बिहार में महागठबंधन का खेल बिगाड़ेगी बसपा और माले?
नई दिल्ली। बिहार में बसपा और भाकपा माले महागठबंधन का खेल बिगाड़ सकती हैं। बसपा ने बिहार में सभी 40 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। दूसरी तरफ भाकपा माले भी छह सीटों पर चुनावी ताल ठोकेगी। उत्तर प्रदेश में गठजोड़ करने वाली सपा-बसपा बिहार में अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। बिहार में सपा जहां महागठबंधन के साथ है वहीं बसपा अपने दम पर किस्मत आजमा रही है। उत्तर प्रदेश से सटे बिहार के विधानसभा क्षेत्रों में बसपा का दलित वोटरों में आधार है। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को दो फीसदी से अधिक वोट मिले थे। भाकपा माले का मजदूर, दलित और पिछड़े समुदाय में अच्छा प्रभाव है। अगर दोनों दलों ने चार फीसदी वोट भी काटा तो महागठबंधन को भारी नुकसान हो सकता है।

40 सीटों पर लड़ेगी बसपा
बहुजन समाज पार्टी के बिहार प्रभारी लालजी मेधकर के मुताबिक पार्टी बिहार में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 2014 और 2009 के लोकसभा चुनाव में भी बसपा ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने कुल 7लाख 65 हजार वोट हासिल किये थे। 2015 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने कुल मतों का 2.07 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त किया था। बसपा प्रमुख मायावती बिहार में भी अपना जानाधार बढ़ाना चाहती हैं। विधानसभा चुनाव में तो बसपा को कामयाबी मिलती रही है लेकिन उसने अभी तक लोकसभा चुनाव में कोई खास प्रदर्शन नहीं किया है। लगातार हार के बाद भी मायावती बिहार में अपनी जमीन बनाने की कोशिश छोड़ नहीं रहीं। गोपालगंज, कैमूर, रोहतास, बक्सर और पूर्वी चम्पारण में बसपा का असर है। पिछले लोकसभा चुनाव में गोपालगंज से जीतने वाले भाजपा प्रत्याशी जनक राम पहले बसपा में ही थे। इन जिलों में बसपा जो भी वोट हासिल करेगी उससे राजद, कांग्रेस और सहयोगी दलों का ही वोट कटेगा। महागठबंधन भी दलित दलित वोटरों को अपने पाले में मान रहा है।

तेजस्वी मिले थे मायावती से
15 जनवरी 2019 को जब मायावती का जन्मदिन मनाया जा रहा था तब राजद नेता तेजस्वी यादव उनको बधाई देने के लिए गये थे। इस मौके पर तेजस्वी यादव ने मायावती से राजनीतिक मुद्दों पर भी बात की थी। खबरों के मुताबिक उस समय तेजस्वी ने मायावती को बिहार में दो लोकसभा सीटों का प्रस्ताव दिया था। लेकिन पीएम बनने का सपना देखने वाली मायावती ने बिहार में गठबंधन से इंकार कर दिया। हाल ही में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बसपा की राजनीतिक हैसियत बढ़ी है। उसके समर्थन से मध्य प्रदेश और राजस्थान में सरकारें चल रही हैं। इस लिए अब राजनीति में उनको कम हिस्सेदारी मंजूर नहीं। अगर बिहार में महागठबंधन के उम्मीदवारों की कुछ सीटों पर कम मतों से हार हुई तो उन्हें मायावती की अहमियत का अंदाजा हो जाएगा। मायावती जानती हैं कि बिहार में वे किसी सीट पर जीतने वाली नहीं हैं। लेकिन कुछ सीटों पर उन्होंने राजद-कांग्रेस को हरा दिया तो उनका मकसद पूरा हो जाएगा। इस लिए बसपा बिहार में सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

छह सीटों पर लड़ेगी भाकपा माले
बिहार में भाकपा माले का अन्य साम्यवादी दलों से अधिक जनाधार है। मौजूदा विधानसभा में इस दल के तीन विधायक हैं। आरा और सीवान को वह अपना गढ़ मानती है। माले ने तो गठबंधन के सीटों के एलान से बहुत पहले ही आरा में अपने प्रत्याशी का पर्चा भी दाखिल करा दिया है। 1989 में माले यह लोकसभा सीट जीत भी चुकी है। इसके अलवा माले प्रत्याशी अमरनाथ यादव के सीवान से चुनाव लड़ने का एलान हो चुका है। इसके अलावा जहानाबाद, काराकाट,पाटलिपुत्र और कटिहार से भी माले चुनाव लड़ेगी। सीवान राजद के लिए प्रतिष्ठा की सीट है। सजायाफ्ता राजद नेता शहाबुद्दीन का यह गढ़ रहा है। उनकी पत्नी हिना शहाब से यहां से चुनाव लड़ती रही हैं। माले के चुनाव लड़ने से उनका भारी नुकसान होगा। जहानाबाद सीट पर भी राजद की चुनौती मजबूत है। लेकिन यहां माले के चुनवा लड़ने से राजद की स्थिति कमजोर हो जाएगी। मध्य बिहार और भोजपुर माले का गढ़ है। इसका अलावा रोहतास के काराकाट सीट रालोसपा के पास है। यह भी माले के प्रभाव वाला इलाका है। ऐसी स्थिति में माले ने तीस-चालीस हजार वोट भी काट लिया तो उपेन्द्र कुशवाहा का बेड़ा गर्क हो सकता है।
गैरएनडीए मतों के धुव्रीकरण में मुश्किलमहागठबंधन में दलों की भरमार है। इस लिए बसपा और लेफ्ट की इंट्री नही सकी। चुनाव के पहले मोदी विरोधी मतों के ध्रुवीकरण के लिए लेफ्ट को भी साथ रखने की बात कही जा रही थी। लेफ्ट की पटना रैली में राजद के नेता गये भी थे। लेकिन जब सीट बंटवारे का समय आया तो लेप्ट को दरकिनार कर दिया गया। यहां तक कि चर्चित युवा नेता कन्हैया कुमार के बेगूसराय सीट को लेकर राजद कुछ साफ कहने से बचता रहा। अब जो स्थिति है उससे हिसाब से मोदी विरोधी मतों का बंटवारा होना तय है। बसपा, माले, माकपा की बिहार में भले ही कम ताकत हो लेकिन वह महागठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है।












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