कैसे महज 3 दिन में बेआबरू हो गए महाराष्ट्र के पूर्व सीएम देवेंद्र फडणवीस!

बेंगलुरू। महाराष्ट्र में स्पष्ट जनादेश के बाद भी एनडीए सरकार गठन में नाकाम रही। महाराष्ट्र में पिछले तीन दशक से बीजेपी की सहयोगी रही शिवसेना ने अह्म के टकरावों के बीच ऐसे अड़ी की बीजेपी को सत्ता से बाहर होकर विपक्ष में बैठने को मजबूर होना पड़ा है। पिछले एक महीने तक चले सियासी ड्रामे के बीच महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बेदाग चेहरों में शुमार पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की साख को सबसे ज्यादा धक्का लगा है।

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      Maharashtra: BJP's one mistake made Sharad Pawar 'Big Boss' । वनइंडिया हिंदी
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      निःसंदेह 23 नवंबर, 2019 की सुबह-सुबह महाराष्ट्र की सियासत में जो कुछ हुआ, उससे पूरा देश दंग था। देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी लीडर अजित पवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की खबर हॉट केक की तरह बिक रहीं थी। महाराष्ट्र में अचानक बदले घटनाक्रम से हर कोई हैरान था। एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के नेताओं के नथूने आग उगल रहे थे, जो अगले दिन सरकार गठन का दावा पेश करने वाले थे।

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      महाराष्ट्र की सियासत में हुए अचानक आए बदलाव के बाद सियासत के चाणक्य के रूप में शुमार हो चुके बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को लोग याद करने लगे। मीम्स बनाए गए, बीजेपी की खूब वाहवाही हुई। लगा कि बीजेपी ने एक महीने बाद अगर महाराष्ट्र में सियासी चाल चला है, तो चाल पुख्ता होगी। किसी को आशंका नहीं थी कि एनसीपी के बुने चक्रव्यूह में बीजेपी यूं फंस जाएगी।

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      महाराष्ट्र में बीजेपी-एनसीपी (अजीत पवार) सरकार वजूद में आने से सभी दंग थे। कांग्रेस और शिवसेना के साथ-साथ एनसीपी चीफ शरद पवार भी अचानक उभरे समीकरण से हैरान-परेशान थे। कुछ ही देर में एनसीपी लीडर शरद पवार प्रकट हुए और उन्होंने नवगठित बीजेपी-एनसीपी सरकार से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि यह एनसीपी नेता और उनके भतीजे अजित पवार की कारगुजारी है।

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      अब तक महाराष्ट्र में सियासत चरम पर पहुंच चुकी थी। शिवसेना और एनसीपी ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस बुलाया और स्पष्ट किया कि एनसीपी-कांग्रेस और शिवसेना गठबंधन में कोई टूट नहीं हुई है और एनसीपी से टूटकर बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हुए अजित पवार से एनसीपी नहीं हैं। शरद पवार ने प्रेस के सामने ही जीतकर आए अपने विधायकों की परेड भी करवा दी।

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      घटनाक्रम तेजी से बदल रहा था और उधर एनसीपी अजित पवार को प्यार और तकरार दोनों माध्यमों से पार्टी में वापस आने की हिदायत देने में जुट गई। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट में याचिका डालकर महाराष्ट्र में सुबह-सुबह गठित हुई बीजेपी-एनसीपी (अजीत कुमार) सरकार की वैधानिकता पर भी सवाल उठा दिए।

      महाराष्ट्र में गठित बीजेपी-एनसीपी सरकार की वैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए सवाल तो तकनीकी रूप से धाराशाई हो गए, लेकिन देवेंद्र फडणवीस समेत पूरी महाराष्ट्र बीजेपी के आलाकमान की साख पर उंगली उठनी शुरू हो गई थी, क्योंकि एनसीपी नेता अजित पवार के पास संख्याबल नहीं था, यह बात शरद पवार और उद्धव ठाकरे के संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में विधायकों के कराए गए परेड से भी स्पष्ट हो चुका था।

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      सुप्रीम कोर्ट में सरकार गठन की वैधानिकता पर कोई उंगली नहीं उठी तो कांग्रेस और शिवसेना के वकीलों द्वारा महाराष्ट्र में गठित सरकार के तुरंत फ्लोर टेस्ट करवाने की फरियाद को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकृति देते हुए 27 नवंबर को सदन में फ्लोर टेस्ट करने का आदेश जारी कर दिया।

      इसके बाद जो हुआ उसने अब तक बेदाग छवि वाले पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की साख को धूल-धूसरित करने के लिए काफी था। निःसंदेह बीजेपी आलाकमान और देवेंद्र फडणवीस दोनों को एनसीपी नेता अजित पवार का आकलन करने में चूक हुई, जिससे महज 3 तीन के भीतर देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ गया।

