BHU विवाद: दान देने से जब हैदराबाद निजाम ने किया इनकार तो मदन मोहन मालवीय ने क्या कहा था?

नई दिल्ली- बीएचयू में एक मुस्लिम के संस्कृत विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति करने को लेकर हुए विवाद के बीच बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय के पोते ने इस नियुक्ति का पूरा समर्थन किया है। सबसे बड़ी बात ये है कि महामना के नाम से लोकप्रिय पंडित मालवीय के पोते जस्टिस गिरधर मालवीय बीएचयू के चांसलर भी हैं। उनके अनुसार उनके बाबा (दादा) होते तो वे भी इस नियुक्ति पर कभी आपत्ति नहीं जताते। इस दौरान जस्टिस मालवीय ने वो पूरा वाक्या सुनाया कि जब मालवीय जी के सामने हैदराबाद के निजाम ने इसी तरह का हिंदू-मुस्लिम विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी तो उन्होंने अपने जवाब से निजाम की बोलती बंद कर दी थी।

'फिरोज खान की नियुक्ति को सही ठहराते महामना'

'फिरोज खान की नियुक्ति को सही ठहराते महामना'

बीएचयू के चांसलर और विश्वविद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय के पोते संस्कृत विभाग में फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर जारी विवाद से बहुत आहत हैं। उनके मुताबिक इस वक्त जो बीएचयू में सवाल उठाए जा रहे हैं, वह उनके बाबा मालवीय जी के नजरिए से ठीक उलट है। क्योंकि, उन्होंने तो बीएचयू की स्थापना समाज में जाति और धर्म की भावना से ऊपर उठकर की थी। दैनिक जागरण का एक खबर के मुताबिक जस्टिस मालवीय ने बताया है कि मालवीय जी का मानना था कि मुसलमान भी बीएचयू के लिए हिंदू हैं, क्योंकि उनका नजरिया बहुत ही व्यापक था। जस्टिस मालवीय का मानना है कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि छात्र आखिर किस वजह से फिरोज खान का विरोध कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि उन्हें कर्मकांड के बारे में तो बताना नहीं है, वह तो संस्कृति भाषा पढ़ाने आए हैं। इसलिए छात्रों को इस विरोध में समय बर्बाद करने के बजाय अपनी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए।

 जब महामना ने निजाम की चप्पल नीलाम करने की बात कही

जब महामना ने निजाम की चप्पल नीलाम करने की बात कही

मालवीय जी का हिंदू-मुस्लिम को लेकर क्या विचार था इसकी एक बहुत ही रोचक कहानी जस्टिस (रि) मालवीय ने सुनाई है। हुआ ये कि जब वे विश्वविद्यालय बनाने के लिए देशभर में दान इकट्ठा करने के लिए भ्रमण कर रहे थे तो उसी क्रम में हैदराबाद भी पहुंचे। उस समय वहां निजाम का शासन था। महामना हिंदू विश्वविद्यालय के लिए दान मांगने निजाम के पास पहुंचे तो पहले उसने साफ इनकार कर दिया। इसपर मालवीय जी ने निजाम से कहा कि वे बिना कुछ लिए तो जाते नहीं हैं और यहीं बैठ जाएंगे। इसपर पहले उसने उनकी गिरफ्तारी के लिए कहा। फिर उसने गिरफ्तारी का इरादा बदल दिया। निजाम के नहीं मानने पर मालवीय जी ने लौटने का फैसला किया, लेकिन वापसी में अपने साथ निजाम की चप्पल भी उठा लाए और उसे बाजार में नीलाम कहने की बात कह दी। इसपर निजाम असहज हो गया और उसने दोबारा उन्हें बुलवाया। फिर उनसे पूछा कि जब आप हिंदू हैं और मैं मुस्लिम तो आपको दान क्यों दूं और वो भी हिंदू विश्वविद्यालय बनवाने के लिए? इसपर महामना के जवाब ने निजाम को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने कहा हमारे लिए मुस्लिम भी हिंदू हैं और बीएचयू के लिए भी मुस्लिम हिंदू हैं।

महामना के आदर्शों से अनजान हैं प्रदर्शनकारी ?

महामना के आदर्शों से अनजान हैं प्रदर्शनकारी ?

बता दें कि, इस विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के साहित्य विभाग में पिछले दिनों प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति कराई गई थी। कुछ हिंदू छात्रों को इस नियुक्ति पर आपत्ति है। उनका मानना है कि मुस्लिम प्रोफेसर से वे संस्कृत कैसे सीख सकते हैं। उनकी ये भी दलील है कि ये नियुक्ति महामना के आदर्शों और नियमों के विपरीत है। जबकि, कई लोगों ने चयन प्र​क्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि विश्वविद्यालय के बोर्ड और कुलपति ने कहा है कि प्रोफेसर फिरोज की नियुक्ति में चयन प्रक्रिया के सभी मापदंडों का पालन किया गया है। बोर्ड की ओर से बताया गया कि संस्कृत विभाग के सहायक प्रोफेसर के पद के लिए 10 उम्मीदवारों को चुना गया था, जिनमें सबसे ज्यादा अंक पाकर फिरोज खान टॉप पर रहे थे, इस​लिए उनकी नियुक्ति की गई।

एक मुसलमान संस्कृत क्यों नहीं पढ़ा सकता?

एक मुसलमान संस्कृत क्यों नहीं पढ़ा सकता?

वहीं फिरोज खान का कहना है , ''मैं एक मुस्लिम हूं, तो क्या मैं संस्कृत छात्रों को सिखा नहीं सकता।'' हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में किसी मुस्लिम प्रोफेसर की पहली नियुक्ति के बारे में उनका कहना है कि संस्कृत से उनका खानदानी ताल्लुक है। उनके दादा गफूर खान राजस्थान में हिंदू देवी-देवताओं को लेकर भजन गाकर इतने मशहूर हो गए थे कि लोग उनको दूर-दूर से बुलाने आते थे। उन्हीं के आदर्शों पर चलते हुए उन्होंने संस्कृत की पढ़ाई की। साथ ही जयपुर में एक गौशाला के लिए प्रचार-प्रसार करते हुए गौ-सेवा भी की।

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