पांचवें चरण में इन सीटों पर रहेगी नजर, कई दिग्गजों की किस्मत का होगा फैसला
नई दिल्ली। देश में 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे आम चुनाव के पांचवें चरण का मतदान 6 मई को होगा। इस चरण में देश के सात राज्यों की 51 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इस चरण में कई दिग्गजों की किस्मत का बटन दबेगा। यूपीए की चेयरमैन सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, अर्जुनराम मेघवाल, राज्यवर्धन राठौड़, लालू यादव के समधि चंद्रिका राय, राजीव प्रताप रुड़ी, पशुपति कुमार पासवान समेत इन कैंडिडेट की किस्मत का फैसला इस चरण में होना है।

देश की सबसे बड़ी सीट- रायबरेली
उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट पर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले दिनेश प्रताप सिंह यूपीए अध्यक्ष एवं चार बार की सांसद सोनिया गांधी से टक्कर लेने की कोशिश कर रहे हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर सोनिया गांधी ने बीजेपी के अजय अग्रवाल को 3 लाख 52 हजार 713 मतों से मात देकर सांसद बनी थी। कांग्रेस की सोनिया गांधी को 5,26,434 वोट मिले थे। बीजेपी के अजय अग्रवाल को 1,73,721 वोट मिले थे। बसपा की प्रवेश सिंह को 63,633 वोट मिले थे। लेकिन सालभर पहले अमित शाह ने दिनेश प्रताप के रूप में सोनिया का सबसे मजबूत सारथी तोड़ तो लिया, लेकिन लोग दिनेश की निष्ठा और नीयत पर सवाल भी उठा रहे हैं।

अमेठी में एक बार फिर राहुल गांधी और स्मृति ईरानी आमने-सामने
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकसभा सीट पर इस बार भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी कड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। गांधी परिवार की इस सीट को हासिल करने के लिए स्मृति ईरानी ने पांच साल में 32 दौरे किए। वह 39 दिन लोगों के बीच रहीं। क्षेत्र के पांच में से चार विधायक भाजपा के हैं, इनमें भी कांग्रेस का एक भी है। राहुल पहला लोकसभा चुनाव 2004 में अमेठी से लड़े और जीते। 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस का प्रचार किया। उसी साल उन्हें पार्टी संगठन में अहम जिम्मा दिया गया और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का महासचिव बनाया गया। वर्ष 2009 का आम चुनाव वह 3,33,000 वोटों के अंतर से जीते। इसके बाद वे मोदी लहर में एक बार फिर इस सीट पर कब्जा जमाने में सफल रहे। मौजूदा केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी इस बार भी भाजपा की टिकट पर अमेठी लोकसभा सीट से प्रत्याशी हैं। वह राज्यसभा सांसद हैं।

बीजेपी बरकरार रख पाएगी लखनऊ सीट?
उत्तर प्रदेश के लखनऊ सीट से गृह मंत्री राजनाथ सिंह अपनी चुनावी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां समाजवादी पार्टी की पूनम सिन्हा खड़ी हैं जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुये नेता एवं अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी हैं। वहीं कांग्रेस ने इस सीट से आचार्य प्रमोद कृष्णम उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ संसदीय सीट पर 53.02 फीसदी मतदान हुए थे। इस सीट पर बीजेपी के राजनाथ सिंह ने कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी को 2 लाख 72 हजार 749 वोटों से मात देकर जीत हासिल की थी। बीजेपी के राजनाथ सिंह को 5,61,106 वोट मिले थे। कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी को 2,88,357 वोट मिले थे। इस सीट पर बसपा तीसरे और सपा चौथे स्थान पर रही थी। लेकिन इस बार पूनम सिन्हा के आने के बाद इसी सीट पर मुकाबला थोड़ा रोचक हो गया है।

धौरहरा पर दिखेगा रोचक मुकाबला
धौरहरा लोक सभा सीट 2008 परिसीमन के बाद शाहजहांपुर से अलग होकर अस्तित्व में आई थी। 2009 में यहां पहली बार चुनाव हुआ। कांग्रेस के जितिन प्रसाद जीते। अगले चुनाव में वो सीट बरकरार नहीं रख पाए। मोदी लहर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2014 में भाजपा की रेखा वर्मा 1.25 लाख वोटों से जीती थीं। अब 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन होने के साथ ही यहां की लड़ाई दिलचस्प हो गई है। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां से बीजेपी की रेखा ने जीत दर्ज की। 2019 के चुनाव में कांग्रेस के जितिन प्रसाद यहां चौथे नंबर पर रहे थे, उन्हें सिर्फ 16 फीसदी ही वोट मिले थे। इस बार इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है। एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन में यह सीट समाजवादी पार्टी के खाते में है। 2019 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर बीजेपी, कांग्रेस और एसपी-बीएसपी गठबंधन के बीच कांटे का मुकाबला माना जा रहा है।

