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Jayprakash Narayan Jayanti: जिनके जेपी आंदोलन से बने लालू-मुलायम, वह थे संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण

Jayprakash Narayan Jayanti News: भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाने में अगर महात्मा गांधी की भूमिका मानी जाती है तो देश को दूसरी आजादी (आपातकाल से मुक्ति) दिलाकर लोकतंत्र स्थापित करवाने में जयप्रकाश नारायण का योगदान माना जा सकता है।

11 अक्टूबर, 1902 को बिहार के सिताब दियारा में जन्मे लोकनायक जेपी के नाम से भी लोकप्रिय हैं।

Jayprakash Narayan Jayanti

गुलामी के खालखंड में में अमेरिका से मार्क्सवादी विचार से प्रभावित होकर लौटे जेपी ने भारत में गांधीवादी विचारों का पालन किया और उनके अनुयायियों ने समाजवाद का नारा बुलंद किया। लोकनायक ने अपनी महान शख्सियत से देश की जनता को दो भागों में रूबरू करवाया है।

आजादी के आंदोलन में युवा अवस्था में ही सक्रिय हो गए
पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, जिसमें वे गांधीवादी विचारों के अनुरूप स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित थे और हाथों से तैयार वस्त्र पहनते थे। स्वतंत्रता संग्राम में असहयोग आंदोलन के समय से ही युवा के रूप में उनकी सक्रियता शुरू हो गई थी। अंग्रेजों के खिलाफ उनकी जंग पढ़ाई के दौरान भी चल रही थी। समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए अमेरिका भी गए। लेकिन, वहां वे रूसी क्रांति के प्रभाव में आ गए।

आजादी के बाद राजनीति में सक्रिय हुए, लेकिन सत्ता से हमेशा दूर रहे
हालांकि, भारत लौटने पर वे स्वतंत्रता संग्राम में ज्यादा सक्रिय तौर पर शामिल हुए और 1932 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। जेल में भयंकर यातनाएं सहकर निकले। फिर भी भारत छोड़ो आंदोलन में कूदने से पीछे नहीं रहे। समय आगे बढ़ा और देश के आजाद होने के बाद प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनी तो लोकनायक उसके महासचिव बने।

देश आजाद हुआ फिर भी उन्होंने कभी भी सत्ता को 'चिमटे से भी छूना' पसंद नहीं किया। बिहार में उन्होंने बिनोवा भावे के भूदान आंदोलन के लिए भी काम किया। किसान आंदोलन में भी उनकी भूमिका रही।

'भारतीय राजनीति के पूनर्निमाण' की वकालत की
देश की आजादी के लगभग एक दशक बाद ही उन्होंने 'भारतीय राजनीति के पूनर्निमाण' की वकालत शुरू कर दी थी। उन्होंने शासन तंत्र को 'चौखंबा राज' यानी गांव, जिला, प्रदेश और संघीय परिषद की दलील रखी।

जेपी के 'संपूर्ण क्रांति' ने देश को दिलाई दूसरी आजादी
लेकिन, जयप्रकाश नारायण के विचारों की विरासत आज भी भारतीय राजनीति में मौजूद है तो यह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ उनकी 'संपूर्ण क्रांति' की वजह से है।

1974 के ऐतिहासिक छात्र आंदोलन की अगुवाई
दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव में अयोग्य ठहरा दिया था। लेकिन, वो सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। उनकी नीतियों के खिलाफ जनता उबल रही थी। भ्रष्टाचार नाक में दम करने लगा था। इसी दौरान 1974 में पटना में ऐतिहासिक छात्र आंदोलन शुरू हो गया। इसे शांतिपूर्ण रखने की शर्त पर जेपी ने इसकी अगुवाई शुरू की।

'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है'
इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ पूरे देश में माहौल तैयार हो रहा था। जेपी ने तभी 'संपूर्ण क्रांति' का नारा दिया। उनके विचारों से प्रभावित राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कलम से इसको बड़ी ताकत दी। 5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान में ऐतिहासिक और अकल्पनीय विशाल जनसभा में पहली बार 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' के नारे ने सीधे इंदिरा गांधी की सत्ता को ललकारना शुरू कर दिया।

तिलमिलाई इंदिरा गांधी ने लगा दी इमरजेंसी
अपने और अपने बेटे संजय गांधी की हार से तिलमिलाई इंदिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को देश पर इमरजेंसी (आपातकाल) थोप दी। विपक्ष के तमाम नेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया। बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई। जेल जाने वालों में खुद जयप्रकाश नारायण भी थे। उन्हें लगभग सात महीने जेल में बंद रखा गया।

पूरा देश उस समय जेपी के पीछे खड़ा था
पूरा देश उस समय जेपी के पीछे खड़ा था। इंदिरा सरकार की बर्बरता के बावजूद जनता पीछे नहीं हटी, क्योंकि अस्वस्थ होने के बावजूद जेपी चट्टान की तरह उनके साथ खड़े थे। यह अपने ही देश के कुशासकों के खिलाफ एक जन-आंदोलन था। आखिरकार लगभग 21 महीने बाद इंदिरा गांधी ने जनता के आगे हथियार टेक दिए और 21 मार्च, 1977 को इमरजेंसी वापस ले ली गई।

जेपी आंदोलन से निकले लालू और मुलायम जैसे कई नेता
जब जेपी अपनी संपूर्ण क्रांति आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे तो लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, रविशंकर प्रसाद, रामविलास पासवान, सुशील कुमार मोदी जैसे नेता छात्र आंदोलनकारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उस आंदोलन में पूरा देश शरीक था और आपातकाल के खिलाफ जेपी के आंदोलन में खुद मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था।

जेपी आंदोलन की वजह से पहली बार देश में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी
इमरजेंसी के बाद देश में आम चुनाव करवाए गए तो जनता ने पहली बार इंदिरा की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को सत्ता से बेदखल करके गैर-कांग्रेसी सरकार की सत्ता कायम की।

आखिरकार 8 अक्टूबर,1979 को लंबी बीमारी के बाद जेपी ने अंतिम सांस ली। 1999 में उन्हें तब देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' मिला, जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी।

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