क्यों है केजरीवाल और एलजी के बीच विवाद, जानिये क्या कहता है संविधान
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी की सरकार और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच विवादों के चलते दिल्ली की जनता को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में हमें इस विवाद की वजह को समझना जरूरी है। इस विवाद की मुख्य वजह है दिल्ली का केंद्रशासित प्रदेश होना ऐसे में केंद्र और राज्य दोनों को अलग-अलग अधिकार हैं फैसले लेने के जिसके चलते दिल्ली में टकराव काफी बढ़ गया है।[घूस की पेशकश करने वाली केजरीवाल की बेटी खिलाफ मामला दर्ज]
कुल सात केंद्रशासित प्रदेश जिनमें दिल्ली और पॉडिचेरी को हैं विशेष अधिकार
दरअसल देश में कुल सात प्रदेश केंद्र शासित प्रदेश हैं लेकिन संविधान में संशोधन के बाद दिल्ली और पॉडिचेरी को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में अलग अधिकार प्राप्त हैं। अंडमान और निकोबार, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, लक्षद्वीप में केंद्र सरकार का फैसला ही सुप्रीम फैसला होता है।
लेकिन दिल्ली में चुनी गयी सरकार के पास कुछ फैसलों को छोड़कर सभी फैसले लेने का अधिकार है। दिल्ली सरकार के पास कुछ विषयों जैसे कानून-व्यवस्था और जमीन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार नहीं है। लिहाजा केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के बावजूद भी सरकार के सभी फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।
कौन से फैसले नहीं ले सकते अरविंद केजीरवाल
ऐसे में केजरीवाल की विवाद के पीछे दो अहम सवाल उठते हैं कि क्या केजरीवाल अपनी पसंद के मुख्य सचिव को कुछ दिनों के लिए नियुक्त करने का अधिकार रखते हैं या नहीं। यही नहीं क्या केजरीवाल अपनी सरकार के विभागों को यह निर्देश दे सकते हैं कि पुलिस, जमीन, कानून-व्यवस्था से जुड़ी फाइलों से दिल्ली के मंत्रियों को भी अवगत कराये और उनके इस फैसले से एलजी को कोई दिक्कत भी ना हो।
संविधान के अनुच्छेद 239A का स्पष्ट ना होना है विवाद की वजह
इन सवालों के जवाब जानने के लिए आपको संविधान के अनुच्छे द 239 ए को समझना जरूरी है। इस अनुच्छेद को 69वें संशोधन के बाद संविधान में 1992 शामिल किया गया था। इस अनुच्छेद के अनुसार कुछ विषयों पर एलजी और राज्य के मुख्यमंत्री के उपर साझा रूप से छोड़ गये हैं जिसके चलते स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से एलजी और मुख्यमंत्री के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ है।
रूल 45 जिसमें एलजी के अधिकार की व्याख्या की गयी है उसमें एलजी को यह अधिकार है कि वह जनता से जुड़ फैसले, जमीन, पुलिस और कानून-व्यवस्था से जुड़े फैसले मुख्यमंत्री के सुझाव के आधार पर ले सकते हैं। लेकिन विवाद होने की स्थिति में राज्यपाल को राष्ट्रपति को मामले की जानकारी देनी होगी और राष्ट्रपति का फैसला ही आखिरी फैसला माना जाएगा।
वहीं पिछली बार भी अनुच्छेद 239 ए की वजह से केजरीवाल का उनकी 49 दिन की सरकार के दौरान एलजी से आमना-सामना हुआ था। उस वक्त भी केजरीवाल ने बिना केंद्र सरकार की अनुमति लिए दिल्ली की विधानसभा लोकपाल बिल को पेश किया था जिसके चलते उन्होंने अपनी सरकार से इस्तीफा दे दिया था।
एलजी के पास है सरकार के फैसलों को रद्द करने का अधिकार
वहीं अगर केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति को कोई मामला भेजा है तो ऐसे में एलजी सरकार के फैसलों राष्ट्रपति का फैसला आने तक रद्द भी कर सकता है। वहीं अति आवश्यक मुद्दों पर एलजी अपने फैसले दे सकता है जिसे मंत्रियों को बिना किसी विवाद के मानना पड़ेगा।
क्लॉज 55(2) के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा एलजी को चीफ सेक्रेटरी, कमिश्नर ऑफ पुलिस और गृह और जमीन के सेक्रेटरी की नियुक्ति के बारे में पूर्व में अवगत कराना होगा।
संविधान के इस अनुच्छेद के तहत एलजी के पास वृहद अधिकार हैं लेकिन संविधान में यह भी प्रस्ताव है कि अगर विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है तो एलजी को मंत्रियों की परिषद से सुझाव लेना अनिवार्य होता है।
एलजी मांग सकते हैं दस्तावेजों की जानकारी
ऐसी स्थिति में एलजी उन सभी दस्तावेजों की मांग कर सकते हैं जिसमें विभिन्न विभागों सचिवों को को इसकी जानकारी एलजी को भी देना चाहिए। वहीं सचिवों की यह भी जिम्मेदारी है कि मुख्यमंत्री को भी लिए गये फैसलों की जानकारी दी जानी चाहिए।
वहीं एलजी को यह भी अधिकार है कि वह किसी भी मामले में जानकारी तलब कर सकते हैं जिसमें विवाद उत्पन्न कि स्थिति पैदा हुई हो। वहीं अपने फैसले लेते समय एलजी को किस समय केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय से मशविरा लेना चाहिए यह संविधान स्पष्ट नहीं है वह उनके विवेक पर छोड़ा गया है।
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