‘मैजिक फिगर’ ही बचा पाएगा मोदी का नेतृत्व, जानिए 2019 के आम चुनाव से जुड़ी पांच अहम बातें

नई दिल्ली। चुनाव नतीजे औपचारिक रूप से 23 मई के बाद आएंगे। उन नतीजों में स्पष्टता दिखेगी। सबसे बड़ा दल, सबसे बड़ा गठबंधन, किसकी जय, किसकी पराजय, किसके लिए जनादेश, किसके विरुद्ध जनादेश तमाम बातें साफ-साफ नज़र आएंगी। फिर भी उस जनादेश को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश होगी ताकि हार की झेंप को मिटाया जा सके। कार्यकर्ताओं के मनोबल को कथित रूप से मजबूत बनाए रखा जा सके। मगर, चुनाव नतीजों से पहले भी कुछ बातें स्पष्ट हो चुकी हैं जो अंतिम नतीजों का आधार बनने वाली हैं।

बीजेपी से मुख्य मुकाबले में कांग्रेस

बीजेपी से मुख्य मुकाबले में कांग्रेस

बीजेपी ने जिस पार्टी को मुख्य तौर पर अपना शत्रु माना, वह स्पष्ट रूप से कांग्रेस रही। 42 दलों वाली कांग्रेस ने 282 दल वाली बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के भाषणों में निशाने पर राहुल गांधी ही रहे। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की उपेक्षा के बावजूद कांग्रेस की अनदेखी नहीं की जा सकी। बिहार, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में कांग्रेस ने गठबंधन में रहकर एनडीए से मोर्चा लिया। वहीं, ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस ने बीजेपी को सीधी टक्कर दी।

नहीं दिखा तीसरा मोर्चा

नहीं दिखा तीसरा मोर्चा

तीसरा मोर्चा मतलब गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस गठबंधन। तीसरा मोर्चा न चुनाव से पहले सार्थक लगा और न चुनाव के बाद इस सोच की दाल गलने वाली है। वजह ये है कि कांग्रेस को छोड़कर कोई गैर बीजेपी सरकार मुमिकन ही नहीं है। इसलिए तीसरा मोर्चा भी मुमकिन नहीं है। तीसरा मोर्चा तब वास्तविकता बनती है जब बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए देश में विरोध का एक खेमा हो। मगर, ऐसा नहीं है। सच ये है कि बीजेपी विरोध की अगुआई कांग्रेस ही कर रही है। बाकी दल उनका साथ देने को विवश रहे हैं। इसलिए तीसरे मोर्चे की सोच 2019 में न परवान चढ़ी और चुनाव बाद चढ़ सकेगी।

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बीजेपी ने माना कि घटेगी उसकी ताकत

बीजेपी ने माना कि घटेगी उसकी ताकत

चाहे राम माधव का 271 सीटें मिलने पर बीजेपी के खुश होने वाला बयान हो या फिर सुब्रहमण्यम स्वामी का कि बालाकोट नहीं होता तो बीजेपी को 160 और अब 230 सीटें मिलने वाली हैं, ये साफ है कि बीजेपी और एनडीए की ताकत घटने जा रही है। कितनी घटेगी इसे लेकर परस्पर विरोधी दावों का होना स्वाभाविक है। मगर, यह बात तय है कि एनडीए को महागठबंधन से यूपी और बिहार में और यूपीए से महाराष्ट्र में करारा झटका मिलने जा रहा है। कांग्रेस भी कई राज्यों में बीजेपी को नाकों चने चबवाने जा रही है।

कमजोर हुआ एनडीए तो बिखराव भी तय

कमजोर हुआ एनडीए तो बिखराव भी तय

जब सीटें घटेंगी और सरकार बनाने को लेकर नरेंद्र मोदी से इतर किसी नेता की बात आएगी, तो एनडीए के घटक दल निश्चित रूप से मौका मांगेंगे। यह मौका बीते पांच साल में सिर झुकाकर समर्थन करते रहने के बदले होगा। नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे जैसे नेता गोलबंदी करने को तैयार बैठे हैं। वैसे भी, एनडीए में लोकसभा सीटों के ख्याल से सहयोगी दल कम रह गये हैं। इस बात के आसार भी कम हैं कि एनडीए के घटक दलों की सीटें पहले से ज्यादा होने वाली है। यही वजह है कि विपत्ति आने पर एनडीए में बिखराव होना तय लगता है।

मैजिक फिगर ही नेतृत्व की रक्षा कर पाएगा

मैजिक फिगर ही नेतृत्व की रक्षा कर पाएगा

एनडीए में नेतृत्व परिवर्तन की मांग तभी उठेगी जब घटक दल मजबूत होंगे। अगर घटक दल मजबूत नहीं हुए तो कमजोर होने के बावजूद बीजेपी ही नयी सरकार का गठन करने निकलेगी और नेतृत्व नरेंद्र मोदी ही करेंगे। सीटों की संख्या कम रहने पर एनडीए से अलग क्षेत्रीय दलों का समर्थन जरूर चाहिए होगा। मगर, उस स्थिति में भी बीजेपी नेतृत्व परिवर्तन के लिए तभी तैयार होगी जब ऐसा नहीं करने पर कांग्रेस को इसका फायदा मिलता नज़र आएगा। इसलिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती परिस्थिति पर निर्भर करने वाली है। ‘मैजिक फिगर'से ही नेतृत्व की रक्षा हो पाएगी।

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