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      इस्तीफे से देवेंद्र फडणवीस की गिरी साख की आंच बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंची, जिसकी तस्दीक सोशल मीडिया में तैर रहे मीम्स और शिवसेना और एनसीपी नेताओं के बयान से किए जा सकते हैं, जो अजीत पवार के डिप्टी सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद की खबर के बाद सुर्खियां बंटोर रहीं थी।

      देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र की राजनीति में बीजेपी का उगता हुआ सूरज कहा गया, जिन्होंने बेहद कम समय में ही महाराष्ट्र की सियासत अपनी शख्सियत बनाई थी। महज 47 साल की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाए गए देवेंद्र फडणवीस का 5 वर्ष का कार्यकाल न केवल बेदाग रहा बल्कि उनके कामकाज के तरीकों से चमकदार भी बना रहा।

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      य़ही कारण था कि देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व पर भरोसा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले लोकसभा चुनाव 2019 और फिर उसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 का नेतृत्व देवेंद्र फडणवीस को दिया और देवेन्द्र फडणवीस लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों बीजेपी आलाकमान के भरोसे पर खरे भी उतरे।

      देवेंद्र फडणवीस की बेदाग छवि और महाराष्ट्र में पांच साल चमकदार शासन का ही असर था कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2019 में एक बार पिछला प्रदर्शन दोहराते हुए 23 सीटों पर जीत दर्ज की। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में भी देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बीजेपी शानदार तरीके से लड़ी और 161 सीट जीतकर सहयोगी शिवसेना के साथ मिलकर एनडीए को बहुमत के करीब पहुंचा दिया था।

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      यह अलग बात है कि शिवसेना के जिद और अहम के टकराव ने बीजेपी को विपक्ष में बिठा दिया है। शिवसेना से बीजेपी के टकराव के पीछे देवेद्र फडणवीस का वह बयान भी दोषी ठहराया जा सकता है, जब उन्होंने शिवसेना के नाजायज मांगों को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि अगले पांच वर्ष तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर वहीं रहेंगे।

      माना जाता है कहीं न कहीं फडणवीस के तीखे बयानों ने शिवसेना को अह्म को चोट पहुंचा दिया था। यही कारण था कि शिवसेना किसी भी कीमत पर 50-50 फार्मूले से इतर बीजेपी के साथ महाराष्ट्र में सरकार गठन को तैयार नहीं हुई, क्योंकि शिवसेना 50-50 फार्मूले के जरिए बीजेपी आलाकमान से महज दवाब की राजनीति कर रही थी ताकि कुछ मलाईदार मंत्रालय के साथ-साथ उसके हाथ डिप्टी सीएम आ जाए।

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      लेकिन देवेंद्र फडणवीस का तैश भरा बयान शिवसेना के लिए जहर बन जाएग इसकी कल्पना खुद फडणवीस ने भी नहीं की थी। शिवसेना बीजेपी के साथ तब भी गठबंधन के लिए तैयार थी अगर बीजेपी देवेंद्र फडणवीस की जगह नितिन गडकरी या किसी और नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी हो जाती, लेकिन यह मुमकिन नहीं हो सकता था, क्योकि ऐनवक्त पर मुख्यमंत्री बदलने से बीजेपी को जनता के सामने फजीहत का सामना करना पड़ सकता था।

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      28 नवंबर को शिवसेना नेतृत्व में कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन सरकार महाराष्ट्र में शपथ लेगी और इसके बाद ही महाराष्ट्र का सियासी पारा कुछ दिन के लिए कम होगा, लेकिन देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी के तेवरों को देखते हुए नहीं लगता है कि महाराष्ट्र की सियासत का पारा आसानी से नीचे उतरेगा।

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      कर्नाटक की याद दिला रही महाराष्ट्र की सियासत में भी सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट बताती है कि अगले कुछ महीनों में नए समीकरण पैदा हो जाए तो किसी को आश्यर्य नहीं होना चाहिए। इसकी आशंका कर्नाटक में सत्ता गंवा चुके पूर्व मुख्यमंत्री एडी कुमारास्वामी जता चुके हैं, जिनकी सरकार महज 14 महीनों के बाद गिर गई और उसके बाद कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा की सरकार काबिज हो चुकी है।

      यह भी पढ़ें- अजित पवार को लेकर देवेंद्र फडणवीस ने तोड़ी चुप्पी, कहा- 'चिंता मत कीजिए, सही समय आने पर...