नागौर सीट
राजस्थान में कांग्रेस का गढ़ रही नागौर संसदीय सीट पर इस बार राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) के संयोजक हनुमान बेनीवाल के कंधों पर सवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनाव प्रतिष्ठा दांव पर है जहां बेनीवाल का कांग्रेस प्रत्याशी ज्योति मिर्धा से सीधा मुकाबला होता नजर आ रहा है। इस सीट पर 1977 के चुनाव से लगातार जाट उम्मीदवार ही जीतता आ रहा है और गत विधानसभा चुनाव में जिले की दस विधानसभा सीटों पर दो सुरक्षित सीटों को छोड़कर शेष सभी आठ सीटों पर जाट प्रत्याशियों के जीतने से जाट लैंड के रुप में उभरे जिले में इस बार भी मुख्य मुकाबला दो जाट प्रत्याशी हुनमान बेनीवाल और ज्योति मिर्धा के बीच हैं। नागौर में अब तक हुए लोकसभा चुनावों में वर्ष नाथूराम मिर्धा ने सबसे अधिक 6 बार 1977, 1980, 1984, 1989, 1991 एवं 1996 में चुनाव जीता। उन्होंने 1989 में जनता दल तथा शेष चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में चुनाव जीता।

बीकानेर
राजस्थान में पांचवें चरण यानी छह मई को चर्चित बीकानेर सीट पर मतदान होगा। बीकानेर सीट पर कांग्रेस ने पूर्व आईपीएस अधिकारी मदनगोपाल मेघवाल को अपना प्रत्याशी बनाया है तो वहीं इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के अर्जुन राम मेघवाल तीसरी बार भाग्य आजमाएंगे। राजनीतिक समर में उतरे इन दोनों प्रत्याशियों में कई समानताएं हैं। दोनों भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर राजनीति में आए हैं, दोनों मेघवाल समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं और दोनों मौसेरे भाई हैं। केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल साल 2009 में भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में आए और बीकानेर सीट से जीते। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के शंकर पन्नू को तीन लाख से ज्यादा वोटों से हराया। मोदी सरकार में मेघवाल का कद लगातार बढ़ा। वह लोकसभा में बीजेपी के मुख्य सचेतक रहे और फिलहाल जल संसाधन के साथ साथ केंद्रीय राज्य मंत्री हैं।
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जयपुर ग्रामीण
जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं। जयपुर ग्रामीण सीट से बीजेपी प्रत्याशी केंद्रीय मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ हैं तो कांग्रेस ने राजगढ़ से विधायक कृष्णा पूनिया पर दांव खेला है। 2008 के परिसीमन में जयपुर और अलवर जिले के कुछ हिस्सों को मिलाकर जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट का गठन हुआ। यहां पहला चुनाव 10 साल पहले 2009 में हुआ था। अब तक इस सीट पर दो बार लोकसभा चुनाव हुए। इसमें 2009 के चुनाव में इस सीट से कांग्रेस के लालचंद कटारिया जीते थे। वहीं, 2014 में हुए चुनाव में मोदी लहर में निशानेबाज राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जीते। दोनों ही केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे।

अलवर लोकसभा सीट
राजस्थान के मेवात क्षेत्र की अलवर लोकसभा सीट इस चुनाव में खास वजह से चर्चित है। यहां भाजपा ने महंत बालकनाथ को चुनाव मैदान में उतारा है। इनके गुरु महंत चांदनाथ 2014 में जीते थे, जिनके निधन के बाद 2018 के उपचुनाव में कांग्रेस ने यह सीट जीत ली थी। अलवर राजघराने के पूर्व सदस्य व यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे जितेंद्र सिंह कांग्रेस से ताल ठोक रहे हैं। राजघराने और संन्यासी के बीच की छिड़ी सियासत की लड़ाई को बसपा ने तड़का लगा कर और दिलचस्प बना दिया है। बसपा ने इमरान खान को उतारा है। 2014 के चुनाव में भाजपा के महंत चांदनाथ यहां से चुनाव जीतने में सफल रहे। चांदनाथ ने कांग्रेस प्रत्याशी जितेन्द्र सिंह को 2.83 लाख वोटों से पराजित किया था। महंत चांदनाथ का निधन हो गया, जिसके बाद 2018 की शुरुआत में उपचुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस प्रत्याशी व पूर्व सांसद डॉ करन सिंह यादव ने भाजपा के पूर्व सांसद डॉ जसवंत सिंह यादव को 1,96,496 मतों के भारी अंतर से हरा दिया। कांग्रेस के करन सिंह यादव को 6,42,416 और भाजपा के जसवंत सिंह यादव को 4,45,920 वोट मिले।

