#JNU में यह खबर है पत्रकारों के खिलाफ
एक पत्रकार हूं, लेकिन उससे पहले एक नागरिक। रोज़ नेताओं, पुलिस और वकीलों पर सवाल उठाता हूं, आज खुद पर उठा रहा हूं, क्योंकि मैं भी तो एक पत्रकार हूं और लिख रहा हूं एक खबर पत्रकारों के खिलाफ। उठा रहा हूं सवाल उन पत्रकारों के खिलाफ जो वकीलों से हुई भिड़ंत पर तिलमिला उठे हैं और सुबह-शाम काले कोट को गालियां दे रहे हैं। आपकी ये गालियां, आपका यह प्रदर्शन और रैलियां तब कहां थीं, जब पत्रकार मारे गये थे।
पहले जेएनयू की घटना का फ्लैशबैक
तारीख 15 फरवरी, स्थान पटियाला कोर्ट। जिसके बाहर तमाम पत्रकारों का हुजूम इकट्ठा था। दरअसल देश विरोधी नारे लगाने के आरोप में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी होनी थी। उसी दौरान वकीलों और मौके पर मौजूद युवकों ने ''भारत माता की जय'' के नारे लगाने शुरू कर दिए। जिस पर जमकर बवाल हुआ।
बीजेपी विधायक ओपी शर्मा पर भी मारपीट का आरोप लगा दिया गया। हालांकि वहां मौजूद अन्य लोगों का कहना है कि सबसे पहला थप्पड़ ओपी शर्मा पर पड़ा। जिसे मीडिया के कैमरे कैप्चर नहीं कर पाए। लेकिन जब ओपी शर्मा आक्रोशित हो गए तो वहां मौजूद मीडिया वालों ने जमकर शॉट खींचे। इस दौरान मीडियावालों के साथ भी बद्सलूकी की गई। बस फिर क्या था विरोध में तमाम पत्रकार सड़क पर उतर आए। टीवी न्यूज चैनल्स समेत प्रिंट और वेब माध्यम के पत्रकारों ने बीते कल दिल्ली में लंबा जुलूस निकालकर विरोध प्रदर्शन किया।
प्रदर्शन करने वालों से एक सवाल
शायद इस प्रदर्शन में ऐसी कोई भी बात नहीं जिसका विरोध किया जाए। या कहें कि मुखालफत की जाए। प्रेस की आजादी पर निश्चित तौर जो हमला हो रहा है उसे बंद करने के लिए तख्तियां, बुलंद आवाज सबको मिलकर एक होना बेहद जरूरी है। लेकिन सवाल ये उठता है कि महज हमले पर इतना बड़ा हुजूम चल पड़ा न्याय की गुहार लगाने की खातिर। क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि मामला जेएनयू से जुड़ा हुआ है।
क्या इसलिए कि मामले में बीजेपी नेता ओपी शर्मा हिंसात्मक हो उठे हैं। हां ये जरूर कहना चाहूंगा कि हम इसके जरिए किसी की खिलाफत या फिर वकालत नहीं कर रहे। न ही पत्रकारों के साथ हुई बद्सलूकी मामले में समर्थन को राजनीतिक पैजामे के साथ चढ़ा रहे हैं। वजह तो ये है कि फिक्र का जो झंडा उठाकर सरकार को हाशिए पर रखने की कोशिश की जा रही है उसमें पत्रकार कितने निष्पक्ष हैं। कहीं यहां फिक्र विचारधाराओं से ग्रसित होने के कारण तो नहीं।
पत्रकारों की हत्याएं
सीपीजे यानि की कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्निलिस्ट में मौजूद आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में 1992 से अब तक करीबन 740 से ऊपर पत्रकारों की हत्याएं हो चुकी हैं। अगर भारत का बात की जाए तो मरने वाले पत्रकारों की फेहरिस्त आप नीचे स्लाइडर में देख सकते हैं।

पत्रकारों की मौत के आंकड़े
इन सारी बातों को आप खुद के जहन में झांककर ही जान सकते हैं। क्योंकि लगातार पत्रकारों की मौतों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा।

टीआरपी का खेल
हो सकता है कि इस मुद्दे पर निगहबानी की हो लेकिन टीआरपी के खेल में, रीडरशिप के मकड़जाल में उलझकर तमाम संवेदनाओं ने दम तोड़ दिया। पर सवाल तो सवाल हैं।

पत्रकारों की गोलाबंदी
केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद पत्रकारों के बीच इस तरह की गोलबंदी पहली बार हुई है।

मौत पर बदसलूकी भारी
बिलकुल ये पहली बार ही हुआ है जबकि बद्सलूकी हो या मौत पत्रकारों को भेंट इससे पहले भी होती रही हैं।

मौतों पर क्यों नहीं किया घेराव
बद्सलूकी के बाद पत्रकार एक हुए, प्रेस की आजादी की खातिर आवाजें लगाई, अपने साथ हुई हरकत के लिए सरकार का घेराव किया कुछ यही जोश तमाम मौतों के साथ क्यों नहीं दिखता।

हत्याओं पर क्यों नहीं उठी आवाज
क्यों लगातार हो रही पत्रकारों की हत्याओं पर समूचे देश के पत्रकार या कहें कलमकार मिलकर आवाज नहीं उठाते।

क्यों इकठ्ठा नहीं होते पत्रकार
क्यों आपको ऐसा कभी लगा है क्या कि पत्रकारों की हत्याओं के संदर्भ में सभी पत्रकार मिलकर एक साथ न्याय की खातिर इकट्ठा हुए हों।

क्यों हो रही हैं हत्याएं
केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार की साख पर एक साथ देश भर के पत्रकारों ने धमक दी हो कि लगातार हत्यायें क्यों हो रही हैं।
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