      47 साल की उम्र में बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे फडणवीस

      47 साल की उम्र में बने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे फडणवीस

      फडणवीस की कड़ी परीक्षा का दौर उसी दिन से शुरू हो गया था जब वो महाराष्ट्र की सत्ता में मराठा दावेदारों के बीच ब्राह्मण वर्ग का प्रतिनिधित्व लेकर शीर्ष में पहुंच गए थे। साल 2014 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव बीजेपी भारी बहुमत से जीती. जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए देवेंद्र फडणवीस के नाम का ऐलान सबसे बड़ा सरप्राइज़ था। उनसे पहले केवल एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ही ऐसी शख्सियत रहे हैं जो कि कम उम्र में सीएम बने थे।

      5 वर्ष तक महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के रूप बेदाग रहा सियासी सफर

      5 वर्ष तक महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री के रूप बेदाग रहा सियासी सफर

      देवेंद्र फडणवीस पर पार्टी के पुरजोर भरोसे की एकमात्र वजह उनकी बेदाग़ और युवा जोश से भरी सियासी यात्रा रही। संघ से जुड़ाव विरासत में मिला जिसने उन्हें बेहद ही अनुशासनप्रिय कार्यकर्ता बनाया और संघ की दीक्षा उनके सियासी जीवन में संजीवनी साबित हुई, लेकिन सीएम पद की अहम जिम्मेदारी से पहले वो राज्य के बीजेपी अध्यक्ष की जिम्मेदारी के रूप में अनुभव हासिल कर चुके थे। उन्हें स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे का करीबी माना जाता था इसलिए गोपीनाथ मुंडे के असामयिक निधन के बाद देवेंद्र फडणवीस ने अपने राजनीतिक कौशल से विरोधियों को साधने में कामयाब हुए। प्रधानमंत्री मोदी देवेंद्र का वरदहस्त हासिल है और उनके सीएम बनने की राह पीएम मोदी की स्वीकारोक्ति से तय हुई।

      5 साल तक फडणवीस ने किया महाराष्ट्र में चुनौतियों से सामना

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      राज्य के सबसे युवा सीएम बने देवेंद्र ने लोकसभा चुनाव से पहले ही मराठा आरक्षण कार्ड खेला। देवेंद्र फणडवीस के सामने बड़ी चुनौती थी कि कार्ड के चलते पिछड़ों का आरक्षण कहीं से भी प्रभावित न हो. उन्होंने पिछड़े वर्ग के कोटे को बिना छेड़े अगड़े वर्ग को साधने का काम किया. अगड़ों को बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है।

      बतौर मुख्यमंत्री फडणवीन से लिए कई बड़े फैसले भी लिए

      बतौर मुख्यमंत्री फडणवीन से लिए कई बड़े फैसले भी लिए

      पिछले साल मराठाओं ने आरक्षण को लेकर हिंसक आंदोलन भी किया था, जिसके बाद राज्य के 30 फीसदी मराठाओं को लुभाने के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 16 फीसदी आरक्षण देने का बिल पारित कर दिया गया। देवेंद्र फडणवीस का ये बड़ा सियासी दांव था। इसके अलावा देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के विकास का एजेंडा लेकर चल रहे हैं। उन्होंने राज्य को सूखा मुक्त करने के लिए सिंचाई व्यवस्था पर ज़ोर दिया। जलयुक्त शिवार की वजह से मौजूदा साल में सूखे में गिरावट देखी जा रही है। इसके अलावा पांच साल के कार्यकाल में उन्होंने महानगरों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज़ोर दिया। देवेंद्र फडणवीस सरकार के कार्यकाल में छगन भुजबल की गिरफ्तारी से बड़ा संदेश भेजने की कोशिश की, लेकिन किसानों के मोर्चे पर फडणवीस सरकार का कर्जा माफ न करने वाला फैसला गैर सियासी लगता है।

      1999 में पहली बार नागपुर से विधायक चुने गए थे फडणवीस

      1999 में पहली बार नागपुर से विधायक चुने गए थे फडणवीस

      देवेंद्र गंगाधरराव फडणवीस का जन्म 22 जुलाई 1970 को नागपुर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता गंगाधर राव आरएसएस और जनसंघ से जुड़े हुए थे। वो महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य भी थे। पिता से मिली राजनीतिक विरासत और सियासी अनुभव का देवेंद्र को फायदा मिला. वो कॉलेज की पढ़ाई के दौरान एबीवीपी यानी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। इसके अलावा नागपुर में संघ की शाखा से भी जुड़े। 21 साल की उम्र में देवेंद्र फडणवीस नागपुर के नगर निगम के नगरसेवक नियुक्त किए गए। साल 1997 में मात्र 27 साल की उम्र में वो मेयर बने और साल 1997 से 2001 तक महापौर रहे। साल 1999 में वो नागपुर से विधायक बने तो साल 2001 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। साल 2014 के विधानसभा चुनाव में देवेंद्र फडणवीस नागपुर के दक्षिण पश्चिम से विधायक बने।

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