सारण सीट पर लालू परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर
लोकनायक जय प्रकाश नारायण की जन्मभूमि सारण सीट बिहार की सबसे हाई प्रोफाइल संसदीय सीट मानी जाती है। हमेशा से ही सारण राजनीतिक रूप से वीआईपी क्षेत्र बना रहा है। 2008 के परिसीमन से पहले इसका नाम छपरा था। बीजेपी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रुडी यहां के वर्तमान सांसद हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजीव प्रताप रूडी ने लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी को हराया था। राजीव प्रताप रूडी को 3,55,120 वोट मिले थे। जबकि राबड़ी देवी को 3,14,172 वोट। जेडीयू के सलीम परवेज 1,07,008 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजीव प्रताप रूडी मैदान में हैं और उन्हें इस बार राष्ट्रीय जनता दल के चंद्रिका राय चुनौती दे रहे हैं। पूर्व मंत्री चंद्रिका राय भी लंबे अरसे से इसी संसदीय क्षेत्र के परसा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय के परिवार का होने की वजह से उनका इस क्षेत्र में अपना अलग प्रभाव रहा है। राजद प्रत्याशी चंद्रिका राय उनके ही बेटे हैं और लालू यादव के समधी यानि लालू यादव के बेटे तेज प्रताप के ससुर हैं।

हाजीपुर सीट पर एक बार फिर पासवान परिवार
हाजीपुर लोकसभा सीट पर एनडीए और महागठबंधन आमने-सामने है। एनडीए से पशुपति कुमार पारस चुनाव मैदान में हैं। जबकि महागठबंधन से उनको शिवचंद्र राम चुनौती दे रहे हैं। हाजीपुर से रामविलास आठ बार चुनाव जीतकर इस क्षेत्र का संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। चार दशकों से करीब सभी लोकसभा चुनाव में भागीदारी करने वाले केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र के चुनावी रण से बाहर हैं। इस बार उन्होंने इस सीट से अपने छोटे भाई और अपनी पार्टी लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस को मैदान में उतारा है। इस सीट पर पारस का मुख्य मुकाबला राजद के नेता शिवचंद्र राम से है। राम विलास पासवान के भाई पशुपति पारस वर्तमान में बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री हैं। वह लोक जनशक्ति पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और अलौली विधानसभा सीट से विधायक हैं।

मधुबनी में हुक्मदेव नारायण यादव ने अपनी विरासत बेटे को सौंपी
एनडीए ने इस सीट से चार बार सांसद रहे हुक्मदेव नारायण यादव के बेटे अशोक कुमार यादव को टिकट दिया है। वहीं कांग्रेस नेता शकील अहमद के निर्दलीय चुनावी मैदान में कूदने के बाद मधुबनी लोकसभा सीट पर एनडीए और महागठबंधन का समीकरण बिगड़ गया है। इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। महागठबंधन में हुए सीट शेयरिंग के बाद यह सीट मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी के खाते में आई। शकील अहमद बिहार से तीन बार विधायक और मधुबनी लोकसभा सीट से दो बार सांसद रह चुके हैं। वे मधुबनी से 1998 और 2004 में चुने गए। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी रह चुके हैं। मधुबनी सीट से सबसे ज्यादा जीत का रिकॉर्ड हुक्मदेव के नाम है। वे यहां से 4 बार चुने गए हैं।
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टीकमगढ़ दिखेगा कड़ा मुकाबला
टीकमगढ़, निवाड़ी और छतरपुर जिलों के विधानसभा क्षेत्रों से बनी टीकमगढ़ लोकसभा संसदीय सीट में पिछले चुनावों तक मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच रहा है। इस सीट पर कांग्रेस से नए कैंडिडेट के रूप में अहिरवार किरण, बीजेपी से डॉ. वीरेंद्र कुमार और सपा के आरडी प्रजापति सहित 14 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। 2014 में बीजेपी से वीरेंद्र कुमार ने कांग्रेस के कमलेश वर्मा को 2,14,248 मतों से हराया था। इस बार वीरेंद्र कुमार टीकमगढ़ से हैट्रिक लगाने के मूड से चुनावी मैदान में हैं।

