लोकसभा चुनाव 2019: दिल्ली में अबकी बार, किसके साथ पूर्वांचली

दिल्ली, भाजपा, आप, कांग्रेस
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"मनोज तिवारी नाचता बहुत अच्छा है, पांडे जी को नाचना नहीं आता. पांडे जी को काम करना आता है. इस बार काम करने वाले को वोट देना. नाचने वाले को वोट नहीं देना. नाचने वाला कोई काम नहीं आएगा."

उत्तर पूर्वी दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार दिलीप पांडे के समर्थन में वोट मांगते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ये बात भाजपा के प्रत्याशी मनोज तिवारी के लिए कही.

मनोज तिवारी ने अरविंद केजरीवाल के इन शब्दों को पूर्वांचलियों के मान-सम्मान और अस्मिता से जोड़ा.

समाचार एजेंसी एएनआई को दिए इंटरव्यू में मनोज तिवारी ने कहा, "मेरा अपमान करके, केजरीवाल ने दिल्ली में रह रही पूर्वांचल की जनता का अपमान किया है. अब यही पूर्वांचल की जनता इस चुनाव में दिखाएगी कि उनके इस बयान का क्या नतीजा हो सकता है."

manoj tiwari

यूपी बिहार के चेहरों पर दिल्ली में बड़ा दांव

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर दिल्ली की राजनीति में क्या पूर्वांचलियों की इतनी चलती है कि वो किसी उम्मीदवार की तकदीर का फ़ैसला कर सकते हैं या फिर यह धारणा है.

जिस उत्तर-पूर्वी दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बयान पर ये विवाद हुआ, दरअसल दिल्ली की उस संसदीय सीट पर तीनों उम्मीदवार बिहार-यूपी से ताल्लुक़ रखते हैं.

आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार दिलीप पांडे ख़ुद को बनारस का बताते हैं. वहीं बीजेपी ने इस सीट से दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी को उतारा है, जो अपना जन्म स्थान भी बनारस ही बताते हैं.

यहां से कांग्रेस की उम्मीदवार शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, लेकिन उनका नाता भी उत्तर प्रदेश के कन्नौज से है. इस लोकसभा सीट पर यूपी-बिहार से आए लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है.

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़(CSDS) के निदेशक संजय कुमार के मुताबिक़, "दिल्ली की सात लोक सभा सीटों में तीन सीटों पर पूर्वांचलियों की संख्या बहुत है. उत्तर पूर्वी दिल्ली सीट उनमें से एक हैं. यहां 25 से 28 फ़ीसदी लोग यूपी-बिहार से आए हैं."

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दिल्ली के दंगल में 'पूरबिया' पॉलिटिक्स

तो क्या वाक़ई में इनकी संख्या इस क़दर निर्णायक है कि किसी उम्मीदवार को वो हरा या जिता सकते हैं?

इस पर संजय कुमार कहते हैं, "निर्णायक वो समुदाय होता है जिसकी मौजूदगी किसी भी सीट पर 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हो. पूर्वांचलियों की दिल्ली की किसी भी सीट पर इतनी तादाद नहीं है. इसलिए उन्हें निर्णायक नहीं माना जा सकता. लेकिन 25 से 30 फ़ीसदी की तादाद के साथ भी अगर वो एक तरफ़ वोट कर दें तो ये भी निर्णायक साबित हो सकते हैं लेकिन आमतौर पर ऐसा होता नहीं है. हां, हम ये कह सकते हैं कि पूर्वांचलियों की संख्या बहुत बड़ी है और अगर उनका एकमुश्त वोट किसी के पक्ष में गया तो उस उम्मीदवार की जीत में उनकी अहम भूमिका होगी."

उत्तर पूर्वी दिल्ली के अलावा पूर्वी दिल्ली और पश्चिम दिल्ली लोकसभा सीटों पर भी पूर्वांचलियों की संख्या ज़्यादा है.

क्या पंजाबी वोटर से ज़्यादा हैं पूर्वांचली?

