CJI चंद्रचूड़ के दो साल के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट को मिलेंगे 19 नए जज
सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ का कार्यकाल 10 नवंबर 2024 तक है। इन दो सालों में डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल में 19 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाएगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सात नए जजों की नियुक्तियों करनी प्राथमिकता है।
देश के मुख्य न्यायधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ के दो साल के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में कम से कम 19 नए न्यायाधीशों को शामिल किया जाएगा। CJI चंद्रचूड़ का कार्यकाल 10 नवंबर 2024 तक है। डीवाई चंद्रचूड़ के पिता वाई वी चंद्रचूड़ के सीजेआई के रूप में सात साल और पांच महीने के रिकॉर्ड कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्त संख्या सिर्फ पांच अधिक है। सीजेआई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाले कॉलेजियम को फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सात रिक्तियों को भरना है, जिसकी स्वीकृत संख्या CJI समेत 34 न्यायाधीशों की है।

4 जनवरी,2023 को न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर रिटायर हो रहे हैं, अगले साल मई और जून में सुप्रीम कोर्ट के पांच और जज- जस्टिस डी माहेश्वरी, एम आर शाह, के एम जोसेफ, ए रस्तोगी और वी रामासुब्रमण्यन सेवानिवृत्त होंगे।
न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी अगले साल जुलाई में रिटायर होंगे। जबकि न्यायमूर्ति एस आर भट अक्टूबर में सेवानिवृत होंगे। न्यायमूर्ति एस के कौल दिसंबर 2023 में रिटायर होने वाले हैं। वहीं 2024 में न्यायमूर्ति ए बोस अप्रैल में और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और हिमा कोहली मई और सितंबर में रिटायर होंगे।
डीवाई चंद्रचूड़ के दो साल के कार्यकाल यानी 10 नवंबर 2024 तक, सीजेआई समेत 34 जजों की स्वीकृत संख्या में से 19 यानी 56 प्रतिशत जजों को नियुक्त करने की सिफारिश चंद्रचूड़ की अध्यक्षतावाले कॉलेजियम द्वारा की जाएगी।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक अगर पिछली कॉलेजियम की 26 सितंबर की सिफारिशों पर गौर किया जाए तो बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया जाता है। अगर ऐसा होता है तो उन्हें सीजेआई चंद्रचूड़ द्वारा ही शपथ दिलाई जाएगी।
बता दें कि उनके पिता वाईवी चंद्रचूड़ के CJI के कार्यकाल के दौरान 22 फरवरी 1978 से 11 जुलाई 1985 तक, सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की नियुक्ति CJI के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा की गई थी। कॉलेजियम प्रणाली की नींव 1993 में रखी गई थी और 1998 में सुप्रीम कोर्ट की दो संविधान पीठों के फैसलों के माध्यम से इसे संस्थागत बनाया गया, जिसने कार्यपालिका से न्यायाधीशों के चयन की शक्ति को छीन लिया।












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