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श्रद्धांजलि: मन्नू भंडारी का लेखन और हम लेखिकाओं पर उनका असर

मन्नू भंडारी के लेखन की बोधगम्यता उनके व्यक्तित्व की सहजता है.

उनके लेखन और व्यवहार में कोई फाँक नहीं है. 90 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद समूचा साहित्य जगत और उनका बड़ा पाठक वर्ग शोक में डूब गया है. वो लंबे समय से बीमार चल रही थीं और उनका लेखन भी लगभग छूट चुका था. फिर भी वे हमेशा स्त्री लेखन की मज़बूत कड़ी बनी रहीं.

Mannu Bhandaris writings and their impact on writers

उनके निधन से साहित्य जगत में जो शून्य आया है, उसकी भरपाई असंभव है. वे उस दौर में लेखन कर रही थीं, जब स्त्रियाँ कम लिख रही थीं. उनकी संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है.

उस समय भारतीय समाज संक्रमण काल से गुजर रहा था. मध्यवर्गीय परिवारों में विखंडन शुरू हो चुका था और स्त्रियाँ अपनी अस्मिता को लेकर मुखर हो रही थीं.

मन्नू जी ऐसे दौर में एक सुधारवादी नज़रिया लेकर कथा जगत में आती हैं. उसी दौर में स्त्रियाँ घरों से बाहर निकलीं और कामकाज़ी बनीं. उनका जीवन बदला और सोच भी बदली. इस यथार्थ और बदलाव को मन्नू जी कई कोणों से देख-समझ रही थीं.

उन्होंने कामकाज़ी महिलाओं के जीवन-प्रसंगों, उनकी समस्याओं को केंद्र में रखकर कई कहानियाँ लिखीं. सादा शिल्प, परिवेश पर पैनी निगाह और कथ्य की सहजता उन्हें हरेक दौर में प्रासंगिक बनाती रहीं.

मन्नू भंडारी नई कहानी आंदोलन का हिस्सा रही हैं, जिसकी शुरुआत कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और भीष्म साहनी जैसे लेखकों ने की थी. मन्नू भंडारी उन लेखिकाओं में से रही हैं, जिन्होंने नए दौर के बनते भारत की महिलाओं के संघर्ष और चुनौतियों को रचती रहीं. उनके दौर की तमाम लेखिकाओं पर इसका असर देखने को मिला.

मन्नू भंडारी के साथ लंबे समय से साथ रहीं लेखिका सुधा अरोड़ा बताती हैं, "मन्नू जी के जीवन की प्रतिकूल स्थितियों से लड़ने की उनकी ताक़त और एक निर्णय लेकर उस पर अडिग रहने की उनकी ज़िद, उनके जीवन को एक समाज वैज्ञानिक के नज़रिए से विश्लेषित करने की माँग करता है, जो आने वाली सदियों तक बीस के दशक में जन्मी औरतों के समाज, परिवेश और मूल्यों की पड़ताल के लिए एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहेगा."

चर्चित लेखिका उषा किरण ख़ान मन्नू भंडारी के योगदान पर बताती हैं, "मन्नू भंडारी ने हिंदी कथा साहित्य को विश्वसनीय ऊँचाई दी. आधुनिक होती संवेदना से पगी हुई सहज भाषा, उनकी मौलिकता रही. मन्नू भंडारी ने सतत स्त्री पक्ष में खडे होने को चुना. स्त्री महानगर की हो या कस्बे की बडे संयत भाव से कलम पर आ विराजती. कथाओं में कभी कमज़ोर न होने दिया; बल्कि रास्ता भी सुझाया."

उषाकिरण ख़ान हिंदी साहित्य में मन्नू भंडारी के योगदान को रेखांकित करते हुए बताती हैं, "उन्होंने कोमल कथाकार का तमगा एक झटके से तोड़ डाला. महाभोज जैसी कृति लिखा, जिसमें राजनीति के क्रूर क्रियाकलापों को खोल कर रख दिया."

