Karnataka election: क्यों बेहद अहम है कोलार सीट? जहां से राहुल गांधी करने वाले हैं चुनाव प्रचार में एंट्री
कर्नाटक चुनाव में क्यों कोलार सीट अचानक से अहम हो गई है। राहुल गांधी जहां से करने जा रहे है रैली वहां के बारे में जानें अब तक क्या रहे चुनाव परिणाम

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान अगर कोइ सीट लगातार सुर्खियों में बनी हुई है वो कोलार सीट है। इसके पीछे वजह है की लोकसभा से संसद के रूप में अयोग्य होने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस सीट से कर्नाटक चुनाव में एंट्री करने जा रहे हैं।

ये वो ही जगह हैं जहां पर 2019 के लोकसभा चुनाव के समय राहुल गांधी ने 'क्याा हर मोदी सरनेम वाले चोर होते हैं' बयान दिया था और उनके खिलाफ सूरत में एक शख्स ने मानहानि का केस कर दिया था। मार्च 2023 में सूरत की एक कोर्ट ने इसके लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई थी।

जिसके बाद उन्हें 30 दिन की जमानत तो मिल गई लेकिन दो साल की सजा सुनाए जाने के कारण उनकी संसद के तौर पर सदस्सता को अयोगय हो गई वहीं दूसरी वजह है कि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया वरुणा के अलावा कोलार सीट से चुनाव लड़ने की उम्मीद किए बैठे हैं।
सिद्धारमैया लड़ना चाहते हैं इस सीट से चुनाव
सिद्धारमैया कर्नाटक में कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं, वो 2013 और 2018 के बीच मुख्यमंत्री रहे और दो बार 1996 और 2004 उपमुख्यमंत्री बने। सिद्धारमैया का राजनीतिक सफर चामुंडेश्वरी से शुरू हुआ। उन्होंने 1983 और 2006 के बीच चामुंडेश्वरी से सात विधानसभा चुनाव और उपचुनाव लड़े लेकिन उन्होंने कभी कोलार सीट से चुनाव नहीं लड़ा लेकिन वो अपने राजनतिक करियर का ये आखिरी चुनाव कोलार से भी लड़ना चाहते हैं। हालांकि सूत्रों के अनुसार कांग्रेस आलाकमान इस चुनाव में उन्हें दो सीटो से चुनाव लड़ाने के पक्ष में नही हैं इसलिए सिद्धारमैया की दो सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा अधूरी रह जाएगी।
जानें क्या कोलार कांग्रेस का गढ़ रहा है?
कोलार एक शहरी सीट है, जिसमें 40 प्रतिशत से अधिक शहरी आबादी है। कर्नाटक के गठन के बाद से अब तक कोलार सीट पर 14 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और इनमें कांग्रेस को केवल पांच बार ही जीत हासिल हुई है।
1983 के बाद केवल दो बार जीत हासिल की है
पिछले चार दशक में कोलार सीट कुल मिलाकर गैर कांग्रेसी सीट रही है। 1983 के बाद से कांग्रेस ने इस सीट पर केवल दो बार जीत हासिल की है जिसमें एक बार 1989 और दूसरी बार 2004 में जीत हासिल की।
2018 में जेडीएस को मिली थी जीत
बात अगर 2018 के विधानसभा चुनावों की करें तो जनता दल (सेक्युलर) के के श्रीनिवास गौड़ा ने कांग्रेस को 24 प्रतिशत मतों के अंतर से हराकर यह सीट जीती थी। गौर करने वाली बात ये है कि 2004 में कांग्रेस के उम्मीदवार ये ही श्रीनिवास गौड़ा थे जो 2018 में जेडीएस के टिकट पर चुनाव जीते थे।
श्रीनिवास ने 2023 में चुनाव ना लड़ने का ऐलान किया है
श्रीनिवास गौड़ा ने पहली बार 1994 में जनता दल के टिकट पर यह सीट जीती थी। पिछले साल, उन्होंने घोषणा की कि वह 2023 का चुनाव नहीं लड़ सकते हैं और उनके कांग्रेस में शामिल होने की संभावना है।और उन्हीं की जगह सिद्धारमैया कोलार सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है श्रीनिवास के वोटर उन्हें वोट देकर जिता देंगे।
दो बार निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है
2008 और 2013 में कोलार सीट निर्दलीय विधायक आर वरथुर प्रकाश ने जीती थी, जिन्होंने उक्त वर्षों में कांग्रेस और जेडीएस को हराया था।
2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली थी जीत
पिछले 30 सालों में कांग्रेस ने 2004 के विधानसभा चुनाव में ही इस सीट पर जीत हासिल की थी, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को हराया था।
कोलार कांग्रेस के लिए एक कठिन सीट रही है
गौरतलब है कि कोलार कांग्रेस के लिए एक कठिन सीट रही है। कांग्रेस 2018 में इसे 24 प्रतिशत मतों से पछड़ी थी और 2013 में तीसरा स्थान हासिल किया, और 2008 में 16 प्रतिशत मतों से हार गई थी।
कोलार सीट के वोटर अब तक मूडी साबित हुए हैं
सच्चाई ये है कि कोलार सीट पर जनता का मूड बदलता रहा। 1983 में, जनता पार्टी ने इसे कांग्रेस से छीन लिया और 1985 के विधानसभा चुनावों में इसे बरकरार रखा। हालांकि 1989 में कांग्रेस ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। 1994 में एक बार फिर जनता दल ने यह सीट जीती और 1999 तक इसे बनाए रखा।












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