घूंघट, चूड़ी और पगड़ी को अनुमति तो हिजाब को क्यों नहीं? वकील की कर्नाटक हाई कोर्ट में दी दलील

बेंगलुरु, 16 फरवरी: कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब मामले में आज दोपहर 2.30 बजे से फिर सुनवाई शुरू हुई। कल इस मामले पर याचिकाकर्ता छात्राओं की ओर से पेश वकील देवदत्त कामत ने दलीलें पेश की थीं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और तुर्की के कानूनों का हवाला दिया था। वहीं आज छात्राओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रविवर्मा कुमार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम का हवाला दिया।

Karnataka Hijab Row High Court hears petitions challenging ban on hijab in educational institutions

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    उन्होंने कोर्ट में कहा, नियम कहता है कि जब शिक्षण संस्थान यूनिफॉर्म बदलना चाहता है तो उसे छात्रों के माता-पिता को एक साल पहले नोटिस जारी करना पड़ता है। अगर हिजाब पर बैन है तो उसे एक साल पहले सूचित करना चाहिए। 1995 के नियमों में किए गए ये प्रावधान सामान्य हैं। पीयू कॉलेज एक अलग नियम के तहत आते हैं। इस तथ्य पर ध्यान देना बहुत जरूरी है कि कॉलेज विकास परिषद एक प्राधिकरण नहीं है जो नियमों के तहत स्थापित या मान्यता प्राप्त है। सरकारी आदेश में घोषित किया गया है कि पीयू कॉलेजों के लिए कोई तय यूनिफॉर्म नहीं है। न तो एजुकेशन एक्ट के प्रावधान और न ही नियम कोई ड्रेस निर्धारित करते हैं। न तो कानून के तहत और न ही नियमों के तहत हिजाब पहनने पर प्रतिबंध है।

    रविवर्मा ने आगे कहा कि, एक विधायक (जो समिति का अध्यक्ष भी है) एक राजनीतिक दल या एक राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करेगा और क्या आप छात्रों के हित को किसी राजनीतिक दल या राजनीतिक विचारधारा के हवाले कर सकते हैं? रविवर्मा कुमार आगे कहा कि इस तरह की समिति का गठन हमारे लोकतंत्र को मौत का झटका देना है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, कालेज विकास समिति के पास छात्रों के खिलाफ पुलिस जैसे अधिकार नहीं हो सकते हैं। वे आगे कहते हैं कि, इस तरह की समिति का गठन हमारे लोकतंत्र को घातक आघात देता है। इस पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने वकील से पूछा, आप कहते हैं कि कालेज डेवलपमेंट कमेटी को यूनिफार्म निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है।

    रविवर्मा ने कोर्ट में कहा कि हिजाब पर कोई पाबंदी नहीं है और सवाल यह उठता है कि किस अधिकार या नियम के तहत छात्राओं को कक्षा से बाहर रखा गया। कुमार ने आगे कहा कि सरकार अकेले हिजाब क्यों चुन रही है। चूड़ी पहने हिंदू लड़कियों और क्रॉस पहनने वाली ईसाई लड़कियों को बाहर क्यों नहीं भेजा जाता है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रोफेसर रविवर्मा कुमार ने कहा कि क्या आप छात्रों के कल्याण को किसी राजनीतिक दल या राजनीतिक विचारधारा को सौंप सकते हैं?

    इससे पहले कल वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अदालत के सामने दक्षिण अफ्रीका की एक अदालत के फैसले का उल्लेख किया। इसमें मुद्दा यह था कि क्या दक्षिण भारत से संबंध रखने वाली एक हिंदू लड़की क्या स्कूल में नाक का आभूषण (नोज रिंग) पहन सकती है। कामत ने कहा कि दक्षिण अफ्रीका की अदालत ने पैसले में कहा था कि अगर ऐसे छात्र-छात्राएं और हैं जो अपने धर्म या संस्कृति को व्यक्त करने से डर रहे हैं तो उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। यह जश्न मनाने की चीज है न कि डरने की। कामत ने कहा कि दक्षिण अफ्रीकी अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि धर्म और संस्कृति का सार्वजनिक प्रदर्शन विविधता का एक उत्सव है जो हमारे स्कूलों को समृद्ध करता है।

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