कर्नाटक चुनाव: जीत की बिसात ऐसे बिछाई बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर भले बहुमत नहीं जुटाती दिख रही हो लेकिन राज्य में वो सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है.
सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन देने की घोषणा की है, ऐसे में भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ करना होगा.
बीजेपी के लिए उम्मीदों की एक बड़ी वजह ये है कि राज्य के राज्यपाल, भारतीय जनता पार्टी के ही हैं.
बावजूद इस चुनौती के, कर्नाटक में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने एक बार फिर दिखाया है कि मौजूदा समय में उनके जैसा चुनाव प्रबंधन कोई और नहीं कर सकता.
हर मतदाता तक...
ये बीजेपी का चुनावी प्रबंधन ही है, जिसके बलबूते कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी बहुमत के क़रीब तक आ पहुंची.
कर्नाटक बीजेपी की प्रवक्ताओं में शामिल मालविका अविनाश बीबीसी से बताती हैं, "कर्नाटक में जो हमारी जीत है, उसकी तैयारी हमने अगस्त, 2017 में ही शुरू कर दी थी. उस वक्त हमारा विस्तारक नाम से कार्यक्रम हुआ था. राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने 12 हज़ार कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए तैयारियों में जुट जाने का निर्देश दिया था."
इन तैयारियों के बारे में विस्तार से बताते हुए मालविका बताती हैं कि उस बैठक में है ये तय किया गया था कि प्रत्येक बूथ के हर मतदाता तक पहुंच कर उन्हें प्रधानमंत्री के नेतृत्व में चल रहे कामों की जानकारी पहुंचानी है.
रणनीति को बिल बोर्ड
इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने बूथ लेवल तक अपनी रणनीति को बिल बोर्ड पर बनाया.
ये तैयारी किस स्तर की रही, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कर्नाटक में मतदाताओं की कुल पंजीकृत संख्या 4 करोड़ 96 लाख है और इन मतदाताओं तक पहुंचने के लिए बीजेपी ने प्रत्येक चुनावी बूथ पर 40-50 लोगों को ज़िम्मेदारी सौंपी हुई थी.
इस बारे में मालविका अविनाश बताती हैं, "ये कोई कर्नाटक में ही नहीं हुआ है, बीजेपी हर चुनाव को जीतने के उद्देश्य से मैदान में उतरती है. हमारे यहां बूथ लेवल में सक्रिय भूमिका निभाने वाले पन्ना प्रमुख होते हैं. दरअसल एक पन्ने में जितने मतदाताओं के नाम आ जाते हैं, करीब 50 लोगों के नाम आ जाते हैं, उनकी जिम्मेदारी हम जिन्हें देते हैं उन्हें पन्ना प्रमुख कहते हैं."
पार्टी का चुनावी प्रबंधन
इस हिसाब से, राज्य के मतदाताओं की संख्या को देखते हुए, राज्य में करीब 10 लाख पन्ना प्रमुख कर्नाटक में मतदाताओं को बीजेपी के पक्ष में वोट देने के लिए घर से निकाल लाने की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे.
इन पन्ना प्रमुखों की सक्रियता का असर ही है कि कर्नाटक में इस बार रिकॉर्ड 70 फ़ीसदी से ज्यादा मतदान देखने को मिला था.
कर्नाटक कांग्रेस के उपाध्यक्ष बीके चंद्रशेखर भी मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी चुनावी प्रबंधन में बीजेपी से पिछड़ गई, जिसके चलते कर्नाटक में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा.
चंद्रशेखर बताते हैं, "कांग्रेस, बीजेपी की तरह कैडर आधारित पार्टी नहीं है. बीजेपी के पास कैडर हैं, राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के लोग हैं, संघ परिवार के दूसरे संगठन हैं, समर्पित कार्यकर्ता हैं. इसी अंतर के चलते कांग्रेस अपनी राज्य सरकार के अच्छे कामों को लोगों तक नहीं पहुंचा पाई."
सांगठनिक स्तर पर...
हालांकि कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव के दौरान अपने कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार करने की कोशिश ज़रूर की, बूथ लेवल तक कमेटी भी बनाई.
ऐसे में बीजेपी से पिछड़ने की वजह पर चंद्रशेखर कहते हैं, "हम लोगों ने ऐसी कमेटी बनाई थी, हर चुनाव में बनाते हैं, लेकिन वो चार-पांच महीने पहले होता है. केवल चुनाव के वक्त कमेटी बनाकर चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं. समर्थकों को कहीं ज्यादा सक्रिय करने की जरूरत है. इसके लिए पार्टी को सांगठनिक स्तर पर फेरबदल करने की ज़रूरत है."
कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी ने काफ़ी जोर आजमाइश की, पहली बार ये भी माना है कि वे मौका मिलने पर प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं, लेकिन चुनावी प्रबंधन में वे अभी भी अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी से काफ़ी पीछे हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष से तुलना
मालविका अविनाश कहती हैं, "हमारे अध्यक्ष की कांग्रेस अध्यक्ष से तुलना हो सकती है क्या? आप ये देखिए कि हमारे प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं, जबकि अमित शाह जी 18-20 घंटे काम करते हैं. हमने देखा कि किस तरह कर्नाटक चुनाव को लेकर रात-रात भर वे अलग अलग प्रभारियों के साथ मीटिंग करते रहते हैं, कार्यकर्ताओं से मिलते हैं और दिन भर में पांच पांच रैलियों को संबोधित करते हैं."
वैसे बीजेपी हर चुनाव के लिए एक चुनाव प्रबंधन समिति बनाती है, जिसमें कई टीमें अपने काम को मुस्तैदी से इंतज़ाम देने में जुटी होती हैं.
मसलन, कौन नेता किस जगह पर कैसे पहुंचेंगे फिर दूसरी जगह कैसे जाएंगे, इसके लिए एक ट्रांसपोर्ट विभाग होता है, एक चुनावी मीडिया टीम होती है, जो ये देखती है कि मीडिया में पार्टी की ख़बरें किस तरह से छप रही हैं, एक प्रचार देखने वाली टीम होती है जो मीडिया से लेकर सड़कों तक में विज्ञापन और प्रचार का ज़िम्मा संभालती हैं.
सोशल इंजीनियरिंग
इस तरह से महिला टीम, अलग अलग समूहों को फोकस करने वाली टीम भी शामिल होती हैं. कर्नाटक चुनाव को लेकर बीजेपी की प्रबंधन समिति के अंदर 55 ऐसी टीमें काम कर रही थीं, वो भी दिन रात. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अमित शाह अपने लक्ष्य को लेकर कितने गंभीर होते हैं.
आक्रामक प्रचार और चुनावी प्रबंधन के साथ साथ अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने पिछले चार साल में ये भी दिखाया है कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में एक नई तरह की सोशल इंजीनियरिंग भी की है, जो हिंदुत्व के नाम पर हिंदुओं को एकजुट करने में कामयाब होती रही है.
हालांकि बीजेपी की ओर से कोई भी खुले तौर पर इसे स्वीकार नहीं करता लेकिन जोर देकर पूछे जाने पर लोग ये ज़रूर कहते हैं कि बीजेपी लोगों को बांटने के नाम पर राजनीति नहीं करती है, बल्कि सबका साथ-सबका विकास चाहने वाली पार्टी है.
बांटने की राजनीति
लेकिन कर्नाटक कांग्रेस के उपाध्यक्ष बीके चंद्रशेखर कहते हैं, "कर्नाटक एक शांति पसंद करने वाला राज्य रहा है, ऐसे में यहां संप्रदाय और धर्म की राजनीति करने वाले बीजेपी का सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरना यहां के समाज को चिंतित करने वाला है."
लेकिन ऐसे समाज का वोट बीजेपी कैसे बटोरने में कामयाब रही, इस पर चंद्रशेखर कहते हैं, बीजेपी के लोगों आम लोगों को अपने झूठ में फंसा लिया है.
वहीं मालविका अविनाश कहती हैं कि लिंगायतों को हिंदुओं से बांटने की राजनीति हमने नहीं शुरू की थी, बल्कि सिद्धारमैया ने की थी, जिसे राज्य की जनता ने अस्वीकार कर दिया.
राज्य के नतीजों से ये साबित भी होता है कि लिंगायतों पर सिद्धारमैया की रणनीति का फ़ायदा कांग्रेस को नहीं मिला है.
कर्नाटक में बीजेपी सरकार
बावजूद इन सबके सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कर्नाटक में बीजेपी सरकार बनाएगी?
अमित शाह-नरेंद्र मोदी का चुनावी प्रबंधन कुर्सी के इतने नज़दीक पहुंचकर सत्ता गंवा दे, इसका दावा उनके धुर विरोधी भी नहीं कर पाएंगे.
जिस राज्य में सरकार हासिल करने के लिए बीजेपी ने एक साल पहले बूथ लेवल की तैयारी शुरू कर दी, वहां अमित शाह कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर को कोई मौका नहीं देना चाहेंगे.
उनके पास राज्यपाल के पास सबसे बड़े दल को मौका देने के प्रावधान का हवाला भी होगा, भले उसका ख़ुद ही गोवा-मणिपुर जैसे राज्यों में वे मजाक़ उड़ा चुके हैं.
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