"संदीप 26/11 का पीड़ित नहीं है" आतंकियों का मुकाबला करते शहीद हुए मेजर के पिता ने नम आंखों से बोल दी बड़ी बात
Tahawwur Rana Extradition: 26/11 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड आतंकी तहव्वुर राणा को अमेरिका द्वारा प्रत्यर्पण किए जाने के बाद भारत लाया गया है। मुंबई आतंकी हमले के आरोपी राणा को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच 10 अप्रैल 2025 को दिल्ली लाया गया।
तहव्वुर राणा को भारत लाए जाने की खबर सुनकर मुंबई आतंकी हमले में शहीद हुए पुलिसकर्मियों और सेना से जवानों के परिवारों के जख्म ताजा हो गए हैं। शहीदों के परिजन तहव्वुर हुसैन राणा को जल्द से जल्द फांसी के फंदे पर लटकते देखना चाहते हैं।

मुंबई हमले में आतंकवादियों से लड़ते हुए अपनी जान की बाजी लगाने वाले शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता के. उन्नीकृष्णन तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण पर प्रतिक्रिया दी है। इतना ही नहीं शहीद के पिता ने अपने बेटे के बलिदान को याद करते हुए ऐसी बात कही जिसको सुनकर हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा।
तहव्वुर राणा के प्रत्यार्पण को बताई भारत की बड़ी जीत
शहीद मेजर के पिता के. उन्नीकृष्णन ने कहा "तहव्वुर राणा की भारत वापसी वास्तव में एक बड़ी जीत है, लेकिन डेविड कोलमैन हेडली सहित जघन्य कृत्य के पीछे के मास्टरमाइंड को अभी भी सही मायने में गिरफ्तार करने की जरूरत है।
कौन थे मेजर उन्नीकृष्णन?
गौरतलब है कि मेजर उन्नीकृष्णन ने अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए मुंबई ताज होटल में घुसकर असाधारण बहादुरी का परिचय दिया और आतंकवादियों से अकेले ही भिड़ने से पहले अपने घायल साथियों की सुरक्षित कर जान बचाई थी। मेजर संदीप ने ताज होटल के एक छोर पर आतंकवादियों को फंसाया, जहां उनकी वीरतापूर्ण मृत्यु हुई।
शहीद मेजर के ये थे अंतिम शब्द
मेजर के अंतिम शब्द उनके साहस की कहानी बयां करते हैं। मेजर ने कहा था "ऊपर मत आना, मैं उनसे निपट लूँगा।" उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया जा चुका है।
इस दिल दहला देने वाले घटना में अपने 30 साल के बेटे मेजर उन्नीकृष्णन को खो चुके पिता के. उन्नीकृष्णन के 17 साल बाद भी जख्म ताजा हैं। वो अपने बेटे को पीड़ित नहीं बल्कि एक समर्पित सैनिक के रूप में देखते हैं, जिसने अपने देश की रक्षा के लिए अपनी न्यौछावर कर दिया।
"मेरा बेटा संदीप 26/11 का पीड़ित नहीं है"
शहीद मेजर के पिता के. उन्नीकृष्णन ने कहा कहा "संदीप 26/11 का पीड़ित नहीं है। उसने अपना कर्तव्य निभाया है। वह एक देश सेना का जवान था, जिसने मौत के सामने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया। उसे यकीन था कि वह वापस नहीं आएगा। अगर उसने मुंबई में ऐसा नहीं किया, तो वह कहीं और ऐसा कर सकता था। हमारी मुख्य चिंता ऐसे हमले को रोकना होना चाहिए ताकि हम इन लोगों द्वारा किए जाने वाले नुकसान को कम से कम कर सकें।"












Click it and Unblock the Notifications