जानिए, यूपी में कांग्रेस को अलग रखकर खुश क्यों हैं बुआ और बबुआ?

नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश की 8 लोकसभा सीटों पर दूसरे दौर में 18 अप्रैल को चुनाव होना है। 11 अप्रैल को पहले चरण के चुनाव को लेकर जो जानकारियां मिल रही हैं, उससे मायावती और अखिलेश को अपने एक फैसले पर भरोसा बढ़ा होगा। शायद अब उनको महसूस हो रहा है कि उन्होंने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखने का सही फैसला किया। क्योंकि, अगर साथ में कांग्रेस होती, तो उनके लिए बीजेपी के एजेंडा की काट निकालना ज्यादा मुश्किल होता। कांग्रेस गठबंधन में नहीं है तो बीजेपी, चुनाव को उन मुद्दों पर ले जाने में सफल नहीं हो पा रही है, जो महागठबंधन के लिए बेहद कमजोर कड़ी साबित हो सकती है। इसके उलट अगर कांग्रेस गठबंधन में होती, तो बीजेपी के एजेंडे की धार को कुंद करना उनके लिए बहुत मुश्किल होता।

कांग्रेस के अलग रहने से क्या हुआ?

कांग्रेस के अलग रहने से क्या हुआ?

यूपी में पहले चरण में 8 सीटों पर जिन मुद्दों पर चुनाव होने की बात एसपी-बीएसपी और आरएलडी महागठबंधन को समझ में आ रही है, वह उन्हें फायदेमंद लग रहा है। अब उन्हें पूरा यकीन है कि कांग्रेस को गठबंधन से दूर रखने का उनका फैसला बिल्कुल सही रहा। अलबत्ता इस मामले में अकेले बहन जी की ही चली थी, जो किसी भी सूरत में कांग्रेस को साथ लेकर चलने के लिए तैयार नहीं हुईं। क्योंकि, अखिलेश के लिए अपने दोस्त को इनकार करने का कोई कारण नहीं था और वे हाल तक कांग्रेस से गठबंधन की बात कहना छोड़ नहीं रहे थे। लेकिन, अब जब पहले दौर के बाद दूसरे चरण का चुनाव होने वाला है, गठबंधन के नेताओं को लग रहा है कि अगर कांग्रेस साथ होती, तो उन्हें चुनाव को स्थानीय मुद्दों की ओर ले जाने में दिक्कत होती। कांग्रेस के अलग रहने के कारण ही मोदी महागठबंधन को ही ज्यादा निशाना बना रहे हैं। मोदी के 'सराब' (SARAB) और 'महामिलावट' वाले तंज को भी गठबंधन के नेता अपनी रणनीतिक कामयाबी मानकर चल रहे हैं। इसका संकेत इस बात से मिलता है कि हाल ही में एक रैली में अखिलेश यादव ने कहा कि, "जिन्होंने नोटबंदी की, उनकी वोटबंदी कर दो।"

कांग्रेस रहती तो क्या होता?

कांग्रेस रहती तो क्या होता?

गठबंधन के नेताओं को लगता है कि कांग्रेस भी उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ रही होती, तो चुनावी परिस्थितियां बिल्कुल अलग होती। मोदी गांधी-नेहरू परिवार को निशाना बनाकर राष्ट्रीय मुद्दों, जैसे- भ्रष्टाचार, राष्ट्रवाद या पाकिस्तान-बालाकोट जैसे मुद्दों पर ज्यादा आक्रामक होते। पश्चिमी यूपी में ऐसे ही मुद्दे बीजेपी को फायदा पहुंचा सकते हैं, क्योंकि ध्रुवीकरण के लिए बीजेपी को यह सूट भी करता है। पिछले चुनावों में उसने इसी आधार पर बड़ी कामयाबी हासिल की थी। लेकिन, महागठबंधन के नेताओं को अब लगता है कि कांग्रेस के अलग होने से मोदी का वार हल्का पड़ गया है और उनकी रणनीति सफल साबित हुई है, क्योंकि बीजेपी शायद ध्रुवीकरण करने में उतनी कामयाब नहीं हो पाई है। क्योंकि, पश्चिमी यूपी में बीजेपी की जीत के लिए यह स्थिति बेहद जरूरी है। जबकि, महागठबंधन को अपना यादव+जाटव+मुस्लिम वोट बैंक एकजुट रहने का भरोसा है। लेकिन, कांग्रेस के साथ रहने से बीजेपी के लिए बाजी पलटना ज्यादा आसान हो सकता था।

तो कांग्रेस का रोल क्या है?

तो कांग्रेस का रोल क्या है?

ज्यादातर विश्लेषक इस बात पर एक मत होंगे कि यूपी में मुख्य मुकाबला बीजेपी और महागठबंधन के बीच है। लेकिन, ऐसा नहीं है कि कांग्रेस इस चुनाव में पूरी तरह गायब है। कम से कम 22 चुनाव क्षेत्रों में उसने चुनावी समीकरण को त्रिकोणीय बनाकर रखा है। पार्टी की रणनीति में एक बात स्पष्ट दिखती है। वो ऐसी सीटों पर जोर लगा रही है, जहां 2014 से पहले वह रेस में रही है या फिर उसने मजबूत उम्मीदवारों को टिकट दिया है। कुछ उम्मीदवार बीजेपी या महागठबंधन के ही बागी प्रत्याशी हैं। ऊपर से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी अपना पूरा जोर लगा चुकी हैं। इसलिए, कांग्रेस अगर बीजेपी या महागठबधन के मुकाबले सीटें जीतने की स्थिति में नहीं भी है, तो भी इस स्थिति में जरूर है कि कई सीटों पर इन दोनों का गुना-भाग बिगाड़ सकती है। इसलिए, बुआ और बबुआ को अपने समीकरण में फिलहाल कांग्रेस को अलग रखना भले ही अभी रास आ रहा हो,लेकिन जहां कांग्रेस के उम्मीदवार टक्कर में हैं, वहां किसके चेहरे की हवाइयां उड़ेंगी कहना मुश्किल है?

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