दमोह लोकसभा सीट
दमोह लोकसभा सीट मध्य प्रदेश में बीजेपी का अभेद किला मानी जाती है। यहां पर शुरुआती 3 चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली थी। दमोह लोकसभा सीट पर बीजेपी से प्रहलाद पटेल, कांग्रेस से प्रताप सिंह लोधी और बसपा से जित्तू खरे (बादल) सहित 15 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। ये सीट तीन दशकों के बीजेपी के पास है। प्रहलाद पटेल ने 2014 में कांग्रेस के महेंद्र प्रताप सिंह को 2 लाख से ज्यादा मतों से मात देकर जीत हासिल की थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रहलाद सिंह पटेल को 513079 (56.25 फीसदी) वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस के चौधरी महेंद्र प्रताप सिंह को 299780 (32.87 फीसदी) वोट मिले थे। दोनों के बीच हार जीत का अंतर 213299 वोटों का था। इस चुनाव में बसपा 3.46 फीसदी वोटों के साथ तीसरे स्थान पर थी।

हजारीबाग लोकसभा सीट
झारखंड की हाई प्रोफाइल हजारीबाग लोकसभा सीट पर सियासी संग्राम रोमांचक होने जा रहा है। नागरिक उड्यन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा यहां से सांसद हैं। भाजपा नेता ने 2014 के चुनाव में करीब 1.59 लाख वोट के अंतर से कांग्रेस के प्रतिद्वंद्वी सौरभ नारायण को मात दी थी। जयंत सिन्हा 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार यहां से जीते. उससे पहले इस सीट पर उनके पिता यशवंत सिन्हा का कब्जा रहा। कांग्रेस के गोपाल साहू पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। वह झारखंड कांग्रेस के कोषाध्यक्ष भी हैं। गोपाल साहू 2005 में रांची विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। उनका राजनीतिक घराने से संबंध है। उनके भाई शिव प्रसाद साहू सांसद रह चुके हैं, जबकि धीरज साहू वर्तमान में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। बीजेपी के यशवंत सिन्हा यहां से तीन बार सांसद चुने गए। पिछले 8 चुनावों से कांग्रेस यहां लगातार हारती आ रही है।

खूंटी में अर्जुन मुंडा रच सकते हैं इतिहास
खूंटी लोकसभा सीट बीजेपी का गढ़ रही है। झारखंड बनने से पहले यह सीट बिहार में थी। 1967 से अब तक हुए 13 चुनावों में से 7 बार ये सीट बीजेपी के खाते में गई। खूंटी सीट पर 8वीं बार कमल खिलाने की बड़ी चुनौती पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के सामने है। इस सीट पर मुख्य मुकाबला अर्जुन मुंडा और कांग्रेस के प्रत्याशी कालीचरण मुंडा के बीच है। बीजेपी के जीत में कड़िया मुंडा का बड़ा रोल है। कांग्रेस ने तीन बार, भारतीय लोक दल, झारखंड पार्टी और निर्दलीय प्रत्याशी ने एक बार यहां जीत दर्ज की। फिलहाल, यहां बीजेपी से कड़िया मुंडा सांसद हैं। वे 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2009 व 2014 के लोक सभा चुनाव में खूंटी से संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे। केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के तीन बार मंत्री व 2009 से 2014 तक लोक सभा के उपाध्यक्ष भी रहे।

रांची लोकसभा सीट
रांची लोकसभा सीट सराईकेला, खरसावां और रांची जिलों के कुछ हिस्सों को मिलाकर बनाया गया है। रांची सीट पर बीजेपी प्रत्याशी संजय सेठ और कांग्रेस प्रत्याशी सुबोधकांत सहाय के बीच सीधा मुकाबला है। पांच बार सांसद रह चुके वर्तमान सांसद रामटहल चौधरी का निर्दलीय चुनाव लडना रांची सीट को काफी रोचक बना दिया है। भाजपा ने चौधरी की जगह इस बार संजय सेठ को मैदान में उतारा है। महागठबंधन के प्रत्याशी के रूप में प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय मैदान में हैं। सुबोधकांत ने भी तीन बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। ऐसे में प्रथम दृष्ट्या रांची में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बन रही है। अब जबकि इस सीट के लिए छह मई को मतदान होना है। रांची लोकसभा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में फैला हुआ है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गैर जनजातीय आबादी भी दस से 15 फीसदी है। खासकर पिछड़े वर्ग में कुर्मी जाति यहां 15 फीसदी से ज्यादा है।












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