दिल्ली में पूर्वांचलियों के अलावा एक बहुत बड़ा तबका पंजाबी, दलित, मुसलमान, और ओबीसी का भी है. कुछ साल पहले तक दिल्ली की राजनीति में उम्मीदवार हों या पार्टी अध्यक्ष, सभी राजनीतिक पार्टियों में पंजाबियों का दबदबा रहता था.

संजय कुमार के मुताबिक़, "संख्या के आधार पर बात करें तो दिल्ली में पूर्वांचिलयों की संख्या पंजाबी वोटरों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन दबदबा आज भी दिल्ली की राजनीति में पंजाबियों का ही है. ऐसा कई बार होता है जब किसी समुदाय की संख्या कम होती है, लेकिन उसका दबदबा ज़्यादा होता है. दिल्ली की आबादी में पंजाबियों का हिस्सा लगभग 15 से 18 फ़ीसदी है."

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छठ पूजा और राजनीति

उत्तर पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी दिलीप पांडे की मानें तो दिल्ली की राजनीति में पूर्वांचलियों को मुख्यधारा में शामिल करने का पूरा श्रेय केवल आम आदमी पार्टी को जाता है.

उनका दावा है कि आम आदमी पार्टी ही वो पहली पार्टी है जिसने दिल्ली में प्रदेश का अध्यक्ष पूर्वांचल के एक आदमी को बनाने का जोखिम उठाया. वो और बात है कि बाद में पार्टी के लिए यही क़दम वरदान साबित हुआ.

लेकिन पूर्वांचलियों को अपने खेमे में करने के लिए शीला दीक्षित की सरकार ने सबसे पहले छठ पर स्कूलों में छुट्टी की घोषणा की थी. यह बात सुनते ही दिलीप पांडे बिफर पड़े. सवाल को बीच में ही काटते हुए उन्होंने कहा, "जब दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस पार्टी क़ाबिज़ थी तब दिल्ली में केवल 90 घाट हुआ करते थे. लेकिन आज तक़रीबन 300 घाट हैं और सभी घाटों पर हर तरह की सुविधाएं भी मौजूद हैं."

कांग्रेस की उम्मीदवार शीला दीक्षित पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, "वो लोग क्या पूर्वांचलियों का साथ देंगे, जो ऑन रिकॉर्ड उनका विरोध करते रहे हैं."

sheela dixit

दिलीप पांडे, शीला दीक्षित के 2007 में दिए गए एक बयान का ज़िक्र कर रहे थे. 2007 में मई के महीने में दिल्ली में आयोजित एक समारोह में शीला दीक्षित ने कहा था, "दिल्ली एक संपन्न राज्य है और यहाँ जीवनयापन के लिए बाहर से और विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार से बड़ी संख्या में लोग आते है और यहीं बस जाते हैं."

बाद में इस बयान पर उनकी काफ़ी आलोचना हुई, जिसके बाद उन्होंने एक बयान जारी कर कहा, "मेरा इरादा किसी भी राज्य के लोगों की भावनाओं को आहत करना नहीं था, मैं तो स्वयं उत्तर प्रदेश की हूं और मैं ऐसा कैसे सोच सकती हूं.''

शीला दीक्षित के इस बयान का उनकी ही पार्टी के पूर्वांचली विधायक महाबल मिश्रा ने भी विरोध किया था.

इस बार वो पश्चिम दिल्ली लोकसभा सीट से मैदान में है. उनके इलाक़े में पंजाब के लोगों की तादाद भी ज़्यादा है. इसलिए वो ख़ुद को सिर्फ़ पूर्वांचल का नहीं बताते. उनका कहना है, "पूर्वांचल का मैं हूं, मुझे इस बात का गर्व है, लेकिन मैंने काम सभी इलाक़े के लोगों के लिए किया है."

आम आदमी पार्टी के दावों को झुठलाते हुए उन्होंने कहा, "छठ पूजा में छुट्टी देने से लेकर पूजा के घाट बनाने की शुरुआत तक सभी काम कांग्रेस के राज में हुए. कांग्रेस पार्टी ने मुझे टिकट 1998 में ही दे दिया था और मैं उस वक़्त विधायक बना जब आम आदमी पार्टी का जन्म भी नहीं हुआ था."

