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मैनपुरी: जहां आजतक नहीं खुल पाया भाजपा का खाता, यहां जात ही सबकुछ

By राजीव ओझा
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नई दिल्ली। मैनपुरी का मतलब मुलायम सिंह यादव, मैनपुरी का मतलब जातियों में बंटे मतदाता और मैनपुरी का मतलब है समाजवादी पार्टी का अजेय किला। लोकसभा चुनाव में मैनपुरी सीट इस बार भी चर्चा में है क्योंकि समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव यहाँ से चुनाव लड़ रहे हैं और 23 साल बाद वो मायावती के साथ मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। 2014 में भी मैनपुरी सीट सुर्ख़ियों में थी जब मोदी लहर के बावजूद समाजवादी पार्टी ने यहाँ जीत हासिल की थी। मैनपुरी सीट इसलिए भी चर्चित है कि अभी तक लोकसभा चुनाव में यहाँ से बीजेपी का खाता नहीं खुला है। 2019 में भी खाता खुलने की उम्मीद नहीं है। मैनपुरी में विकास, पर्यावरण या अन्य स्थानीय मुद्दों पर वोट नहीं डाले जाते। पूरे देश में सर्वाधिक सारस मैनपुरी में पाए जाते हैं। यहाँ सारस पक्षी की वर्षों से मौजूदगी ने जिले को एक अलग पहचान दी है। लेकिन इनका संरक्षण किसी नेता की प्राथमिकता सूची में शायद ही रहा हो। यहाँ राजनीति का पहिया जाति की धुरी पर ही घूमता नजर आता है।

इस बार भी मुलायम के मुकाबले में कोई कद्दावर नेता नहीं

इस बार भी मुलायम के मुकाबले में कोई कद्दावर नेता नहीं

पिछले आठ लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने लगातार मैनपुरी सीट फतह की है और इस बार भी सपा के मुकाबले में कोई नहीं है। कांग्रेस ने इस सीट पर कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा किया है और बीजेपी प्रत्याशी प्रेम सिंह शाक्य, मुलायम के मुकाबले कहीं नहीं टिकते। वही प्रेम सिंह शाक्य जो 2014 के उपचुनाव में मोदी लहर के बावजूद करीब सवा तीन लाख मतों के अंतर से सपा के तेज प्रताप सिंह यादव से हार गये थे। मुलायम सिंह ने मैनपुरी और आज़मगढ़, दोनों सीट से चुनाव लड़ा था और दोनों पर जीत हासिल की थी। बाद में मुलायम ने मैनपुरी सीट छोड़ दी जबकि आजमगढ़ के मुकाबले मैनपुरी सीट उन्होंने ज्यादा बड़े अंतर से जीती थी। बाद में हुए उपचुनाव में उनके परिवार के तेजप्रताप सिंह यादव ने भी बड़े अंतर से मैनपुरी सीट पर जीत हासिल की थी। तेजप्रताप सिंह यादव को यहां करीब 65 फीसदी वोट मिले थे, जबकि बीजेपी के उम्मीदवार को सिर्फ 33 फीसदी वोट मिले थे। 2014 उपचुनाव में यहां करीब 62 फीसदी मतदान हुआ था।

इसके पहले भी 2004 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने मैनपुरी सीट जीतने के बाद छोड़ दी थी और उपचुनाव में धर्मेंद्र यादव यहां से जीते। हालांकि, 2009 के चुनाव में मुलायम ने पुनः मैनपुरी से चुनाव लड़ा और जीता। इसकी वजह सपा का आत्मविशवास और मैनपुरी के मतदाताओं की निष्ठा पर भरोसा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी से इसबार 12 उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन मुख्य मुकाबला मुलायम सिंह यादव और बीजेपी के प्रेम सिंह शाक्य के बीच है। छोटी-मोटी 8 क्षेत्रीय पार्टियों के नेता और 2 निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में हैं लेकिन इन्हें औपचारिकता ही माना जा रहा है।

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निर्णायक भूमिका में 35 फीसदी यादव मतदाता

