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कर्नाटक में फिर से होगी जातिगत जनगणना, सिद्धारमैया बोले, ये पार्टी हाईकमान का फैसला, राज्य सरकार का नहीं

Karnataka Caste Census: कर्नाटक में जातिगत जनगणना को लेकर सियासी हलचल बढ़ती जा रही है। बुधवार को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य में जातिगत जनगणना को दोबारा कराने का निर्णय राज्य सरकार का नहीं, बल्कि पार्टी हाईकमान का है। उन्होंने कहा कि पहले की जनगणना रिपोर्ट को सिद्धांत रूप में स्वीकार तो किया गया है, लेकिन कई समुदायों की शिकायतों को देखते हुए अब जनगणना दोबारा की जाएगी।

नई जनगणना कराने का ऐलान कंठराज आयोग की रिपोर्ट पर उठे विवाद के बाद किया गया है। आईए विस्तार से जानते हैं क्या है कंठराज आयोग की रिपोर्ट विवाद?, कैसे होगा जनगणना सर्वे?

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'ये पार्टी हाई कमान का फैसला': सिद्धारमैया

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बुधवार, 11 जून को पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "जातिगत जनगणना को लेकर कुछ शिकायतें प्राप्त हुई हैं। यह सर्वे करीब 10 साल पहले हुआ था और अब यह पुराना हो गया है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सुझाव दिया है कि इसे दोबारा और जल्द से जल्द कराया जाए। हम पहले की रिपोर्ट को खारिज नहीं कर रहे, लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक नया सर्वे ज़रूरी है।"

जब उनसे पूछा गया कि क्या वह कंठराज आयोग की रिपोर्ट को खारिज किए जाने से निराश हैं, तो उन्होंने कहा कि हम पार्टी वरिष्ठों के निर्णय का पालन करेंगे। यह राज्य सरकार का निर्णय नहीं है, बल्कि हाईकमान की सलाह है। सिद्धारमैया के इस बयान पर एक बार फिर से राजनीति गरमा गई है।

डीके शिवकुमार का बड़ा ऐलान: दोबारा होगा सर्वे

इससे पहले 10 जून को कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी इस विषय पर बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा कि पिछली जातिगत जनगणना को लेकर विभिन्न समुदायों के बीच जो संदेह और असंतोष है, उसे दूर करने के लिए यह निर्णय लिया गया है।

डीके शिवकुमार ने कहा था कि पिछली जनगणना के आंकड़ों की सटीकता को लेकर कई समुदायों ने सवाल उठाए हैं। खासकर कुछ समुदायों ने खुद को प्रतिनिधित्व से वंचित महसूस किया। इसलिए, हम डोर-टू-डोर और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से नया डेटा एकत्र करेंगे। यह पूरा काम पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इस फैसले पर दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ चर्चा हुई, जिनमें एआईसीसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला शामिल थे। डीके शिवकुमार ने आगे कहा कि 12 जून को होने वाली राज्य कैबिनेट की बैठक में जातिगत जनगणना को दोबारा कराने की योजना को अंतिम रूप दिया जाएगा।

हर परिवार को मिलेगा मौका, बाहर रहने वालों के लिए ऑनलाइन विकल्प

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नया सर्वे व्यापक होगा और उसमें हर परिवार को शामिल करने का प्रयास किया जाएगा। जो लोग कर्नाटक से बाहर रहते हैं, उनके लिए ऑनलाइन माध्यम से डेटा भरने का विकल्प दिया जाएगा। डीके शिवकुमार ने कहा, "हमारा लक्ष्य है कि कोई भी परिवार जातिगत जनगणना से वंचित न रहे। राज्य के बाहर रह रहे लोगों के लिए ऑनलाइन विकल्प होगा ताकि वे भी अपनी जानकारी साझा कर सकें।"

उपमुख्यमंत्री ने बताया कि बीते दो महीनों से राज्य सरकार एससी और एसटी समुदायों की उपजातियों पर विशेष डेटा संग्रह अभियान चला रही है। उन्होंने यह भी बताया कि नया जातिगत सर्वे लंबा समय ले सकता है, लेकिन प्रक्रिया सभी को विश्वास में लेकर पूरी की जाएगी। डीके शिवकुमार ने कहा, "हमारी सरकार सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है। वरिष्ठ नेताओं का यह निर्णय उसी दिशा में एक कदम है। मैं सभी समुदायों के नेताओं और धर्मगुरुओं से अपील करता हूं कि इस जनगणना में सहयोग करें।"

What is the Kantharaj Commission report: क्या है कंठराज आयोग की रिपोर्ट विवाद

कर्नाटक की राजनीति में जातिगत जनगणना को लेकर जारी बहस का केंद्र बिंदु बनी है "कंठराज आयोग की रिपोर्ट", जिसे लेकर वर्षों से विवाद बना हुआ है। यह रिपोर्ट राज्य की पहली सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण (Socio-Economic and Educational Survey) यानी जातिगत जनगणना पर आधारित है, जिसे वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार ने शुरू कराया था। इस आयोग का नेतृत्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एच. कनथराज (H. Kantharaj) ने किया था।

क्या था कंठराज आयोग का उद्देश्य?

कर्नाटक सरकार ने यह सर्वे इसलिए शुरू कराया था ताकि राज्य में जातियों की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का पता चल सके और उसी आधार पर कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आकलन का आधार माना गया।

कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेतृत्व इसे राजनीतिक और सामाजिक न्याय का सवाल मानकर देख रहा है। जहां राज्य सरकार इसे पारदर्शिता के साथ लागू करने की बात कह रही है, वहीं विपक्ष और अन्य समूह इसके परिणामों पर पैनी नजर रखे हुए हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह जनगणना राज्य की राजनीति को कैसे प्रभावित करती है।

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