अनाधिकृत कॉलोनियों के लिए किए गए अपने काम के बारे में बताते हुए महाबल मिश्रा कहते हैं, "यूपी-बिहार से आए लोगों को बसाने से लेकर उन तक बिजली-पानी पहुंचाने का काम कांग्रेस ने ही किया है."

दिल्ली में इस वक़्त तक़रीबन 1800 अनाधिकृत कॉलोनियां है, जिनको नियमित करने के नाम पर हर साल वोट मांगे जाते हैं. इनमें से ज़्यादातर वो कॉलोनियाँ हैं जहां यूपी-बिहार से नौकरी की तलाश में आए लोग रहते हैं.

mahabal mishra

पूर्वांचल मोर्चा का दबदबा

दिल्ली में पूर्वांचलियों के दबदबे का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि तीनों ही पार्टियों ने उत्तर पूर्वी संसदीय क्षेत्र में इलाक़े के लोगों की मदद करने और मुद्दों को समझने और सुलझाने के लिए पूर्वांचल मोर्चे का गठन कर रखा है.

कांग्रेस ने इसका नाम पूर्वांचल कांग्रेस रखा है, तो आम आदमी पार्टी का अपनी पूर्वांचल प्रकोष्ठ है जबकि बीजेपी ने इसका नाम पूर्वांचल मोर्चा रखा है.

पिछली बार निगम चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को प्रचार के लिए बुलाया था.

यही आलम इस बार बीजेपी का है. पार्टी ने पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार गौतम गंभीर के चुनाव प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बुलाया है.

योगी आदित्यनाथ को पूर्वांचल का बड़ा नेता माना जाता है, जो यूपी बिहार के लोगों के साथ ही हिंदू वोटरों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. वैसे वो आज की तारीख़ में भाजपा से स्टार प्रचारक भी हैं.

बीजेपी के पूर्वांचल मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष मणि सिंह ने बीबीसी से कहा कि दिल्ली में बीजेपी के पूर्वांचल मोर्चा में 12 हज़ार पदाधिकारी हैं और तक़रीबन दो लाख लोग पार्टी के साथ जुड़े हैं.

उन्होंने कहा, "मनोज तिवारी पर हमला पूर्वांचलियों पर हमला इसलिए है क्योंकि मनोज तिवारी हमारा अभिमान हैं. उनके नाम पर नीदरलैंड तक में डाक टिकट जारी हो चुका है. उन्होंने सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं, देश ही नहीं पूरे विश्व में पूर्वांचलियों का सम्मान बढ़ाया है. हमने केजरीवाल जी के बयान के विरोध में प्रदर्शन भी किया था."

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पूर्वांचलियों के दबदबे की शुरुआत की कहानी

राजधानी दिल्ली में ये बदलाव 80 के दशक से आना शुरू हुआ था. ये वो दौर था जब नौकरी और शिक्षा की तलाश में लोग बिहार और यूपी से दिल्ली का रुख़ करने लगे और तभी से दिल्ली में उनके दबदबे की बुनियाद पड़नी शुरू हुई.

शुरुआत में तो पंजाबियों का ही दबदबा बना रहा लेकिन दिल्ली में जैसे-जैसे यूपी-बिहार से आए लोगों की आबादी बढ़ती गई, उनका दबदबा और राजनीतिक रसूख भी बढ़ता गया और आज ये आलम है कि दिल्ली की राजनीति में कोई भी पार्टी उनकी नाराज़गी मोल लेने का जोखिम नहीं उठा सकती.

उत्तर पूर्वी दिल्ली के तीनों उम्मीदवारों का यूपी बिहार से नाता है. ये इस डायनेमिक्स को बताता है कि सियासी पार्टियाँ अब पूर्वांचली मतदाताओं को हल्के में नहीं लेती हैं. आज से 30 साल पहले तक कोई राजनीतिक पार्टी किसी पूर्वांचली को दिल्ली में अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बात सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन आज की तारीख़ में तीनों बड़ी पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष बिहार और यूपी वाले ही हैं.

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