J&K: बालकृष्ण ने 24 साल बाद नहीं उठाई होती राइफल, तो उस दिन राजौरी में और भी भयानक होता मंजर

जम्मू-कश्मीर के राजौरी में पाकिस्तानी आतंकियों ने 1 जनवरी को हमला करके चार लोगों की जान ले ली। इस घटना में 6 लोग जख्मी हो गए थे। यह आतंकी हमला और बड़ा होता, यदि 24 साल बाद बंदूक उठाकर एक शख्स ने मदद ना की होती।

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साल के पहले ही दिन जम्मू-कश्मीर के राजौरी में पाकिस्तानी आतंकियों ने कहर बरपा कर 4 लोगों की जान ले ली और 6 को जख्मी कर दिया था। आतंकी जिस इरादे से पहुंचे थे, वह बहुत ही खौफनाक था। वह हतहातों की संख्या बहुत ज्यादा करना चाहते थे। लेकिन, एक स्थानीय शख्स की हिम्मत ने दहशतगर्दों का हौसला तोड़ दिया। अकेले शख्स ने जब 24 साल बाद अपनी राइफल को हाथ लगाया तो सारे आतंकी जंगल की ओर भागने को मजबूर हो गए। अगर बालकृष्ण ने अपनी सूझबूझ दिखाने में थोड़ी भी देर की होती तो मंजर और भी तबाही वाला होना तय था।

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    बालकृष्ण की सूझबूझ से बची कई जान

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    1 जनवरी को जम्मू के राजौरी में कपड़े की दुकान चलाने वाले एक शख्स ने बहादुरी नहीं दिखाई होती तो तबाही का मंजर और भी भयानक हो सकता था। उस शख्स ने 24 साल पहले राइफल चलाने की ट्रेनिंग ली थी, लेकिन फिर बाद में कभी ट्रिगर दबाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। 1 जनवरी की शाम को 42 साल के बालकृष्ण अपने समय से ही दुकान से घर लौट चुके थे। तभी उन्होंने गोलियों की आवाज सुनी। उन्होंने अपनी वर्षों से पड़ी हुई राइफल उठाई और बाहर निकल पड़े। उनकी नजर पड़ोस में ही टहलते हुए दो आतंकवादियों पर पड़ी।

    बालकृष्ण ने फायर किया तो भाग गए आतंकवादी

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    बालकृष्ण ने कहा कि दोनों आतंकवादी उनके घर के बिल्कुल नजदीक ही थी। 'मैंने दो राउंड फायर किए और आतंकी घबरा गए और पास के जंगलों में भाग गए।' उनकी राजौरी शहर के पास ही स्थित डान्गरी चौक पर कपड़े की एक दुकान है। उस दिन आतंकी लोगों की हत्याएं करके खौफ पैदा करने के लिए पहुंचे थे। वे चार घरों को निशाना बना चुके थे, जिसमें चार लोगों की जान चली गई और 6 अन्य जख्मी हो गए थे। उसके बाद वे ग्राम रक्षा समिति के पूर्व सदस्य बालकृष्ण को देखकर भाग गए।

    जीवन में दूसरी बार राइफल उठाई और बचाई कई लोगों की जान

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    पुलिस और ऊपरी डान्गरी पंचायत के सरपंच दर्शन शर्मा ने कहा है कि अगर कृष्ण ने तत्काल वैसा नहीं किया होता तो नुकसान और भी बड़ा हो सकता था। बालकृष्ण ने गोलियां दागनी शुरू की तो आतंकवादी जंगलों में भाग गए। इससे गांव वालों को निकलकर घायलों तक पहुंचने में मदद मिली। ताज्जुब की बात है कि उन्होंने उस दिन दूसरी बार ही अपनी बंदूक का इस्तेमाल किया था। पहली बार 1998-99 में आर्मी की ओर से संचालित आर्म्स ट्रेनिंग कैंप में उन्होंने अपनी .303 राइफल का इस्तेमाल किया था। तब उन्हें और बाकी ग्राम रक्षा समिति के सदस्यों को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने दिए थे।

    '24 साल से डंडा बना हुआ था राइफल'

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    कृष्ण के मुताबिक तब उन लोगों को बंदूक के साथ-साथ 100 राउंड कारतूस दिए गए थे। 'ट्रेनिंग कैंप के दौरान मैंने 10 का इस्तेमाल किया और मेरे पास 90 बुलेट बच गए थे।' उनका कहना है कि '24 साल से इस राइफल का इस्तेमाल नहीं हुआ था। लाइसेंस के अभाव में राइफल डंडा की तरह ही था।' दरअसल, 90 के दशक के मध्य में जब आतंकवाद जम्मू-कश्मीर में अपनी चरम पर था तो 10 जिलों में ग्राम रक्षा समिति बनाई गई थी। लेकिन, हथियारों के बेजा इस्तेमाल और कई तरह के आरोपों के बाद धीरे-धीरे ग्राम रक्षा समितियों का प्रभाव खत्म हो गया। 2002 के बाद से सरकारों ने सदस्यों से कहा वे अपने हथियार लौटा दें।

    'कभी नहीं सोचा कि एक दिन यह बंदूक काम आएगी'

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    कृष्ण ने कहा कि वे 60 साल से कम के थे, इसलिए पुलिस ने उनसे राजौरी थाने में पासपोर्ट साइज फोटो जमा करने के लिए कहा, ताकि उन्हें बंदूक की लाइसेंस दी जा सके। उनके मुताबिक उन्हें अभी तक लाइसेंस नहीं मिली है। 'पुलिस ने मुझ से हथियार के साथ थाने जाने को कहा और उसे जांचने के बाद यह कहकर बंदूक लौटा दी कि इसे साफ रखा करो।' उनका कहना है कि कभी नहीं सोचा था कि एक दिन यह बंदूक काम आएगी और कई लोगों की जान बच सकेगी।

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