लोकसभा चुनाव 2019: जॉर्ज को गुरु मानते थे नीतीश लेकिन 2009 के चुनाव में कर दी थी फजीहत
नई दिल्ली। जॉर्ज फर्नांडीस भारतीय राजनीति की अजीम हस्ती थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज जिस मुकाम पर खड़े हैं उसमें जॉर्ड फर्नांडीस का बहुत बड़ा योगदान है। नीतीश, जॉर्ज को आज भी अपना गुरु और मार्गदर्शक मानते हैं। लेकिन 2009 में नीतीश कुमार ने उनके साथ बहुत बुरा सलूक किया था। नीतीश के कहने पर ही जॉर्ज 1996 में चुनाव लड़ने के लिए नालंदा आये थे। वे नालंदा से तीन बार सांसद रहे। रक्षा मंत्री रहे तो नालंदा में आयुध फैक्ट्री और सैनिक स्कूल का तोहफा दिया। नालंदा अब नीतीश का गढ़ है लेकिन यहां जॉर्ज फर्नांडीस ने भी बहुत काम किया है। नालंदा में जॉर्ज के चाहने वालों की कमी नही है। जॉर्ज फर्नांडीस को कैसे नालंदा से हटाया गया और 2009 में कैसे उनके साथ बदसलूकी हुई, ये राजनीति की करुण कहानी है।

जॉर्ज के करीबी बने नीतीश
1993 में जब नीतीश कुमार लालू यादव के वर्चस्व को तोड़ने के लिए छटपटा रहे थे तब सबसे पहले जॉर्ज ने ही उनका साथ दिया था। 1994 में जब जनता दल का विभाजन हुआ तो जॉर्ज ही नीतीश की लड़ाई लड़ रहे थे। 14 सांसदों के साथ जनता दल जॉर्ज बना। समता पार्टी तो कुछ समय बाद बनी। जॉर्ज चाणक्य थे तो नीतीश चंद्रगुप्त। 1996 में जॉर्ज ने ही नीतीश का भाजपा से मेल कराय़ा था। जॉर्ज की वजह से ही नीतीश, अटल बिहारी वाजपेयी के करीब आये। ज़ॉर्ज ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर नीतीश को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया। वाजपेयी सरकार के रहने तक नीतीश और जॉर्ज में गहरा रिश्ता बना रहा। नीतीश, जॉर्ज को गुरु मानते रहे। लेकिन मनमोहन सरकार के बनने के बाद हालात बदलने लगे।
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जॉर्ज- नीतीश के रिश्ते कैसे हुए तल्ख ?
2004 में मनमोहन सिंह की सरकार आ चुकी थी। नीतीश कुमार मंत्री पद से हट चुके थे। अब उनका ध्यान बिहार की राजनीति की तरफ था। उस समय तक नीतीश कुमार की लालकृष्ण आडवाणी से भी नजदीकी बढ़ गयी थी। 2005 में बिहार में विधानसभा का चुनाव होना था। चुनाव के पहले ही आडवाणी ने घोषणा कर दी कि बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ही एनडीए के सीएम प्रत्याशी होंगे। आडवाणी की इस घोषणा का जनता दल यू के एक प्रमुख नेता और बांका के सांसद दिग्विजय सिंह ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि जदयू के बड़े नेता जॉर्ज फर्नांडीस हैं। आडवाणी जी को जॉर्ज साहब से रायविचार कर के ये घोषणा करनी चाहिए थी। जॉर्ज ने भी ने कह दिया कि सीएम का चुनाव तो चुने हुए विधायक करेंगे। ऐसा करना ही ठीक होगा। नीतीश कुमार को ये बात नागवार लगी। फिर उन्होंने फैसला कर लिया कि जदयू का अध्यक्ष चाहे कोई हो, असल ताकत उनकी मुट्ठी में रहेगी। तभी से नीतीश कुमार की दिग्विजय सिंह और जॉर्ज फर्नांडीस से खुन्नस शुरू हो गयी।

2009 में जॉर्ज से बदसलूकी
2004 में नीतीश कुमार बाढ़ में हार के डर से नालंदा से भी चुनाव लड़ रहे थे। अब तक ये सीट जॉर्ज फर्नांडीस की थी। नीतीश ने बड़ी सफाई से जॉर्ज को मुजफ्फरपुर भेज दिया। उनको कहा गया कि आपका पुराना घर मुजफ्फरपुर है। वही सीट आपके लिए ठीक रहेगी। मन मार के वे मुजफ्फरपुर गये। 2004 का चुनाव वे जीत गये। 2005 में मुख्यमंत्री बनने से पहले ही नीतीश की दिग्विजय सिंह और जॉर्ज से अनबन शुरू हो गयी थी। नवम्बर 2005 में सीएम बनते ही नीतीश का जदयू पर प्रभुत्व स्थापित हो गया। अध्यक्ष शरद यादव की स्थिति रबर स्टांप की तरह थी। नीतीश के खिलाफ कोई बोल नहीं सकता था। 2009 का लोकसभा चुनाव आया तो नीतीश ने अपनी मंशा उजागर कर दी। नीतीश के कहने पर पार्टी अध्यक्ष शरद यादव ने जॉर्ज को एक चिट्ठी लिखी और बढ़ती उम्र का हवाला दे कर चुनाव नहीं लड़ने की सलाह दी। उन्हें राज्यसभा में भेजने का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन जॉर्ज ने इससे इंकार कर दिया। नीतीश ने बांका से दिग्विजय सिंह का टिकट काट दिया।

अंतिम चुनाव में बुरी तरह हारे जॉर्ज
जॉर्ज फर्नांडीस के चाहने वालों ने नीतीश से बहुत गुजारिश की । लेकिन नीतीश अड़े रहे कि जॉर्ज को किसी भी कीमत पर टिकट नहीं देंगे। नीतीश ने मुजफ्फरपुर से जयनारायण निषाद को जदयू उम्मीदवार बनाया था। जदयू के एक विधायक मनोज कुशवाहा जॉर्ज के साथ साये की तरह खड़े रहे। नीतीश के विरोध के बाद भी जॉर्ज फर्नांडीस ने 2009 में मुजफ्फरपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ा। एनडीए का पूरा कुनबा जयनारायण निषाद के पक्ष में था। इस चुनाव में दिग्गज जॉर्ज को केवल 22 हजार वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे। जीत जदयू के जयनारायण निषाद की हुई। उधर बांका में दिग्विजय सिंह भी निर्दलीय मैदान में कूदे। उन्होंने जीत हासिल कर नीतीश को करारा जवाब दिया था। 1977 में मुजफ्फरपुर ने ही जॉर्ज फर्नांडीस को बुलंदियों पर पहुंचाया था। उन्होंने अपना आखिरी चुनाव भी यहीं से लड़ा। लेकिन अंत बहुत दुखदायी रहा।
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