कोलकाता कांड: क्या दो साल से दस्तक दे रहे थे गुनहगार, फिर भी सोती रही बंगाल सरकार?
Kolkata Doctor Case Latest Update: कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 9 अगस्त को जिस जघन्य वारदात को अंजाम दिया गया, अगर बंगाल सरकार सचेत होती तो शायद उसे रोका जा सकता था। दरअसल, यह पहला मामला नहीं है, जब एक सिविक वॉलेंटियर ने इतने खौफनाक वारदात को अंजाम दिया है। लेकिन, शायद पश्चिम बंगाल सरकार सबकुछ मालूम होते हुए भी अनजान बनी रही।
2 साल में गंभीर अपराधों में कम से कम 8 सिविक वॉलेंटियर गिरफ्तार
बीते दो वर्षों में अकेले कोलकाता में कम से कम ऐसे 8 सिविक वॉलेंटिर्स की गिरफ्तारी हुई है, जिन्हें हत्या, बलात्कार, लूट, चोरी और उगाही जैसे गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में 32 वर्षीय महिला ट्रेनी डॉक्टर से रेप और हत्या के आरोपी संजॉय रॉय का चरित्र भी आपराधिक टाइप का बताया जा रहा है, फिर भी ऐसे लोगों को सरकार ने आम जनता की जिंदगी से खिलवाड़ करने के लिए खुल्ला क्यों छोड़ दिया?

आरजी कर की घटना के बाद एक और सिविक वॉलेंटियर ने दिखाया अपना रूप
सबसे ताजा वारदात शनिवार की है, जिसमें सिनथी थाने से जुड़े एक ऐसे ही सिविक वॉलेंटियर ने कथित रूप से शराब के नशे में तब एक बैरिकेड को तोड़ दी, जब छात्र आरजी कर की पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग को लेकर बीटी रोड पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। महिला डॉक्टर के गुनहगार संजॉय रॉय पर भी आरोप है कि उसने वारदात वाली रात पहले सड़क पर एक महिला के साथ छेड़खानी भी की थी।
पुलिस के विशेषज्ञों की चिंताओं को कभी राज्य सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया
पश्चिम बंगाल की सत्ता में आने के एक साल बाद 2012 में टीएमसी सरकार ने 'सिविक पुलिस' और 'ग्रामीण पुलिस' की व्यवस्था शुरू की। मकसद ये था कि ये वॉलेंटियर पुलिस की मदद करेंगे। लेकिन, जिस तरह से इन भर्तियों के लिए सिर्फ 8वीं पास की शिक्षा और मात्र तीन हफ्तों की बेसिक ट्रेनिंग का इंतजाम किया गया, रिटायर्ड पुलिस अफसरों ने तभी से इसपर सख्त आपत्ति जतानी शुरू कर दी थी।
1.2 लाख सिविक वॉलेंटियर के हवाले बंगाल की जनता?
लेकिन, शायद ममता बनर्जी सरकार को पुलिस के रिटायर्ड अफसरों की चिंताओं में कोई दम नहीं नजर आया। आज की तारीख में 1.2 लाख सिविक वॉलेंटियर पुलिसकर्मियों का काम कर रहे हैं। सड़कों पर ट्रैफिक नियंत्रण से लेकर वह कानून-व्यवस्था वाली ड्यूटी भी संभालते रहे हैं और रात के वक्त बाइक पर पेट्रोलिंग भी करते हैं। यहां तक कि नाका से लेकर पुलिस थानों तक में भी इनकी ड्यूटी लगती है।
शायद ही कोई सिविक वॉलेंटियर हो, जिसने अपनी बाइक पर 'पुलिस' न लिखवा रखा हो। लेकिन, इन वॉलेंटियरों को अक्सर वर्दीधारियों की जगह ट्रक वालों से वसूली करते देखा जा सकता है। दरअसल, पुलिस भर्ती की व्यवस्था चरमरा जाने की वजह से यह एक अस्थायी व्यवस्था बनाई गई है, जिसका खामियाजा अब आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। ट्रेनी डॉक्टर के गुनहगार को सरकार हर दिन पांच लीटर पेट्रोल देती थी।
सिविक वॉलेंटियर बनने के लिए नेताओं का आशीर्वाद ही है काफी!
इन सिविक वॉलेंटियरों की भर्ती में नेताओं का आशीर्वाद ही काम आता है, मेरिट से किसी को इसमें घुसने का मौका मिल जाए, यह शायद ही मुमकिन है। एक पुलिस कॉन्सटेबल की भर्ती के लिए जहां पूरी प्रक्रिया से गुजरना होता है, कड़ी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है, वहीं सिविक वॉलेंटियर को तीन हफ्तों की ट्रेनिंग देकर एक तरह से जनता के पीछे छोड़ दिया गया है। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने कहा कि किसी गलती के लिए यह कानूनी तौर पर उस तरह से बाध्य भी नहीं हैं, जैसा कि एक कॉन्सटेबल के लिए जरूरी होता है।
2023 के मार्च में कलकत्ता हाई कोर्ट ने बंगाल पुलिस को निर्देश दिए थे कि इन्हें कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। इसके बाद राज्य सरकार ने इनके लिए एक गाइडलाइंस जारी की थी।
कई सिविक वॉलेंटियर आपराधिक गतिविधियों में शामिल- रिटायर्ड ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर
हाल ही में कोलकाता पुलिस के एक रिटायर्ड ज्वाइंट कमिश्नर ने आरोप लगाया था, 'चयन में पारदर्शिता और मानक प्रक्रियाओं का अभाव है। लिखित परीक्षा या इंटरव्यू की जगह, सत्ता में बैठी पार्टी उम्मीदवारों का चयन एक उपलब्ध लिस्ट के माध्यम से करती है, जिसकी वजह से भर्ती पर संदेह होता है। नतीजा ये है कि इनमें से कई सिविक वॉलेंटियर आपराधिक गतिविधियों में शामिल हैं, जिससे व्यवस्था की अखंडता को नुकसान पहुंच रहा है।'
उनका यह भी आरोप है कि 'नियम के मुताबिक भर्ती से पहले आवेदकों का एक औपचारिक बैकग्राउंड चेक करवाना जरूरी है। लेकिन, क्योंकि वे लोकल हैं और अक्सर ऐसी सिफारिशों से आते हैं इसलिए यह शायद ही कभी हो पाता है।'












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