जेएनयू हमला: क्या भारत अपने नौजवानों की नहीं सुन रहा?

जेएनयू हिंसा
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दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय या जेएनयू के पूर्व छात्रों में नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री हैं, लीबिया और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं और बहुत से कद्दावर नेता, राजनयिक, कलाकार और अपने-अपने क्षेत्रों के विद्वान भी हैं. जेएनयू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शैक्षणिक गुणवत्ता और रिसर्च के लिए भी जाना जाता है. ये यूनिवर्सिटी भारत की सर्वोच्च रैंकिंग वाले संस्थानों में से एक है.

फिर भी, जेएनयू की इतनी शोहरत, लाठी, पत्थर और लोहे की छड़ें ले कर आए नक़ाबपोशों को कैम्पस में दाख़िल होने से रोक नहीं सकी. इन नक़ाबपोश हथियारबंद लोगों ने रविवार की शाम को जेएनयू के विशाल कैम्पस में बैख़ौफ़ हो कर गुंडागर्दी की. उन्होंने छात्रों और अध्यापकों पर हमला किया और संपत्तियों को भी नुक़सान पहुंचाया. ये नक़ाबपोश उत्पात मचाते रहे, और पुलिस क़रीब एक घंटे तक हस्तक्षेप करने से इनकार करती रही. इस दौरान, कैम्पस के फाटक के बाहर, एक और भीड़ इकट्ठी हो गई थी. जो राष्ट्रवादी नारे लगा रही थी और पत्रकारों के साथ घायल छात्रों को ले जाने आईं एंबुलेंस को निशाना बना रही थी. इस हिंसा में क़रीब 40 लोग घायल हो गए.

दक्षिणपंथी और वामपंथी छात्रों ने इस हिंसा के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहराया है. ज़्यादातर चश्मदीदों ने पत्रकारों को बताया कि नक़ाबपोश लोगों की इस हिंसक भीड़ के ज़्यादातर सदस्य, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से ताल्लुक़ रखते थे. और उनके साथ कई बाहरी लोग भी थे. एबीवीपी, भारत की मौजूदा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का छात्र संगठन है.

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हिंसा के लिए कौन ज़िम्मेदार?

ऊपरी तौर पर देखें, तो रविवार को जेएनयू में हुई हिंसा भड़कने का कारण, हॉस्टल की फ़ीस बढ़ाए जाने से उपजा विवाद है. इस विवाद की वजह से जेएनयू कैम्पस में पिछले कई महीनों से अराजकता की स्थिति बनी हुई है. विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारियों का आरोप है कि ये हमला उन 'छात्रों के एक समूह' ने किया, जो नए छात्रों के रजिस्ट्रेशन की मौजूदा प्रक्रिया का विरोध कर रहे थे. ज़्यादातर लोगों का ये मानना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन के इस बयान का मतलब है वो वामपंथी छात्र हिंसा के लिए ज़िम्मेदार हैं, जो फ़ीस बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे हैं.

लेकिन, लोगों को इस बात का डर ज़्यादा सता रहा है कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी, कैम्पस में अपने विरोध में उठ रही आवाज़ को दबाना चाहती है. पारंपरिक रूप से जेएनयू में वामपंथी राजनीति का दबदबा रहा है. लेकिन, जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में, हिंदू राष्ट्रवाद की लहर पर सवार बीजेपी, सत्ता में आई है, तब से जेएनयू को लगातार निशाना बनाया जाता रहा है. छात्रों पर भाषण देने की वजह से देशद्रोह के मुक़दमे दर्ज किए गए हैं. इस के अलावा जेएनयू को बीजेपी और पक्षपाती न्यूज़ चैनलों ने 'राष्ट्रविरोधी' बता कर उसकी छवि बिगाड़ने की कोशिश की है. जेएनयू के छात्रों को 'अर्बन नक्सल' कहा जाता है.

रविवार को जेएनयू के कैम्पस में हुआ हमला भारत के मौजूदा हालात बारे में कई बातें बताता है.

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विरोध में उठ रही आवाज़ें क्या दबाई जा रही हैं?

पहली बात तो ये कि इस घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि देश की राजधानी दिल्ली में क़ानून व्यवस्था का राज बिल्कुल ख़त्म हो गया है. दिल्ली में इसकी ज़िम्मेदारी भारत के बेहद ताक़तवर गृह मंत्री अमित शाह के पास है. अगर कोई हिंसक भीड़ भारत की सब से शानदार विश्वविद्यालयों मे से एक के कैम्पस में घुस कर उत्पात मचा सकती है. और पुलिस छात्रों व अध्यापकों की सुरक्षा करने में नाकाम रहती है, तो बहुत से लोगों का सवाल है कि आख़िर ऐसे हालात में सुरक्षित कौन है?

इसके अलावा, आलोचक कहते हैं कि बीजेपी की मारो और भागो की राजनीति से आशंका के मुताबिक़ ही हालात पैदा हो रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं.

जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह सत्ता में आए हैं, तब से उन्होंने लगातार अपने विरोधियों को नीचा दिखाने और विलेन के तौर पर पेश करने का सिलसिला जारी रखा है, वो भी बदस्तूर. वो अपने विरोधियों को कभी राष्ट्रविरोधी और कभी शहरी नक्सलवादी कह कर बुलाते हैं. राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशिकर कहते हैं कि, 'सभी प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रद्रोही कह कर ऐसा माहौल पैदा कर दिया गया है, जिस में क़ानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर बेरोक-टोक हिंसा हो रही है.' सुहास पलशिकर आगे कहते हैं कि, 'आज बेहद संगठित तरीक़े से संदेह और नफ़रत का माहौल बनाया जा रहा है.'

इसका ये नतीजा हुआ है कि विरोध में उठने वाली आवाज़ों और विचारों के प्रति सहिष्णुता की गुंजाइश कम से कमतर होती जा रही है. जेएनयू के छात्र रहे वरिष्ठ पत्रकार रोशन किशोर कहते हैं कि रविवार को कैम्पस में हुई घटना ने ये साबित किया है कि, 'हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं जहां शैक्षणिक संस्थानों में विचारधारा के विरोधियों की आवाज़ को बेहद निर्ममता से कुचल दिया जाएगा. इन परिस्थितियों में हुकूमत ज़्यादा से ज़्यादा ये करेगी कि मूक दर्शक बनी रहेगी.'

जेएनयू पर हमला कई मामलों में बेहद दुखदायी है.

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जेएनयू: द मेकिंग ऑफ़ ए यूनिवर्सिटी के लेखक राकेश बटब्याल कहते हैं,"ऑक्सफ़ोर्ड या कैम्ब्रिज से इतर, जेएनयू के छात्रों में बहुत विविधता देखने को मिलती है. यहां समाज के हर दर्जे के छात्र पढ़ने आते हैं. भारत के सामंतवादी और दर्जों में बंटे समाज के लिहाज़ से ये विश्वविद्यालय 'एक क्रांति होने जैसा' है. जहां पर अमीर और ग़रीब, कमज़ोर और असरदार, शहरी और ग्रामीण भारत के छात्र मिलते हैं, साथ रहते और पढ़ते हैं. जेएनयू फैकल्टी के एक सदस्य अतुल सूद कहते हैं कि 'रविवार की रात को जेएनयू में जो हुआ, वो इस कैम्पस में कभी नहीं हुआ था."

हालांकि, जेएनयू कैम्पस में हिंसक संघर्ष कोई नई बात नहीं है. 1980 के दशक में यूनिवर्सिटी में प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव को लेकर छात्रों और अध्यापकों के बीच संघर्ष हुआ था. उस दौर के अख़बारों की सुर्ख़ियों के मुताबिक़ कैम्पस में 'अराजकता' का माहौल था. छात्रों ने कैम्पस में अध्यापकों के घरों पर हमले किए थे. कई लोगों के मुताबिक़, पुलिस ने छात्रों की पिटाई की थी. कई छात्रों को गिरफ़्तार किया गया था. और इन में से 40 को कैम्पस से बाहर कर दिया गया था. राकेश लिखते हैं कि उस हिंसक संघर्ष के बाद से, जेएनयू कैम्पस की राजनीति में ताक़त एक नई और बेहद महत्वपूर्ण बात हो गई थी.

लेकिन, इस बार हालात एकदम अलग हैं. जेएनयू कैम्पस में हिंसा को लेकर हुकूमत का रवैया बेहद सर्द है. सरकार ने विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों से संवाद करने से साफ़ इनकार कर दिया है. पिछले दिसंबर महीने से, ये तीसरी बार है कि जब भारत के किसी विश्वविद्यालय के कैम्पस में प्रदर्शनकारी छात्रों को निशाना बनाया गया है.

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हिंसा झेलते छात्र

दिल्ली के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों में भी छात्रों को हिंसा और पुलिस की निर्ममता का सामना करना पड़ा है. वहीं उत्तरी भारत के अलीगढ़ विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ भी पुलिस ने हिंसा की थी.

एमनेस्टी इंटरनेशनल, इंडिया के अविनाश कुमार कहते हैं, "छात्रों को लगातार विलेन बनाने के सरकार के अभियान की वजह से छात्रों पर ऐसे हिंसक हमलों का ख़तरा बढ़ गया है. और ऐसे हमले करने वालों को सरकार बेख़ौफ़ होकर उत्पात करने देती है. अब बहुत ज़रूरी हो गया है कि सरकार अपने नागरिकों की बात सुने."

सबसे ज़्यादा चिंता की बात तो ये है कि भारत के विपक्षी दल छात्रों के हितों के हक़ में आवाज़ उठाने में नाकाम रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार रोशन किशोर कहते हैं कि, "जो समाज अपने शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में हिंसा का समर्थन करता है, उस को ये समझना चाहिए कि वो अपने भविष्य को तबाह किए जाने का समर्थन कर रहा है."

साफ़ है कि भारत अपने नौजवानों को निराश कर रहा है.

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