कन्नन गोपीनाथनः किन वजहों से इसआईएएस अधिकारी ने इस्तीफ़े की पेशकश की

कन्नन गोपीनाथन
Facebook/Kannan Gopinathan
कन्नन गोपीनाथन

कश्मीर मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त न कर पाने के कारण केंद्र शासित प्रदेश दादर नगर हवेली में एक युवा आईएएस अधिकारी ने नौकरी से इस्तीफ़े की पेशकश की है.

33 साल के कन्नन गोपीनाथन ने बताया कि सरकारी अधिकारी होने के नाते वे अनुच्छेद 370 के हटाए जाने पर अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकते हैं और इसी मजबूरी की वजह से उन्होंने इस्तीफ़ा देने का फ़ैसला किया है.

कन्नन गोपीनाथ कई पदों पर रहे हैं और सात वर्षों के अंदर कई प्रेरणादायक काम किए हैं.

इनमें से मिजोरम में घाटे में चल रहे बिजली बोर्ड को मुनाफ़े वाली इकाई बनाने से लेकर आपदा प्रबंधन के लिए मोबाइल ऐप बनवाने तक का काम शामिल है.

इतना ही नहीं उन्होंने 30 बैडमिंटन ट्रेनिंग सेंटर भी खोले और इसमें उन्होंने वर्ल्ड चैम्पियन पीवी सिंधू के कोच पुलेला गोपीचंद की भी मदद ली.

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पिछले साल चर्चा में आए थे कन्नन

कन्नन गोपीनाथन पिछले साल चर्चा में तब आए थे, जब उन्होंने बिना अपनी पहचान बताए केरल के बाढ़ राहत शिविरों में लोगों की सेवा की थी.

दरअसल ये युवा अधिकारी राहत कोष के लिए चेक देने अपने गृह प्रदेश गए थे, लेकिन वे वहाँ रुक गए और कैंपों में काम किया, जिसमें राहत सामग्री ढोना भी शामिल था.

आठ दिनों तक शिविरों में काम करने वाले कन्नन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुई थीं.

जब बीबीसी तमिल ने उनसे पूछा कि नौकरी छोड़ने के लिए उन पर कोई दबाव तो नहीं था, तो वे बिना देर किए जबाव देते हैं, "किसी का नहीं."

उन्होंने आगे कहा, "ये मेरा फ़ैसला है. मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा कि मुझे नौकरी छोड़ देनी चाहिए. मैं अपने विचार छिपा नहीं सकता. जब देश के एक हिस्से में बड़ी संख्या में लोगों से उनके मौलिक अधिकार छीने जा रहे हों, तब अपने विचार व्यक्त किए बिना मैं अपना काम नहीं कर सकता. मेरी अंतरात्मा शांत नहीं है. लोगों से जुड़े मुद्दे पर खुलकर बोलने की इच्छा हो रही है."

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मेमो

कन्नन ने बताया कि उन्हें अपने उच्च अधिकारियों से दो मेमो मिले थे. पहला प्रधानमंत्री एक्सीलेंस अवार्ड के लिए आवेदन नहीं करने पर और दूसरा केरल के बाढ़ राहत शिविरों में सेवा देने के लिए.

कन्नन आराम से कहते हैं, "मैंने मेमो का जवाब दे दिया है. मुझे इसमें कोई गंभीरता नहीं नज़र आई. मैं किसी भी चीज़ को लेकर चिंतित नहीं हूँ."

जब कन्नन से उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछा गया, तो उनका कहना था, "अभी तक मुझे अपने इस्तीफ़े पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है. फ़िलहाल मेरी कोई योजना नहीं है. नौकरी छोड़ने के बाद ही मैं आपसे बेझिझक बात कर पाऊंगा क्योंकि अभी मैं सेवा नियमों से बंधा हूं."

पूर्व आईएएस अधिकारी एमजी देवसगयाम ने कन्नन के फ़ैसले का स्वागत किया है. 1985 में आईएएस से अपने इस्तीफ़े को याद करते हुए वे कहते हैं, "मैंने कन्नन से बात की, उन्हें शुभकामनाएं दी. वर्ष 1985 में मुझे हरियाणा में ऐसी ही स्थिति से गुज़रना पड़ा था. मैं राजनेताओं के भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं कर सका. नौकरी छोड़ते समय मुझे कोई दुविधा नहीं थी. मैंने सोचा कि मुझे अच्छा लगेगा अगर मैं बिना अंतरात्मा की आवाज़ सुने बिना एक अच्छी सरकारी नौकरी में पैसे कमाने के बजाय लोगों के लिए काम करूं."

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उन्होंने बताया कि उनके पास 15 साल की नौकरी अभी बची हुई थी, लेकिन मैंने इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि मैं अपनी अंतरात्मा के हिसाब से काम करना चाहता था.

देवसगयाम सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और हर्ष मंदर का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि ये दोनों कभी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हुआ करते थे लेकिन लोगों की सेवा करने के लिए इन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी.

उन्होंने कहा, "सूचना के अधिकार वाले क़ानून का प्रारूप तय करने वाली मेरी बैचमेट रहीं अरुणा रॉय ने अपनी नौकरी के छह साल के भीतर इस्तीफ़ा दे दिया था. वर्ष 2002 में गोधरा में हुए दंगों में कई लोगों के मारे जाने के बाद हर्ष मंदर ने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया था. ये सिलसिला इंदिरा गांधी के समय शुरू हुआ, जब उन्होंने 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा की थी."

देवसगयाम कहते हैं कि उस समय कई अधिकारी सरकार का हिस्सा नहीं रहना चाहते थे और सरकार के फ़ैसलों पर चुप भी नहीं रहना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी.

उन्होंने इस बात पर ख़ुशी जताई कि इन दिनों ऐसे लोग मीडिया की सुर्ख़ियाँ बटोर रहे हैं.

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