निर्णायक भूमिका में 35 फीसदी यादव मतदाता

सपा के आत्मविश्वास की वजह यहाँ के 35 फीसदी यादव समुदाय के मतदाता हैं। 2014 के आंकड़े अनुसार मैनपुरी लोकसभा सीट में लगभग 17.3 लाख वोटर हैं। आंकड़े के मुताबिक कुल वोटरों में से 35 फीसदी वोटर यादव हैं। वहीं दूसरे नंबर पर यहां राजपूत, चौहान, राठौर, भदौरिया को मिलकर इनकी संख्या 29 फीसदी है। उसके बाद यहां शाक्य, ब्राह्मण, एससी और मुस्लिम वोटर हैं।

जातीय समीकरण को देखें तो इस सीट पर यादव वोटरों का वर्चस्व रहा है। जबकि करीब 2.5 लाख वोटर शाक्य समुदाय से हैं। यही कारण रहा है कि इस सीट पर लगभग दो दशक से जातियों की भूमिका निर्णायक होती है। यहाँ से समाजवादी पार्टी लगातार आठ बार से चुनाव जीतती आ रही है। मैनपुरी लोकसभा सीट के अंतर्गत कुल पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें मैनपुरी, भोगांव, किसनी, करहल और जसवंतनगर है। 2017 के विधानसभा चुनाव में इनमें से सिर्फ भोगांव ही भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई थी, जबकि बाकी सभी 4 सीटें सपा के खाते में गई थी। इसबार उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल का गठबंधन है। ऐसे में मुलायम को मैनपुरी से और बड़ी जीत की उम्मीद है।

18 चुनावों में 13 बार यादव उम्मीदवार जीते

18 चुनावों में 13 बार यादव उम्मीदवार जीते

मैनपुरी संसदीय सीट का रोचक इतिहास रहा है। मैनपुरी संसदीय सीट पर समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव 1996 में पहली बार सांसद चुने गए थे। आजादी के बाद से अब तक इस सीट पर 18 बार संसदीय चुनाव हुए हैं, जिनमें 13 उम्मीदवार ऐसे चुने गए जो यादव जाति से ताल्लुक रखते हैं। इतना ही नहीं एक और रोचक तथ्य यह भी है कि इस संसदीय सीट पर अबतक 10 बार इटावा जिले के रहने वाले प्रतिनिधि चुने गए।

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 मैनपुरी लोकसभा सीट का इतिहास

मैनपुरी लोकसभा सीट का इतिहास

1952: बादशाह गुप्ता (आईएनसी)

1957: बंशी दास डांगर (प्रजा सोशलिस्ट पार्टी)

1962: बादशाह गुप्ता (आईएनसी)

1967: महाराज सिंह यादव (आईएनसी)

1971: महाराज सिंह यादव (आईएनसी)

1977: रघुनाथ सिंह वर्मा (भारती लोक दल)

1980: रघुनाथ सिंह वर्मा (जनता पार्टी सेक्युलर)

1984: चौधरी बलराम सिंह यादव (आईएनसी)

1989: उदय प्रताप सिंह यादव (जनता दल)

1991: उदय प्रताप सिंह यादव (जनता पार्टी)

1996: मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

1998: चौधरी बलराम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

1999: चौधरी बलराम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

2004: मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

2004: धर्मेंद्र सिंह यादव (उपचुनाव) (समाजवादी पार्टी)

2009: मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

2014: मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)

2014: तेज प्रताप सिंह यादव (उपचुनाव) (समाजवादी पार्टी)

मैनपुरी लोकसभा सीट के लिए तीसरे चरण में चुनाव 23 अप्रैल को होगा । मैनपुरी सीट पर गठबंधन में सपा के खाते से मुलायम मैदान में हैं। सीधे मुकाबले में प्रत्याशियों से ज्यादा पार्टियों के दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर है। सपा नेताओं ने मुलायम सिंह यादव से खुद प्रचार के लिए भागदौड़ न करने का अनुरोध किया है। दूसरी तरफ भाजपा ने उपचुनाव के प्रत्याशी पर ही दोबारा दांव खेला है। भाजपा के भोगांव से एक विधायक और अन्य कुछ दिग्गज नेताओं की क्षेत्र के साथ अपनी जातियों पर भी पकड़ मानी जाती है। बीजेपी को इनसे ही उम्मीद ज्यादा है।

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English summary
lok sabha elections 201 mulayam singh yadav voters mainpuri seat
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