोनिया गांधी की प्राइवेट सेक्रेटरी विंसेट जॉर्ज के राज्यसभा नामांकन को खारिज कर दिया तो मारग्रेट अल्वा को उन्होंने समर्थन दिया।

मारग्रेट के खिलाफ कांग्रेस में किलेबंदी
कांग्रेस उस वक्त राज्यसभा में कर्नाटक से एक उम्मीदवार को भेजना चाहती थी, लेकिन पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मारग्रेट अल्वा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ये लोग लगातार चौथी बार अल्वा को राज्यसभा में भेजने का विरोध कर रहे थे। इन लोगों ने विंसेट जॉर्ज के नाम का समर्थन किया जोकि केरल से आते थे। नरसिम्हा राव इनके पक्ष में नहीं थे, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता के करुणाकरन और अर्जुन सिंह विंसेट जॉर्ज को राज्यसभा भेजने का समर्थन किया।

राज्यसभा में जाने को लेकर तनातनी
हालांकि उस वक्त सोनिया गांधी ने मारग्रेट अल्वा और विंसेट जॉर्ज दोनों को ही लेकर कुछ नहीं कहा गया। उस वक्त नरसिम्हा राव रूस चले गए, उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात की और कहा कि आप यह जांचिए कि किसी राज्यसभा भेजना चाहिए। सोनिया गांधी ने राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस की अध्यक्षता करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि अगर पार्टी जॉर्ज को टिकट देना चाहती है तो फैसला गुणवत्ता के आधार पर होना चाहिए, इसमे राजनीति को शामिल नहीं करना चाहिए। राव इस बात को समझ चुके थे।

मिली थी राज्यसभा में जगह
रूस में जब पार्टी के उम्मीदवारों की लिस्ट फैक्स की गई तो उसमे मारग्रेट अल्वा का नाम था। इस मुद्दे के बाद से ही कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय 10 जनपथ और 7 रेस कोर्ट रोड के बीच के रिश्ते बदल गए थे। रिपोर्ट की मानें तो सोनिया के प्राइवेट सेक्रेटरी इसके बाद से ही राव के खिलाफ हो गए थे। कहा जाता है कि अकेले ही विंसेट जॉर्ज ने पार्टी को दो खेमे में बांट दिया, जिसके बाद कांग्रेस 1995 में बंट गई।

हवाला केस पर बोलीं
हालांकि मारग्रेट अल्वा को राज्यसभा भेज दिया गया लेकिन अल्वा ने नरसिम्हा राव को लेकर खुलकर बात करने से अल्वा पीछे नहीं हटीं। उन्होंने अपने लेख में कहा कि राव 1995 के हवाला केस में विपक्ष के मुख्य नेताओं, जिसमे एलके आडवाणी भी शामिल थे उन्हें जेल भेजना चाहते थे। अक्टूबर 1995 में जब चुनाव होने वाले थे, राव ने हवाला मामले की जांच के आदेश दे दिए, जिसके बाद कई दिग्गज नेताओं का भविष्य खतरे में था। जिसमे आडवाणी, माधवराव सिंधिया, कमलनाथ, अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी, बूटा सिंह, भजन लाल, वीसी शुक्ला और शरद यावद के नाम शामिल था। हालांकि ये तमाम नेता हवाला मामले से बरी हो गए, आडवाणी ने 1996 का चुनाव नहीं लड़ा और प्रधानमंत्री बनने का अवसर भी खो दिया, जिसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बनें। हालांकि उनकी सरकार सिर्फ 13 दिन ही चली।

सोनिया गांधी को लेकर क्या कहा
अपने संस्मरण में मारग्रेट अल्वा ने सोनिया गांधी पर भी निशाना साधा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी मनमाने ढंग से पार्टी को चला रही हैं। उन्होंने दावा किया था कि मनमोहन सिंह अक्सर कहते थे कि वह उन्हें अपने मंत्रिमंडल में चाहते हैं, लेकिन सोनिया गांधी इसके लिए तैयार नहीं थी। अल्वा ने अपने संस्मरण में इस बात का भी जिक्र किया है कि राव सरकार ने बोफोर्स केस को खत्म किए जाने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील करने का फैसला लिया है, जिसपर सोनिया गांधी ने कहा था कि आखिर प्रधानमंत्री चाहते क्या हैं, वह मुझे जेल भेजना चाहते हैं। अल्वा ने संस्मरण में कहा कि सोनिया गांधी ने कहा आखिर कांग्रेस सरकार (नरसिम्हा राव) ने मेरे लिए किया क्या, इस घर को चंद्रशेखर सरकार ने मेरे लिए अलॉट किया था।
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