उदारीकरण और मेड इन इंडिया चंद्रयान-3: देशी तकनीक से चांद पर पहुंचा भारत

चांद पर जाना किसी के लिए भी गर्व की बात हो सकती है। महज दूसरे प्रयास और इकॉनॉमिक बजट में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी कामयाबी की इबारत लिख चुका है। चंद्रयान-3 वहां पहुंच चुका है, जिससे दुनिया अनजान थी। तीसरी दुनिया का सपरों का देश कहा जाने वाले देश के लिए यह सफलता और भी बडी है। भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश बन चुका है। हम अपने वैज्ञानिकों पर गर्व कर रहे हैं। देश भर में उत्सव जैसा महौल है। दुनिया-भर से बधाई संदेश आ रहे हैं।

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विक्रम से अलग होकर रोवर प्रज्ञान चांद पर चहलकदमी कर रहा है। दूसरे ग्रह से तस्वीरों के आने का सिलसिला जारी है। वहां से जुटाई जानकारी ब्रह्मांड के कई अनसुलझे रहस्यों पर से पर्दा हटाएगी। याद रखिए, यह उसी देश का मून मिशन है, जो अभी कुछ दशक पहले रॉकेट के कल-पूर्जे को असेंबलिंग के लिए साइकिल और बैलगाड़ी पर ले जाता था। पिछले 4 दशकों में देश की अर्थव्यवस्था और तकनीकी कौशल ने समग्र विकास को गति दी है। नब्बे के दशक में आए उदारीकरण की आलोचना इस बात के लिए होती रहती है कि इसने विदेशी पूंजी निवेश का द्वार खोल दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उदारीकरण से एक नई कोलैबोरेटिव कार्य संस्कृति भी विकसित हुई है। यदि यह कहा जाए कि चंद्रयान-3 के निर्माण में उदारीकरण का योगदान भी है तो चौंकिएगा नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि चंद्रयान-3 पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से बनी है। लेकिन आइए जानते हैं कि इसका उदारीकरण से क्या संबंध है।

चंद्रयान-2 की सॉफ्ट लैंडिग असफल होने के बाद चांद के दक्षीणी ध्रुव पर पहुंचना एक चुनौति बन गई थी। अमेरिका, यूरोप, चीन और ब्रिटेन जैसे देश भी चांद के उस हिस्से में पहुंचने की कोशिश कर रहे थे। सौ करोड लोगों की आकांक्षाओं का दबाव इसरो पर भी था। चांद के करीब पहुंचकर ना उतर पाने की कसक के साथ उन्हें अपनी तकनीक पर भरोसा तो था ही। उन्हें पता था कि किन कारणों से चंद्रयान-2 आशानुरूप नहीं रहा था। वर्तमान इसरो प्रमुख एस सोमनाथ ने चंद्रयान-3 की सफलता का श्रेय चंद्रयान-2 को दिया भी है। इसरो के पास तकनीक, बजट और आत्मविश्वास तो था ही, लेकिन आवश्यकता थी रिकॉर्ड समय में चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने की। उदारीकरण की बड़ी देन आउटसोर्सिंग भी है। इसरो ने शीघ्र लक्ष्य प्राप्ति के लिए चंद्रयान-3 मिशन के कई सारे कार्यों को आउटसोर्स कर दिया।

यह आउटसोर्सिंग चंद्रयान-2 के समय भी किया गया था। आउटसोर्स का यह अर्थ कतई नहीं है कि चंद्रयान का कोई भी कॉम्पोनेंट देश के बाहर विकसित हुआ है। लगभग सारी कंपनियां देशी हैं और देश के अंदर ही कारोबार करती हैं। आइए देखते हैं चंद्रयान-3 के लिए किसने क्या बनाया।

चंद्रयान के प्रक्षेपण का रैंप और कई अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर निजी क्षेत्र की कंपनी लार्सन एन टुब्रो ने डिवेलप किया था। चंद्रयान-3 के बूस्टर सेगमेंट एल एंड टी के द्वारा विकसित और टेस्ट किए गए थे। चंद्रयान का रॉकेट इंजन और थ्रस्टर (सामान्य भाषा में एक्सिलेटर) गोदरेज एयरोस्पेस के द्वारा बनाया गया था। एमटार (MTAR) टेक्नोलॉजी लंबे समय से इसरो के लिए रॉकेट इंजन और कोर पंप डिवेलप करता रहा है। हैदराबाद की कंपनी अनंत टेक्नॉलॉजी ने चंद्रयान के प्रक्षेपन यान में कंप्यूटर, नेवीगेशन सिस्टम, टेलीमेट्री, पावर सिस्टम, कंट्रोल इलेक्ट्रोनिक्स इत्यादि इंस्टॉल करने की जिम्मेदारी निभाई थी।

हिमसन इंडस्ट्रियल सेरामिक ने चंद्रयान-3 के लिए दहनरोधी कवर कंपोनेंट बनाया था। टाटा एलेक्सी ने इस मिशन के लिए एविओनिक्स और सॉफ्टवेयर डेवलप किया था। वालचंद्रनगर इंडस्ट्रीज को कौन भूल सकता है। यह 1993 में पीएसएलवी के प्रक्षेपन के समय से लेकर अभी तक इसरो के तमाम 48 प्रक्षेपन अभियान में शामिल रहा है। इतना ही नहीं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल्स लिमिटेड (एचएएल) ने लैंडर और मैकेनिकल सपोर्ट डिजाइन तैयारर किया था। सार्वजनिक क्षेत्र की एक और महत्त्वपूर्ण कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बेल) ने पेलोड और हैवी बैट्री डेवलप किया था। वहीं सेंटम इलेक्ट्रॉनिक्स ने स्पेस एप्लिकेशन के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम डिजाइन और डेवलप किया था।

इस बीच खबर यह भी है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपिय एजेंसी एसा (ESA) ने भी इसरो को चंद्रयान-3 के लिए समर्थन दिया था, लेकिन यह समर्थन किन अर्थों में था इसका खुलासा नहीं हुआ है। एक तरफ जेट-स्पीड से सीधा चांद की कक्षा में बढ़ा रूसी मिशन लूना 24 क्रैश हो गया, वहीं उदारीकरण के बाद पूर्णतः देशी तकनीक और कोलैबोरेशन से बना हमारा चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर भारत के विजय का ध्वाजारोहण कर चुका है।

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