वहीं लेखक के तौर पर उनकी सफलता पर चर्चित कवयित्री अनामिका कहती हैं, "मन्नू जी की एक बड़ी सफलता यह है कि अब तक जो 'त्रिशंकु' बेचारगी से आबद्ध माना जाता था, एक बंकिम विक्षेप से उसे एक सोची-समझी रणनीति से जोड़कर यहाँ उन्होंने खड़ा कर दिया है."

मौजूदा समय के चर्चित कथाकारों में शुमार मनीषा कुलश्रेष्ठ उन्हें याद करते हुए कहती हैं, "हिंदी कहानी में नया तेवर और नए स्वाद के साथ साठ के दशक में जब मन्नू जी का पदार्पण हुआ, उसी समय उन्हें हिंदी के कथा जगत और पाठकों ने बड़े आराम से पहचान लिया था. संवेदनशील, सरल, बहुत संतुलित, कसा हुआ लेखन मन्नू जी के लेखन की पहचान थीं. शब्दों को लेकर वह मितव्ययी रहीं. आज के दौर में जब लेखक अपने लिखे वाक्य पर कैंची चलाते मोहग्रस्त रहता है, वहीं मन्नू जी ने अद्भुत आत्मसंयम के साथ 'यही सच है' जैसी प्रेम के द्वंद्व की कहानी लिखी, जो प्रेम कहानियों में मिसाल बनी रहेगी."

वहीं प्रसिद्ध आलोचिका रोहिणी अग्रवाल उन्हें अपनी तरह की पहली कहानीकार मानती हैं. उन्होंने कहा, "मन्नू भंडारी इस मायने में हिंदी की प्रारंभिक कहानीकार मानी जाएंगी कि वह पुरुष के उत्पीड़न की शिकार स्त्री की बेबसी को चित्रित करने की जगह, ऐसी स्त्री को परिदृश्य पर लेकर आईं जो तमाम नेकनीयती और सदाशयता के बावजूद अपने ही अंतर्विरोधों और कपटपूर्ण आचरण से अपने चारों ओर मकड़जाल बुनने लगती है."

हंस कथा सम्मान से सम्मानित युवा लेखिका योगिता यादव ने कहती हैं, "लेखक वह अद्भुत शख़्सियत है, जिसका रचा किसी के मन को बांधने, रोकने या उसे प्रेरित करने की क्षमता रखता है. हमारी प्रिय लेखिका मन्नू भंडारी इस हुनर की महारथी रहीं. मैं मन्नू जी को हमेशा 'आपका बंटी' के लिए याद करती हूं. उनके उपन्यास का वह पहला दृश्य, जिसमें एक बच्चे ने टेबल का सारा सामान फैला दिया, वह मेरे भीतर की स्त्री और मौजूदा समय की स्वच्छंदता को चुनौती देता है. स्त्री-पुरुष के संसार, उनके लाभ-हानि, प्रेम-प्रपंचों के बीच कोई तीसरा भी है, जिस पर उनके निर्णयों का असर पड़ता है."

योगिता यादव मन्नू भंडारी के लेखन से पड़ने वाले असर पर बताती हैं, "मेरे समय की स्त्री इतनी आत्मनिर्भर है कि वह अपने लिए कोई भी फ़ैसला ले सकती है. पर 'आपका बंटी' का बंटी मेरा पल्लू पकड़ कर रोक लेता है. वह मुझे कुछ और संयमशील, कुछ और धैर्यवान बनने के लिए प्रेरित करता है. क्योंकि हमें अपनी अगली पीढ़ी के लिए भी कुछ बचाकर रखना है. यह मन्नू जी के अलावा कौन कह सकता था."

बतौर लेखिका मन्नू जी के योगदान पर सुधा अरोड़ा बताती हैं, "मन्नू जी ने परिमाण में बहुत ज़्यादा नहीं लिखा, पर जो लिखा उसमें ज़िंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह पाठकों को छू लेता है. वह अपनी कहानियों में पात्रों के भीतरी कक्ष के हर संवेदनशील कोने को बेहद मार्मिकता और प्रामाणिकता से खंगालती हैं."

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