Mallikarjun Kharge: कांग्रेस अध्यक्ष के भरोसेमंद कैसे बने 80 साल के दलित नेता ? जानिए
नई दिल्ली, 30 सितंबर: मल्लिकार्जुन खड़गे को भी यकीन है कि वह कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव जीत जाएंगे। उनके नामांकन का पार्टी के बड़े नेताओं का जिस तरह से समर्थन मिला है, उससे यह जाहिर है कि खड़गे को कांग्रेस नेतृत्व का आशीर्वाद मिला हुआ है। कर्नाटक के 80 साल के इस दलित नेता ने यह विश्वास एक दिन में नहीं पाया है। इसके लिए उनका पार्टी और गांधी परिवार के प्रति पांच दशकों से भी ज्यादा का समर्पण और वफादारी है। यह वफादारी ऐसे ही नहीं कायम हुई है। इसके लिए उन्होंने कठिन संघर्ष भी किया है और धैर्य भी बनाए रखा है। अगर उनकी उम्मीदवारी पर 19 अक्टूबर को पार्टी की औपचारिक मुहर लग गई, जिसकी प्रबल संभावना जताई जा रही है तो उन्हें वह इनाम मिलेगा, जिससे वह कई बार वंचित रह गए थे।

2009 से केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए खड़गे
कांग्रेस में पिछले दो दशकों में गांधी परिवार के बाहर के किसी नेता का कद अचानक बढ़ा है तो उसमें मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम शामिल है। 2009 से पहले उत्तर भारत के लोग तो इस नाम से भी कम ही परिचित थे। लेकिन, पार्टी ने पहले मनमोहन सरकार में मंत्री बनाकर और फिर 2014 में लोकसभा में कांग्रेस के सदन का नेता बनाकर केंद्रीय राजनीति की लाइम लाइट में ला दिया। वैसे कर्नाटक में खड़गे का कद लंबे समय से बड़ा था, लेकिन फिर भी वह तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए थे। लेकिन, अबकी बार लगता है कि इस दलित नेता को कांग्रेस का सर्वोच्च पद मिलना सिर्फ औपचारिकता भर रह गया है।

तीन बार मुख्यमंत्री बनने से चूक गए थे
आज की तारीख में गांधी परिवार के वफादारों को देखा जाए तो खड़गे सबसे अगली पंक्ति में खड़े नजर आते हैं। लेकिन, हाई कमान परिवार के इतने करीब होते हुए भी वह 1999, 2004 और 2013 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से रह गए थे। उनकी जगह क्रमश: एसएम कृष्णा, धरम सिंह और सिद्दारमैया ज्यादा सौभाग्यशाली साबित हुए थे। बावजूद इसके खड़गे का पार्टी की फर्स्ट फैमिली पर से भरोसा कभी नहीं डगमगाया। उन्होंने पार्टी में छात्र राजनीति से शुरुआत की थी, गुलबर्गा सिटी कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और 9 बार एमएलए चुने गए, लेकिन फिर भी नेतृत्व से बगावत की नहीं सोची। इसी वफादारी का परिणाम है कि पहले लोकसभा में पार्टी के नेता और फिर राज्यसभा में दल का नेतृत्व और अब पार्टी की औपचारिक अगुवाई करने की संभावना जगी है।

चुनाव जीते तो दक्षिण भारत के छठे कांग्रेस अध्यक्ष होंगे
19 अक्टूबर को अगर मल्लिकार्जुन खड़गे चुनाव जीत जाते हैं तो दक्षिण भारत के छठे नेता होंगे जो आजादी के बाद इस पार्टी की अध्यक्षता कर सकेंगे। अच्छी हिंदी बोल लेने वाले खड़गे से पहले बी पट्टाभि सीतारमैया, नीलम संजीव रेड्डी, के कामराज, एस निजालिंगप्पा और पीवी नरसिम्हाराव को यह मौका मिल चुका है। खड़गे के लिए यह भी खास है कि उन्हें ढाई दशकों बाद गांधी परिवार से पार्टी का औपचारिक नेतृत्व अपने हाथों में लेने का अवसर मिल सकता है। क्योंकि, इतने वर्षों से कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी ने सीधे अपने हाथों में ले रखी है।

बहुत लंबा है चुनावी राजनीति में खड़गे का करियर
अपने होम टाउन गुलबर्गा में 1969 में शहर कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद उन्होंने 1972 में चुनावी राजनीति में कदम रखा और पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। यह चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इसे लगातार 8 बार और दोहराया। 1976 में देवराज उर्स की सरकार में वे पहली बार मंत्री बने। उसके बाद वो कर्नाटक में सभी कांग्रेस सरकारों में मंत्री रहे। 1996 से 99 तक और 2008-09 तक पार्टी ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया। 2005-08 तक वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे और 2009 में उन्होंने केंद्रीय राजनीति का रुख कर लिया और पहली बार लोकसभा चुनाव जीते। मनमोहन सिंह सरकार में पहले उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया और बाद में रेलवे और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की भी जिम्मेदारी दी गई।

मोदी सरकार के कार्यकाल में विपक्ष के मुख्य चेहरा बने
लेकिन, कांग्रेस की ओर से उन्हें केंद्र में मुख्यधारा की राजनीति के लिए तब खुलकर आने का मौका मिला, जब 2014 के मोदी लहर में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई और पार्टी ने उन्हें लोकसभा में अपना मुख्य चेहरा बना दिया। इस चुनाव में वह मोदी लहर के बाद दोबारा गुलबर्गा से चुनाव जीतने में सफल हुए थे। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वह कांग्रेस की ओर से सदन में काफी ज्यादा मुखर बन गए और पांच साल में उन्होंने अपनी एक पहचान बना ली।

2019 में हारने के बाद भी राज्यसभा में हुई एंट्री
लेकिन, 2019 का लोकसभा चुनाव उनके लिए बहुत नुकसानदेह रहा और अपने राजनीतिक करियर में पहली बार उन्हें हार का सामना करना पड़ गया। लेकिन, करीब एक दशक में और खासकर 2014 से 2019 के बीच उन्होंने जो अपनी छवि बनाई, उसकी वजह से हाई कमान ने उनपर मेहरबानी दिखाई और उन्हें राज्यसभा पहुंचा दिया। फरवरी, 2021 में पार्टी ने उन्हें ऊपरी सदन में नेता प्रतिपक्ष के पद पर बिठा दिया।

गांधी परिवार की चुनौतियां कम कर पाएंगे खड़गे!
बौद्ध धर्म मानने वाले खड़गे अभी तक किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़े हैं। कर्नाटक के गुलबर्गा जिले के वारवट्टी के एक गरीब परिवार में जन्मे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने बीए और लॉ की पढ़ाई की है और राजनीति शुरू करने से पहले वकालत भी कर चुके हैं। 1969 में जब खड़गे कांग्रेस से जुड़े थे, तब इंदिरा गांधी को भी पार्टी के अंदर से चुनौती मिल रही थी। पांच दशकों से भी ज्यादा समय बाद गांधी परिवार को एक बार फिर से अंदर से भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में खड़गे जैसे वफादार को पार्टी का अध्यक्ष पद मिलना, गांधी परिवार की उन चुनौतियों को कुछ हद तक जरूर कम कर सकता है, जिसका सामना वह राहुल गांधी की अगुवाई में 2019 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद से कर रही है।












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